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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

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भूमिका । ६५

अस्त्रमन्त्रेण संरक्ष्य कवचेनावगुण्ठ्य च ।
पञ्चामृतेन संस्नाप्य तक्रमध्ये निचिक्षिपेत् ॥ १०१ ॥
भूमिं संलिप्य तद्भाण्डं स्थापयेन्मृण्मयोद्भवम् ।
रात्रौ संरक्षयेद् दुष्टच्छायातो हृष्टमानसः ॥ १०२ ॥
ग्रन्थीनां तक्षणं कुर्याद् इतिर्णा सूक्तमुच्चरन् ।
द्वितीये मृण्मये भाण्डे छायाशुष्कं विधाय च ॥ १०३ ॥
प्रातः स्नात्वा शुचिर्भूत्वा नित्यकर्म विधाय च ।
पात्रमुद्धृत्य हृन्मन्त्रं जप्त्वा कुर्याद् बहिस्ततः ॥ १०४ ॥
भावयेदम्लद्रव्येण शुद्धनिम्बूद्भवेन च ।
अस्त्रपिष्टेन वा तत्र टङ्कणं पातयेद् बुधः ॥ १०५ ॥
दत्वा चैरण्डपत्राणि मुखे मारुतवर्जिते ।
प्रदेशे स्थापयेद् यावद्रक्तत्वमुपजायते ॥ १०६ ॥
तावद्विधूपयेन्नित्यं यथा छाया न संक्रमेत् ।
पश्चात् संशोध्य यत्नेन शिलया चूर्णयेद् दृढम् ॥ १०७ ॥
सुगन्धस्नेहतैलेन भावयेच्चन्द्रकेण वा ।
देव्याः प्रीतिकरं चूर्णं निष्पन्नं जायते यदि ॥ १०८ ॥
वासयेन्मालतीपुष्पैस्तिलानीव महामनाः ।
यावत्संपद्यते गन्धः श्रीचूर्णं कमलाप्रियम् ॥ १०६ ॥
निष्पाद्य मङ्गलद्रव्यमणपत्रे च धारयेत् ।
पूजयेद् विविधोपायैस्तथा नीराजयेन्निशि ॥ ११० ॥
द्वादश्यां जन्मसमये श्रीदेव्याः प्रयतो नरः ।
संपूज्य परमां देवीं सर्वावरणसंयुताम् ॥ १११ ॥


१ साधन प्रकार ।

इदं द्रव्यं मया देवि प्रीत्या निष्पादितं तव ।

६६ मनुस्मृति ।
इदं द्रव्यं मया देवि प्रीत्या निष्पादितं तव ।
स्वीकुरुष्व महामाये विष्णुपत्नि नमोऽस्तुते ॥ ११२ ॥
धारणार्थं पृथक् कुर्याद् बिल्वपात्रे विशेषतः ।
श्रिये जातेति वा केन विभृयादिति मे मतम् ॥ ११३ ॥
पुण्ड्रार्थं श्वेतद्रव्यं हि समानीतं गरुत्मता ।
श्वेतद्वीपान्महाभाग मलयादौ निवेशितम् ॥ ११४ ॥
मलयाद्रिसमुद्भूतां मृदमादाय वैष्णवः ।
करोति चोर्ध्वपुण्ड्राणि स ऊर्ध्वपदमश्नुते ॥ ११५ ॥
यस्य भाले हरेर्नाम श्वेतद्रव्येण दृश्यते ।
अन्तकाले मृतो याति श्वेतद्वीपं स पातकी ॥ ११६ ॥
न तथा वल्लभं विष्णोश्चन्दनं कुङ्कुमान्वितम् ।
यथा मलयकूटस्थं यद् द्रव्यं चन्द्रपाण्डुरम् ॥ ११७ ॥
विष्णोर्ललाटे यः प्रेम्णा करोति तिलकं मुदा ।
श्वेतद्वीपमृदा नित्यं स प्रियः कमला यथा ॥ ११८ ॥
स्नाने दाने प्रयाणे च श्राद्धे पर्वणि मङ्गले ।
होमे सुरार्चने पुण्या श्वेतद्वीपामलामही ॥ ११९ ॥
श्रीगोपीचन्दनं नाम पीतद्रव्यं महामते ।
वैकुण्ठलोकादानीतं द्वारकायां प्रतिष्ठितम् ॥ १२० ॥
सर्वेषां गोपनाद् गोपो वासुदेवोऽहमेव हि ।
अनन्ताः शक्तयो गोप्यो मदीया एव नारद ॥ १२१ ॥
मदङ्गलेपितं पुण्यं वैकुण्ठे कुङ्कुमान्वितम् ।
गोपीभिः क्षालितं तस्माद् गोपीचन्दनमुच्यते ॥ १२२ ॥'
'भावयन्त्यपरेभक्ताः पुण्ड्रं तु हरिमन्दिरम् ।
१ उर्ध्वपुण्ड्र की निरुक्ति ।

