Skip to content
SarvaKosh
Back to the archive

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished978 pages

३७० छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ४

Page 374Permalink

३७० छान्दोग्योपनिषद् [ अध्याय ४


त्युपशाम्यति तदासावग्निर्वायुमेवाप्येति वायुस्वाभाव्यमपिगच्छति । तथा यदा सूर्योऽस्तमेति वायुमेवाप्येति । यदा चन्द्रोऽस्तमेति वायुमेवाप्येति ।<br><br>ननु कथं सूर्याचन्द्रमसोः स्वरूपावस्थितयोर्वायावपिगमनम् ?<br><br>नैष दोषः; अस्तमनेऽदर्शनप्राप्तेर्वायुनिमित्तत्वात्, वायुना ह्यस्तं नीयते सूर्यः; चलनस्य वायुकार्यत्वात् । अथवा प्रलये सूर्याचन्द्रमसोः स्वरूपभ्रंशे तेजोरूपयोर्वायावेवापिगमनं स्यात् ॥ १ ॥शान्त हो जाता है उस समय यह अग्नि वायुमें ही लीन हो जाता है अर्थात् वायुके स्वभावको प्राप्त हो जाता है । तथा जिस समय सूर्य अस्त होता है वह भी वायुमें ही लीन हो जाता है और जब चन्द्रमा अस्त होता है वह भी वायुमें ही लीन हो जाता है ।<br><br>शङ्का—अपने स्वरूपमें स्थित सूर्य और चन्द्रमाका वायुमें किस प्रकार लय हो सकता है ?<br><br>समाधान—यह कोई दोष नहीं है, क्योंकि इनका अस्त होनेपर अदर्शनको प्राप्त होना वायुके कारण होता है । सूर्य वायुके ही द्वारा अस्तको प्राप्त कराया जाता है, क्योंकि गति वायुका ही कार्य है अथवा प्रलयकालमें तेजोरूप सूर्य और चन्द्रमाके स्वरूपका नाश होनेपर भी उनका वायुमें ही लय हो सकता है ॥ १ ॥

— : ० : —

| तथा— | । तथा— |

यदाप उच्छुष्यन्ति वायुमेवापियन्ति वायुर्ह्यैवैतान् सर्वान्संवृङ्क्त इत्यधिदैवतम् ॥ २ ॥

Page 375Permalink

खण्ड ३ ] शाङ्करभाष्यार्थ ३७१


जिस समय जल सूखता है वह वायुमें ही लीन हो जाता है । वायु ही इन सब जलोंको अपनेमें लीन कर लेता है । यह अधिदैवत दृष्टि है ॥ २ ॥

यदाप उच्छुष्यन्त्युच्छोष-<br>माप्नुवन्ति तदा वायुमेवापिय-<br>न्ति । वायुर्हि यस्माद्वैतान-<br>ग्न्याद्यान्महाबलान्संवृङ्क्ते, अतो<br>वायुः संवर्गगुण उपास्य इत्यर्थः<br>इत्यधिदैवतं देवतासु संवर्गदर्श-<br>नमुक्तम् ॥ २ ॥जब जल सूखता है—शोषणको प्राप्त होता है उस समय वह भी वायुमें ही लीन हो जाता है । क्योंकि वायु ही इन अग्नि आदि महाबलवान् तत्त्वोंको अपनेमें लीन कर लेता है, इसलिये वायुकी संवर्ग गुणरूपसे उपासना करनी चाहिये—यह इसका तात्पर्य है । इस प्रकार यह अधिदैवत—देवताओंमें संवर्ग-दृष्टि कही गयी ॥ २ ॥

अथाध्यात्मं प्राणो वाव संवर्गः स यदा स्वपिति प्राणमेव वागप्येति प्राणं चक्षुः प्राणꣳश्रोत्रं प्राणं मनः प्राणो ह्येवैतान्सर्वान्संवृङ्क्त इति ॥ ३ ॥

अब अध्यात्मदर्शन कहा जाता है—प्राण ही संवर्ग है । जिस समय वह पुरुष सोता है, प्राणको ही वाक इन्द्रिय प्राप्त हो जाती है; प्राणको ही चक्षु, प्राणको ही श्रोत्र और प्राणको ही मन प्राप्त हो जाता है, प्राण ही इन सबको अपनेमें लीन कर लेता है ॥ ३ ॥

अथानन्तरमध्यात्ममात्मनि<br>संवर्गदर्शनमिदमुच्यते — प्राणो<br>मुख्यो वाव संवर्गः । स पुरुषो<br>यदा यस्मिन्काले स्वपिति प्राण-अब आगे यह अध्यात्म अर्थात् शरीरमें संवर्गदर्शन कहा जाता है । मुख्य प्राण ही संवर्ग है । यह पुरुष जिस समय सोता है उस समय प्राणको ही वाक् इन्द्रिय प्राप्त हो