Skip to content
SarvaKosh
छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

DevanagariSanskritpublished978 pages

Page 762 of 978

Read in context
Page 762

द्वादश खण्ड

-: ० :-

तेजसे आकाशकी प्रधानता

आकाशो वाव तेजसो भूयानाकाशे वै सूर्याचन्द्रमसावुभौ विद्युन्नक्षत्राण्यग्निराकाशेनाह्वयत्याकाशेन शृणोत्याकाशेन प्रतिशृणोत्याकाशे रमत आकाशे न रमत आकाशे जायत आकाशमभिजायत आकाशमुपास्स्वेति ॥ १ ॥

आकाश ही तेजसे बढ़कर है । आकाशमें ही सूर्य, चन्द्र ये दोनों तथा विद्युत्, नक्षत्र और अग्नि स्थित हैं । आकाशके द्वारा ही एक-दूसरेको पुकारते हैं, आकाशसे ही सुनते हैं, आकाशसे ही प्रतिश्रवण करते हैं, आकाशमें ही रमण करते हैं, आकाशमें ही रमण नहीं करते, आकाशमें ही [ सब पदार्थ ] उत्पन्न होते हैं और आकाशकी ओर ही [सब जीव एवं अङ्कुरादि] बढ़ते हैं । तुम आकाशकी उपासना करो ॥ १ ॥

| आकाशो वाव तेजसो भूयान् । वायुसहितस्य तेजसः कारणत्वाद्व्योम्नो वायुमागृह्येति तेजसा सहोक्तो वायुरिति पृथगिह नोक्तस्तेजसः । कारणं हि लोके कार्याद्भूयो दृष्टम् । यथा घटादिभ्यो मृत्तथाकाशो वायु- | आकाश ही तेजसे बढ़कर है, क्योंकि आकाश वायुसहित तेजका कारण है ‘वायुमागृह्य’ ऐसा कहकर वायुका तेजके साथ वर्णन किया जा चुका है, इसलिये यहाँ तेजसे अलग उसका पृथक् उल्लेख नहीं किया गया। लोकमें कार्यकी अपेक्षा कारण ही उत्कृष्ट देखा गया है, जिस प्रकार कि घटादिकी अपेक्षा मृत्तिका। इसी प्रकार आकाश वायु- |