छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
by आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)
१६४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ३
१६४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ३
हृदयान्तर्गत उत्तरसुषिभूत समानकी उपासना
अथ योऽस्योदङ् सुषिः स समानस्तन्मनः स पर्जन्यस्तदेतत्कीर्तिश्च व्युष्टिश्चेत्युपासीत कीर्तिमान्व्युष्टिमान् भवति य एवं वेद ॥ ४ ॥
तथा इसका जो उत्तरीय छिद्र है वह समान है, वह मन है, वह मेघ है और वही यह कीर्ति और व्युष्टि (देहका लावण्य) है—इस प्रकार उसकी उपासना करे। जो इस प्रकार जानता है वह कीर्तिमान् और व्युष्टिमान् होता है ॥ ४ ॥
| संस्कृत-भाष्य | हिन्दी-अनुवाद |
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| अथ योऽस्योदङ् सुषिरुदग्गतः सुषिस्तत्स्थो वायुविशेषः सोऽशितपीते समं नयतीति समानः। तत्संबद्धं मनोऽन्तःकरणं स पर्जन्यो वृष्ट्यात्मको देवः पर्जन्यनिमित्ताश्चाप इति, "मनसा सृष्टा आपश्च वरुणश्च" इति श्रुतेः। | तथा इसका जो उदङ् सुषि—उत्तरवर्ती छिद्र है, उसमें स्थित हुआ जो वायुविशेष है वह खाये-पिये अन्न-जलको समानरूपसे [सम्पूर्ण शरीरमें] ले जाता है, इसलिये 'समान' है। उसीसे सम्बन्ध रखनेवाला मन—अन्तःकरण और वह पर्जन्य यानी वृष्टिरूप देव है, क्योंकि "[विराट् पुरुषके] मनसे अप् और वरुण रचे गये हैं" इस श्रुतिके अनुसार अप् (जल) मेघहीसे होनेवाले हैं। |
| तदेतत्कीर्तिश्च, मनसो ज्ञानस्य कीर्तिहेतुत्वात्; आत्मपरोक्षं विश्रुतत्वं कीर्तिः; यशः स्वकरण- | तथा यह (समाननामक ब्रह्म) ही कीर्ति है, क्योंकि मन यानी ज्ञान ही कीर्तिका हेतु है। अपने पीछे जो विख्यात होती है उसे कीर्ति कहते हैं। जो ख्याति अपनी |
खण्ड १३ ] शाङ्करभाष्यार्थ [ २९५
| संवेद्यं विश्रुतत्वम् । व्युष्टिः कान्तिर्देहगतं लावण्यम् । ततश्च कीर्तिसंभवात्कीर्तिश्चेति । समानमन्यत् ॥ ४ ॥ | इन्द्रियोंसे गृहीत की जा सकती है उसे यश कहते हैं। व्युष्टि—कान्ति यानी देहगत सुन्दरताको कहते हैं। उससे भी कीर्तिकी उत्पत्ति होती है अतः वह भी कीर्ति ही है। शेष अर्थ पूर्ववत् है ॥ ४ ॥ |
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हृदयान्तर्गत ऊर्ध्वसुषिभूत उदानकी उपासना
अथ योऽस्योर्ध्वः सुषिः स उदानः स वायुः स आकाशस्तदेतदोजश्च महश्चेत्युपासीतौजस्वी महस्वान्भवति य एवं वेद ॥ ५ ॥
तथा इसका जो ऊर्ध्व छिद्र है वह उदान है, वह वायु है, वह आकाश है और वही यह ओज और महः है—इस प्रकार उसकी उपासना करे। जो इस प्रकार जानता है वह ओजस्वी (बलवान्) और महस्वान् (तेजस्वी) होता है ॥ ५ ॥
| अथ योऽस्योर्ध्वः सुषिः स उदान आ पादतलादारभ्योर्ध्वमुत्क्रमणादुत्कर्षार्थं च कर्म कुर्वन्ननितीत्युदानः स वायुस्तदाधारश्चाकाशः। तदेतद् वाय्वाकाशयोरोजोहेतुत्वादोजो बलं महत्त्वाच्च मह इति समानमन्यत् ॥५॥ | तथा इसका जो ऊर्ध्व-छिद्र है वह उदान है। पैरके तलुएसे लेकर ऊपरकी ओर उत्क्रमण करनेके कारण और उत्कर्षके लिये कर्म करता हुआ चेष्टा करता है—इसलिये वह 'उदान' है। वही वायु और उसका आधारभूत आकाश भी है। वायु और आकाश ओजके हेतु हैं अतः यह (उदानसंज्ञक ब्रह्म) ही ओज—बल है और महत्ताके कारण महः भी है। शेष अर्थ पूर्ववत् है॥५॥ |
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