.............इत्यादि । (बृहद्ब्रह्मसंहिता चतुर्थपाद)

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भूमिका । ६७
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लक्ष्मीनारायणं तत्र बुद्ध्या ध्यायन्ति नित्यशः ॥ १३५ ॥'
.............इत्यादि । (बृहद्ब्रह्मसंहिता चतुर्थपाद)
'अशुचिर्वाप्यनाचारी महापापयुतोऽपि हि ।
पुण्ड्रसंधारणादेव निर्भयत्वं प्रपद्यते ॥ ५६ ॥
स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रा म्लेच्छा वान्त्यजजातयः ।
ऊर्ध्वपुण्ड्रधराः सर्वे नमस्या देवता इव ॥ ५७ ॥'
.............इत्यादि । (बृहद्ब्रह्मसंहितासुदर्शनगीता.)
उक्त ऊर्ध्वपुण्ड्र से पूर्णरीत्या सहमत श्रीरामानुजाचार्य के
अनुयायियों को छोड़कर अन्यसंप्रदायी वैष्णव भी नहीं हैं
और ऊर्ध्वपुण्ड्र के विषय में निर्णयसिन्धु आदि ग्रन्थों में भी
अनेकानेक संकीर्ण वाक्य प्राप्त होते हैं जिनका निर्णय अल्प-
साधन से दुःशक है । वैष्णव चार संप्रदायों के जो चार
आचार्य हुए हैं उनमें श्रीरामानुजस्वामी भारी विद्वान् हुए,
आप जिस संप्रदाय में दीक्षित हुए उसके प्रथमाचार्य
श्रीशठकोप शूद्रजातीय थे, यह वृत्त श्रीनिवासाचार्यकृत
दिव्यसूरिचरित्र नामक ग्रन्थ के चौथे सर्ग से ज्ञात होता है
और उनके विषय में-
'विचक्षणो विश्वविमोहहेतुः
कुलोचिताचारकलानुपक्तः ।
पुण्ये महीसारपुरे विधाय
विक्रीय शूर्पं विचचार योगी ॥'
यह श्लोक भी सुप्रसिद्ध है ।
आधुनिक वैष्णवों का शैवों के साथ द्वेष क्यों जब
शैव, विष्णु को पूज्यतम मानते हैं, और तुलसी आदिका
१ यहां शैवशब्द से स्मार्त उपासकमात्र का ग्रहण है ।

