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छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

छान्दोग्योपनिषद् (शाङ्करभाष्य सहित)

Chandogya Upanishad with Shankara Bhashya

by आदि शङ्कराचार्य

Source: Gita Press Gorakhpur · Gita Press, Gorakhpur (origin)

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DevanagariSanskritpublished978 pages

Page 772 of 978

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Page 772
७६८छान्दोग्योपनिषद्[ अध्याय ७

माता है, प्राण भाई है, प्राण बहिन है, प्राण आचार्य है और प्राण ही ब्राह्मण है ॥ १ ॥

| प्राणो वा आशाया भूयान्<br><br>कथमस्य भूयस्त्वम् ? इत्याह दृष्टान्तेन समर्थयंस्तद्भूयस्त्वम्—यथा वै लोके रथचक्रस्यारा रथनाभौ समर्पिताः सम्प्रोताः सम्प्रवेशिता इत्येतत्; एवमस्मिँल्लिङ्गसङ्घातरूपे प्राणे प्रज्ञात्मनि दैहिके मुख्ये यस्मिन् परा देवता नामरूपव्याकरणायादर्शादौ प्रतिबिम्बवज्जीवेनात्मनानुप्रविष्टा । यश्च महाराजस्येव सर्वाधिकारीश्वरस्य । "कस्मिन्न्वहमुत्क्रान्त उत्क्रान्तो भविष्यामि कस्मिन्वा प्रतिष्ठिते प्रतिष्ठास्यामीति स प्राणमसृजत" [प्र० उ० ६ । ३] इति श्रुतेः । यस्तु च्छायेवानुगत ईश्वरम्, "तद्यथा रथस्यारेषु नेमिरर्पितो | प्राण ही आशासे बढ़कर है। इसकी उत्कृष्टता किस प्रकार है ? ऐसी जिज्ञासा होनेपर दृष्टान्तद्वारा उसकी उत्कृष्टताका समर्थन करते हुए [सनत्कुमारजी-] कहते हैं—लोकमें जिस प्रकार रथके पहियेके अरे रथकी नाभिमें समर्पित-सम्प्रोत अर्थात् सम्यक् प्रकारसे प्रवेशित रहते हैं उसी प्रकार लिङ्ग संघातस्वरूप¹ इस प्राण यानी प्रज्ञात्मामें² अर्थात् दैहिक मुख्य प्राणमें, जिसमें कि परादेवताने नामरूपकी अभिव्यक्ति करनेके लिये दर्पणादिमें प्रतिबिम्बके समान जीवरूपसे प्रवेश किया है, जो महाराजके सर्वाधिकार के समान ईश्वरका सर्वाधिकारी है, जैसा कि "किसके उत्क्रमण करनेपर मैं उत्क्रमण करूँगा तथा किसके स्थित होनेपर स्थित होऊँगा—ऐसा ईक्षण करके उसने प्राणकी रचना की" इस श्रुतिसे प्रमाणित होता है तथा जो छायाके समान ईश्वरका अनुगामी |


१—व्यष्टिलिंगदेहोंका समुदायरूप समष्टिसूत्रात्मा।
२—उपाधि प्राण और उपाधिमान् आत्माको एकता मानकर यह विशेषण दिया गया है।