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छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
by आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)
DevanagariSanskritpublished978 pages
| ३५४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ४ |
Page 358Permalink
| ३५४ | छान्दोग्योपनिषद् | [ अध्याय ४ |
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| वसन्तोऽत्स्यन्ति भोक्ष्यन्त इत्येवमभिप्रायः ॥ १ ॥ | उन धर्मशालाओंमें निवास करनेवाले लोग सर्वत्र मेरा ही अन्न भोजन करेंगे ॥ १ ॥ |
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| तत्रैवं सति राजनि तस्मिन् घर्मकाले हर्म्यतलस्थे— | वहाँ इस प्रकार रहता हुआ वह राजा जब एक बार गर्मीके समय अपने महलकी छतपर बैठा था— |
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अथ ह हꣳसा निशायामतिपेतुस्तद्धैवꣳहꣳसो हꣳसमभ्युवाद हो होऽयि भल्लाक्ष भल्लाक्ष जानश्रुतेः पौत्रायणस्य समं दिवा ज्योतिराततं तन्मा प्रसाङ्क्षीस्तत्त्वा मा प्रधाक्षीरिति ॥ २ ॥
उसी समय रात्रिमें उधरसे हंस उड़कर गये । उनमेंसे एक हंसने दूसरे हंससे कहा—'अरे ओ भल्लाक्ष ! ओ भल्लाक्ष ! देख, जानश्रुति पौत्रायणका तेज द्युलोकके समान फैला हुआ है; तू उसका स्पर्श न कर, वह तुझे भस्म न कर डाले' ॥ २ ॥
| अथ ह हंसा निशायां रात्रावतिपेतुः । ऋषयो देवता वा राज्ञोऽन्नदानगुणैस्तोषिताः सन्तो हंसरूपा भूत्वा राज्ञो दर्शनगोचरेऽतिपेतुः पतितवन्तः । तत्तस्मिन्काले तेषां पततां हंसानामेकः पृष्ठतः पतन्नग्रतः पतन्तं हंसम- | उसी समय निशा अर्थात् रात्रिमें उधरसे हंस उड़कर गये । राजाके अन्नदानसम्बन्धी गुणोंसे संतुष्ट हुए ऋषि या देवता हंसरूप होकर राजाकी दृष्टिके सामने होकर उड़े । उस समय उड़कर जाते हुए उन हंसोंमेंसे पीछे उड़ते हुए एक हंसने आगे उड़कर जाते हुए दूसरे हंससे 'अरे ओ भल्लाक्ष ! ओ भल्लाक्ष !' |
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| खण्ड १ ] | शाङ्करभाष्यार्थ | ३५५ |
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| संस्कृत भाष्य | भाष्यार्थ |
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| भ्युवादाभ्युक्तवान् हो होऽयीति भो भो इति सम्बोध्य भल्लाक्ष भल्लाक्षेत्यादरं दर्शयन्नयथा पश्य पश्याश्चर्यमिति तद्वत् । भल्लाक्षेति मन्ददृष्टित्वं सूचयन्नाह । अथवा सम्यग्ब्रह्मदर्शनाभिमानवत्त्वात्तस्यासकृदुपालब्धस्तेन पीड्यमानोऽमर्षितया तत्सूचयति भल्लाक्षेति । | इस प्रकार सम्बोधन करते हुए और जैसे कि 'देखो, देखो, बड़ा आश्चर्य है' इत्यादि कथनमें देखा जाता है, उसी प्रकार 'भल्लाक्ष ! भल्लाक्ष !' ऐसा कहकर [ अपने कथनके प्रति ] आदर प्रदर्शित करते हुए कहा । 'भल्लाक्ष !' ऐसा कहकर उसकी मन्ददृष्टिताको सूचित करते हुए वह बोला । अथवा सम्यक् ब्रह्मज्ञानके अभिमानसे युक्त होनेके कारण उस (आगे उड़नेवाले हंस) से निरन्तर छेड़े जानेसे पीड़ित होकर क्रोधवश उसे 'भल्लाक्ष' कहकर सूचित करता है । [क्या सूचित करता है ? यह बतलाते हैं—] |
| जानश्रुतेः पौत्रायणस्य समं जानश्रुतेः तुल्यं दिवा द्युलोकेन प्रभाववर्णनम् ज्योतिः प्रभास्वरमन्नदानादिजनितप्रभावजमाततं व्याप्तं द्युलोकस्पृगित्यर्थः । दिवाह्ना वा समं ज्योतिरित्येतत् । तन्मा प्रसाङ्क्षीः सञ्जनं सक्तिं तेन ज्योतिषा सम्बन्धं मा कार्षीरित्यर्थः । तत्प्रसञ्जनेन तज्ज्योतिस्त्वा त्वां मा प्रधा- | जानश्रुति पौत्रायणकी ज्योति— अन्नदानादिजनित प्रभावसे प्राप्त हुई कान्ति द्युलोकके समान फैली हुई है; अर्थात् द्युलोकका स्पर्श करनेवाली है । अथवा इसका यह भी तात्पर्य हो सकता है कि दिवा यानी दिनके समान है । उससे प्रसङ्ग—सञ्जन यानी सक्ति न कर अर्थात् उस ज्योतिसे सम्बन्ध न कर । उसका सङ्ग करनेसे वह ज्योति तुझे भस्म अर्थात् दग्ध न कर |
छा० उ० १२—