· ६८ मनुस्मृति ।
शिवपूजन में उपयोग करते हैं, विष्णुचरणामृत तथा एकादशी-
जन्माष्टमीव्रत से पराङ्मुख नहीं हैं, इस दशा में पूर्वापर
विचार से यही ज्ञात होता है कि जब श्रीशठकोप आदि
शूद्राचार्य के संप्रदाय में श्रीरामानुज आदि ब्राह्मण व्यक्ति
दैववशात् प्रवृत्त हुए और ये लोग अपने ब्राह्मणसमाज में
शूद्राचार्यक होने के कारण हीनदृष्टि से व्यवहृत हुए तब
कुपित होकर इन लोगों ने अपने संप्रदाय के प्रतिष्ठार्थ अनेक
ग्रन्थ और वाक्य बनाये तथा श्रुति-स्मृति को गौरवार्थ ढाल
बनाया । जो अन्य वैष्णव भी इनके आचार से सहमत हुए वे
भी इन लोगों की तरह शैवद्वेषी हुए । बाक़ी संप्रदायी वैष्णव
भी शैवद्वेषी न हुए । जैसे वल्लभ-संप्रदायी वैष्णव लोग.... ।
'परमेश्वरैक्य' प्रकरण में पञ्च देवताओं का ऐक्य अनेक
प्रकार से सिद्ध होचुका है । अब विष्णु और शिव के कति-
पय घनिष्ठ संबन्धों को दिखलाते हैं-जब शिव, विष्णुपदी
(गङ्गा) को धारण करते हैं और विष्णु, शिवकृपा से प्राप्त
चक्र (सुदर्शन) को धारण करते हैं तथा विष्णु-शिव मिल-
कर हरिहर (हरिहरावतार) बने; तब उपास्यों के ऐसे
हिलमिल बर्ताव में उपासकों का अनमिल बर्ताव क्यों ? और
१ 'गाङ्गं वारि मनोहारि मुरारिचरणच्युतम् । त्रिपुरारिशिरश्चारि पापहारि
पुनातु माम् ॥'
२ 'हरिस्ते साहस्त्रं कमलवलिमाधाय पदयोर्यदेकोने तस्मिन्निजमुदहरन्नेत्रकमलम् ।
गतोभक्त्युद्रेकः परिणतिमसौ चक्रवपुषा त्रयाणां रक्षायै त्रिपुरहर जागर्त्ति जगताम् ॥'
३ अर्धे दानववैरिणा गिरिजयाप्यर्धे शिवस्याहृतं देवेत्थं जगतीतले स्मरहराभावे
समुन्मीलति । गङ्गासागरमम्बरं शशिकला नागाधिपः क्ष्मातलं सर्वज्ञत्वमधीश्वरत्वमगमत्त्वां
मां च भिक्षाटनम् ॥'

भूमिका । ६६
विष्णुने रामरूप से रामेश्वर ( लिङ्ग ) की स्थापना की तथा
कृष्णरूप से पुत्रार्थ शिव की तपस्या की, ये बातें रामायण
और भारत आदि में विख्यात हैं । और देखिये शिवकी
दिव्यमूर्ति की यह महिमा लिखी है-
' तवैश्वर्यं यत्नाद् यदुपरि विरञ्चिर्हरिरधः
परिच्छेत्तुं यातावन्नलमनलस्कन्धवपुषः ।
ततो भक्तिश्रद्धाभरगुरुगृणद्भ्यां गिरिश य-
त्स्वयं तस्थे ताभ्यां तव किमनुवृत्तिर्न फलति ॥ १ ॥
और देखिये इतिहास-पुराणधुरन्धर रोमहर्षण ( सूत )
का नैमिषीय ऋषियों के प्रति यह वचन है-
' विष्णुर्विश्वजगन्नाथो विश्वेशस्य शिवस्य तु ।
आज्ञया परया युक्तो व्यासो जज्ञे गुरुर्मम ॥ '
( सूतसंहिता माहात्म्यखण्डे १ अध्या० ४२ श्लो० )
इत्यादि अनेकानेक प्रमाणों से विशिष्टाद्वैतवाद के
अनुसार विष्णु शिव के मूर्तिभेद मानने पर भी उनका परस्पर
पूज्य-पूजक वा ध्यातृ-ध्येय भाव के निर्बाध होने से जगत् की
एक स्वामिकता में विरोध नहीं है ।
और जो स्मृति-पुराण-महर्षियों को गुण विभाग से विभक्त
मानते हैं, तथा विष्णु के अतिरिक्त शिवादि मोक्ष को नहीं
दे सकते-इत्यादि गीत गाया करते हैं; वे सब बातें वास्तविक
विचार से विरुद्ध हैं । यह मात्स्य वचन है-
' यस्मिन् कल्पे च यत्प्रोक्तं पुराणं ब्रह्मणा पुरा ।
तस्य तस्य च माहात्म्यं तत्स्वरूपेण वर्ण्यते ॥
अग्नेः शिवस्य माहात्म्यं तामसेषु प्रकीर्तितम् ।
राजसेषु च कल्पेषु माहात्म्यं ब्रह्मणो विदुः ॥

