छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)
Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya
by आदि शङ्कराचार्य
Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)
Page 768 of 978
Read in contextचतुर्दश खण्ड
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स्मरणसे आशाकी महत्ता
आशा वाव स्मराद्भूयस्याशेद्धो वै स्मरो मन्त्रानधीते कर्माणि कुरुते पुत्रांश्च पशूूंश्चेच्छत इमं च लोकममुं चेच्छत आशामुपास्स्वेति ॥ १ ॥
आशा ही स्मरणकी अपेक्षा उत्कृष्ट है। आशासे दीप्त हुआ स्मरण ही मन्त्रोंका पाठ करता है, कर्म करता है, पुत्र और पशुओंकी इच्छा करता है तथा इस लोक और परलोककी कामना करता है। तुम आशाकी उपासना करो ॥ १ ॥
| आशा वाव स्मराद्भूयसी।<br><br>आशाप्राप्तवस्त्वाकाङ्क्षा, आशा तृष्णा काम इति यामाहुः पर्यायैः, सा च स्मराद्भूयसी।<br><br>कथम् ? आशया ह्यन्तःकरणस्थया स्मरति स्मर्तव्यम्। आशाविषयरूपं स्मरन्नसौ स्मरो भवत्यत आशेद्ध, आशयाभिवर्धितः स्मरभूतः स्मरन्नृगादीन्मन्त्रान- | आशा ही स्मरणसे बढ़कर है।<br><br>आशा--अप्राप्त वस्तुकी इच्छाका नाम आशा है; जिसका तृष्णा और काम इन पर्याय शब्दोंसे भी निरूपण किया जाता है। वह स्मरकी अपेक्षा बढ़कर है।<br><br>सो किस प्रकार ?—अन्तःकरणमें स्थित हुई आशासे ही मनुष्य स्मरणीय विषयका स्मरण करता है। आशाके विषयके रूपका स्मरण करनेसे यह स्मृतिको प्राप्त होता है। अतः आशासे दीप्त---आशासे वृद्धिको प्राप्त हुआ स्मृतिभूत वह स्मरण करता हुआ ऋगादि मन्त्रोंका |