छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
by आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)
१२४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १
१२४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय १
| इत्युक्तः प्रत्युवाचोषस्तिः— | ऐसा कहे जानेपर उषस्तिने उत्तर दिया— |
|---|
एतेषां मे देहीति होवाच तानस्मै प्रददौ हन्तानुपानमित्युच्छिष्टं वै मे पीतँस्यादिति होवाच ॥३॥
तू मुझे इन्हें ही दे दे—ऐसा उषस्तिने कहा। तब महावतने वे उड़द उसे दे दिये और कहा 'यह अनुपान भी लो।' इसपर वह बोला—'इसे लेनेसे मेरेद्वारा निश्चय ही उच्छिष्ट जल पीया जायगा' ॥३॥
| एतेषामेतानित्यर्थः, मे मह्यं देहीति होवाच। तान्स इभ्योऽस्मा उषस्तये प्रददौ प्रदत्तवान्। अनुपानाय समीपस्थमुदकं हन्त गृहाणानुपानमित्युक्तः प्रत्युवाच-उच्छिष्टं वै मे ममेदमुदकं पीतं स्याद्यदि पास्यामि ॥ ३ ॥ | 'एतेषाम्' इस षष्ठ्यन्त पदका अर्थ 'एतान्' (इन्हें) है। अर्थात् 'तू मुझे इन उड़दोंको ही दे' ऐसा उषस्तिने कहा। तब उस महावतने उषस्तिको वे उड़द दे दिये तथा पीनेके लिये पास रखे हुए जलको लेकर बोला—'भाई ! अनुपान भी ले लो।' ऐसा कहे जानेपर उषस्तिने कहा—'यदि मैं इस जलको पीऊँगा तो निश्चय ही मेरेद्वारा यह उच्छिष्ट जल पिया जायगा [अर्थात् मुझे उच्छिष्ट जल पीनेका दोष प्राप्त होगा] ॥ ३ ॥ |
-: ० :-
| इत्युक्तवन्तं प्रत्युवाचेतरः— | इस प्रकार कहनेवाले उस उषस्तिसे दूसरे (महावत) ने कहा— |
|---|
न स्विदेतेऽप्युच्छिष्टा इति न वा अजीविष्यमिमानखादन्निति होवाच कामो म उदकपानमिति ॥४॥
खण्ड १० ] शाङ्करभाष्यार्थ १२५
‘क्या ये (उड़द) भी उच्छिष्ट नहीं हैं?’ उसने कहा—‘इन्हें बिना खाये तो मैं जीवित नहीं रह सकता था, जलपान तो मुझे यथेच्छ मात्रामें मिलता है’॥ ४ ॥
| किं न स्विदेते कुल्माषा अप्युच्छिष्टा इत्युक्त आहोपस्तिर्न वा अजीविष्यं न जीविष्यामीमान्कुल्माषानखादन्नभक्षयन्निति होवाच। काम इच्छातः मे ममोदकपानं लभ्यत इत्यर्थः। <br><br> अतश्चैतामवस्थां प्राप्तस्य विद्याधर्मयशोवतः स्वात्मपरोपकारसमर्थस्यैतदपि कर्म कुर्वतो नागःस्पर्श इत्यभिप्रायः। तस्यापि <br><br> जीवितं प्रत्युपायान्तरेऽजुगुप्सिते सति जुगुप्सितमेतत्कर्म दोषाय। ज्ञानावलेपेन कुर्वतो नरकपातः स्यादेवेत्यभिप्रायः, प्रद्राणकशब्दश्रवणात् ॥ ४ ॥ | ‘क्या ये उड़द भी उच्छिष्ट नहीं हैं?’ ऐसा कहे जानेपर उषस्तिने कहा—‘इन उड़दोंको बिना खाये-बिना भक्षण किये तो मैं जीवित नहीं रह सकता था। जलपान तो मुझे इच्छानुसार मिल जाता है।’ <br><br> अतः इसका यह अभिप्राय है कि इस अवस्थाको प्राप्त हुए, विद्या, धर्म और यशसे सम्पन्न तथा अपने और दूसरोंके उपकारमें समर्थ पुरुषको ऐसा कर्म करते हुए भी पापका स्पर्श नहीं हो सकता। उसके भी जीवनका यदि कोई अन्य अनिन्द्य उपाय हो तो यह निन्दनीय कर्म दोषके ही लिये होगा। ज्ञानाभिमानवश ऐसा कर्म करनेवाले पुरुषका भी नरकमें पतन होगा ही—यह इसका अभिप्राय है; क्योंकि श्रुतिमें ‘प्रद्राणक’ शब्दका प्रयोग है*॥४॥ |
* चाक्रायणने ‘प्रद्राणक’ अर्थात् अत्यन्त आपद्ग्रस्त होनेपर ही उच्छिष्ट भोजन किया था—इससे यह सिद्ध होता है कि विधिका व्यतिक्रम जीवनरक्षाका कोई वैध साधन न रहनेपर ही किया जा सकता है अन्यथा कदापि नहीं।