१०० मनुस्मृति ।
संकीर्णेषु सरस्वत्या पितॄणां च निगद्यते ।
सात्त्विकेषु च कल्पेषु माहात्म्यमधिकं हरेः ॥
तेष्वेव योगसंसिद्धा गच्छन्ति परमां गतिम् ॥ '
यह स्मृतिविभाग है-
' मानवी याज्ञवल्की च आत्रेयी दाक्षिणी तथा ।
कात्यायनी वैष्णवी च राजसी स्वर्गदा स्मृतिः ॥
शाङ्खी चौशनसी देवि तामसी नियमप्रदा ।'
यह पुराणविभाग है-
"वैष्णवं नारदीयं च तथा भागवतं शुभम् ।
गारुडं च तथा पाद्मं वाराहं शुभदर्शनम् ॥
षडेतानि पुराणानि सात्त्विकानि मतानि मे ।"
ब्रह्माण्डं ब्रह्मवैवर्तं मार्कण्डेयं तथैव च ।
भविष्यद् वामनं ब्राह्मं राजसानि मतानि मे ॥'
'मात्स्यं कौर्मं तथा लैङ्गं शैवं स्कान्दं तथैव च ।
आग्नेयं च षडेतानि तामसानि मतानि मे ॥'
यह महर्षिविभाग है-
' कणादं गौतमं शक्तिमुपमन्युं च जैमिनिम् ।
कपिलं चैव दुर्वासं मृकण्डुं च बृहस्पतिम् ॥
भार्गवं जमदग्निं च दशैतांस्तामसानृषीन् ।'
यह मोक्षहेतु है-
' पश्यत्येनं जायमानं ब्रह्मा रुद्रोऽथवा पुनः ।
रजसा तमसा चैव मानसं समभिप्लुतम् ॥
जायमानं हि पुरुषं यं पश्येन्मधुसूदनः ।
सात्त्विकः स तु विज्ञेयः स वै मोक्षार्थचिन्तकः ॥'
यहां ये सब वाक्य सात्त्विक गुण के अभिप्राय से आपाततः

भूमिका।

विष्णु में समन्वित किये गये हैं पर इन वाक्यों की सुप्रसिद्ध
वर्णाश्रम व्यवस्थापक ग्रन्थों के साथ एकवाक्यता होनी
असंभव है।

मन्वादि-शास्त्रानुसार कल्प ( ब्रह्मदिन ) कृत, त्रेता,
द्वापर, कलि तथा मन्वन्तरसंज्ञक कालविभाग से विभक्त
माना गया है; और कृतादि विभाग के अनुसार ही धर्म, ज्ञान,
वैराग्य, ऐश्वर्यात्मक सात्त्विक भाव पादक्रम से न्यून कहागया
है; और एक गुणोपाधिक कार्य ब्रह्म की उपासना कहीं नहीं
है, किन्तु सर्वगुणोपाधिक कारण ब्रह्मही की उपासना सर्वत्र
कही है; अत एव उनके सर्वगुणमय चरित्र इतिहास-पुराणों
में जगमगा रहे हैं; और एककर्तृक लोकव्यवस्था मानने में
एकत्रही राजस, सात्त्विक, तामस गुणों का उपसंहार है,
वासनाभेद से वह ( अधिष्ठान ) चाहे राम-कृष्ण नाम से
उपास्य हो वा विष्णु-शिव नाम से उपास्य हो; और उपास्य-
प्राप्ति ( मोक्ष ) भक्ति-ज्ञान से है, भक्ति-ज्ञान की उत्पत्ति
अन्तःकरण शुद्धि से कही है; ऐसी दशा में व्युत्थान काल में
वर्णाश्रममर्यादा के बांधनेवाले मन्वादि तथा ज्ञाननिष्ठ
कपिलादि, काल्पनिक सात्त्विक-राजस-तामस कल्प ( कोटि )
से क्यों घसीटे जाते हैं ? और यह खैंचातानी भगवान् वेद-
पुरुष तक क्या नहीं पहुँची ? अवश्य पहुँच कर उनको ढीला
करदिया ।

काल की दशा-

‘ भिन्ना व्याकृतिदण्डनेन शतधा वेदोऽर्थतः पाठ्यते
तत्पोष्याः स्मृतयोऽवसन्नमनसोऽङ्गाङ्गात्समुद्धाम्यता'

और यथाप्रसङ्ग आगे ज्ञानकाण्ड में आवेंगे ।

१०२ मनुस्मृति ।
काको हंसति हंस एति बकतां वर्णोऽन्यवर्णायते
पीत्वा मोहमयीं प्रमादमदिरामुन्मत्तभूतं जगत् ॥ १६६ ॥'
उक्त विषय के सहायक प्रमाण-वाक्य पहिले आचुके हैं
और यथाप्रसङ्ग आगे ज्ञानकाण्ड में आवेंगे ।
मन्त्र और उसका अर्थ देवता, इन दोनों का जैसे श्रुति-
स्मृति में प्रतिपादन है वैसाही उनका तन्त्र ( आगम ) में भी
पूर्ण प्रतिपादन है । पहिले विष्णु-शिव की एकता लिखी जा
चुकी है अब देखिये ब्रह्मा, विष्णु, शिव नवार्णमन्त्र-प्रतिपाद्य
शक्ति के ऋषि कहे हैं; तथा अन्यान्य तन्त्रों में राम-कृष्ण की
उपास्य अन्यान्य शक्ति लिखी हैं, तथा मन्त्रशास्त्रीय-बीज
( वर्णविशेष ) राम-कृष्ण के मन्त्र में पड़े हैं, पढ़िये रामतापनी-
गोपालतापनी उपनिषत् । तथा ओडचाणपाठस्थायी श्री
जगन्नाथजी के प्रसादभक्षण की व्यवस्था को देखकर कति-
पय लोग उसे वामाचरण ठहराते हैं, इसीके आस पास श्री
बदरीनारायण में अटके की हाल है । इधर प्रायः सब संप्र-
दायी वैष्णवलोग अपने अपने संप्रदायानुसार दीक्षितलोगों
में वर्णभेद का आदर नहीं रखते इत्यादि ।
३ ज्ञानकाण्ड। उपासनाकाण्ड में सविशेष-ब्रह्म (साकार)
का विस्तारपूर्वक निरूपण होचुका है । अब निर्विशेष-ब्रह्म
(निराकार) का निरूपण किया जाता है। यद्यपि वर्तमान-
काल में ज्ञानमार्ग के अधिकारी देखने में नहीं आते, जो
दीखते हैं वे कर्मभीरु वा कर्म के अनधिकारी होने के कारण
ज्ञान का शरण ले रहे हैं तो भी ' कालोह्ययं निरवधिर्विपुला
च पृथ्वी ' की न्याय से कोई ज्ञानमार्ग के भी अधिकारी
होंगे इस दृष्टि से उसके मन्तव्य विषय में कुछ सिद्धान्त लिखते

भूमिका । १०३
हैं। परमेश्वर के निर्विशेषरूप का निरूपण ( अशब्दमस्पर्श-
मरूपमव्ययं-' इस श्रुति में किया है और इसी अभिप्राय की
ये श्रुतियां हैं-
‘ अदृष्टमव्यवहार्यमग्राह्यमलक्षणमचिन्त्यमपदेश्यमैकात्म्यप्र-
त्ययसारम्प्रपञ्चोपशमं शान्तं शिवमद्वैतं चतुर्थं मन्यन्ते स
आत्मा स विज्ञेयः। ' माण्डूक्य.
‘यत्तददृश्यमग्राह्यमगोत्रमवर्णमचक्षुःश्रोत्रं तदपाणिपादं नित्यं
विभुं सर्वगतं सुसूक्ष्मं तदव्ययं तद्भूतयोनिं परिपश्यन्ति
धीराः।' मुण्डक.
‘ यत्र हि द्वैतमिव भवति तदितर इतरं पश्यति-’ इत्यादि।
बृहदारण्यक.
इन सिद्धान्त श्रुतियों से निर्विशेष ब्रह्म ( निराकार )
अर्थात् नाम-रूप आदि समस्त उपाधि से रहित केवल सच्चिदा-
नन्द ज्ञात होता है । इसी कारण वह श्रुति-स्मृतिरूप नेत्रही
से कथमपि देखने योग्य है अन्य नेत्रद्वारा नहीं देखा जा
सकता। यही बात इन श्रुति-स्मृतियों से स्पष्ट है-
‘ पराञ्चिखानि व्यतृणत् स्वयंभूः
तस्मात् पराङ् नान्तरात्मम् ।
कश्चिद् धीरः प्रत्यगात्मानमैच्छ-
दावृत्ते चक्षुरमृतत्वमिच्छन् ॥ '
कठ.
'भावार्थ-परमेश्वर ने इन्द्रियों को आत्मा के ग्रहण करने '
में समर्थ नहीं बनाया इस कारण वे स्थूल पदार्थ ही का ग्रहण
कर सकती हैं उस आत्मा के प्रत्यक्षकरने में असमर्थ हैं ।

१०४ मनुस्मृति ।
कोई सा जितेन्द्रिय महापुरुष मोक्ष की वासना से शास्त्रद्वारा
आत्मा का प्रत्यक्ष करता है ।
‘चक्षुषा गृह्यते नापि वाचा
नान्यैर्देवैस्तपसा कर्मणा वा ।
ज्ञानप्रसादेन विशुद्धसत्त्व-
स्ततस्तु तं पश्यते निष्कलं ध्यायमानः ॥’
मुण्डक.
‘यं विनिद्रा जितश्वासाः संतुष्टाः संयतेन्द्रियाः ।
ज्योतिः पश्यन्ति युञ्जानास्तस्मै योगात्मने नमः ॥’
स्मृति.
और यही आशय ‘अपि संराधने प्रत्यक्षाऽनुमानाभ्याम्’
(वे०द० ३।२।२४) इस सूत्र का है तथा इस कल्पतरु
के श्लोक का है—
‘अपि संराधने सूत्राच्छास्त्रार्थध्यानजाप्रमा ।
शास्त्रदृष्टिर्मता तां तु वेत्ति वाचस्पतिः परः ॥’
इत्यादि प्रमाणों से स्पष्ट है कि उस निर्विशेष (निराकार)
परात्मा का चाक्षुष प्रत्यक्ष नहीं होता वह केवल ज्ञानगम्य है।
और जो कहीं इसका प्रत्यक्ष होना लिखा है वह सब मायासृष्टि
है, इसीलिये ‘माया ह्येषा मया सृष्टा यन्मां पश्यसि नारद’
यह कहा है। और यही अभिप्राय भगवद्गीता में अर्जुन ने
भगवान् के दिव्यरूप को जो देखा है उसका है। कृष्ण-भगवान्
के साधारण अवतारस्वरूप को तो उस समय के सबलोग
देखते ही रहे। यही बात रामावतार में भी जाननी चाहिये ।
सविशेष और निर्विशेष इन दो विशेषणों से ब्रह्म दो
प्रकार का जाना जाता है उनमें सविशेष अर्थात् नाम-रूप की

भगवान् वेदव्यास ने तृतीयाध्याय के दूसरे पाद में भली

भूमिका । १०५

विचित्रता' से अनेक रस ब्रह्म ( साकार ) के लिये है, परमार्थ
में वह निर्विशेष ( निराकार ) ही है, इस सब सिद्धान्त को
भगवान् वेदव्यास ने तृतीयाध्याय के दूसरे पाद में भली
भांति कहा है, जिसके संग्राहक पूर्वपक्षसिद्धान्तरूप श्रीभारती
तीर्थ के ये श्लोक हैं-
'ब्रह्म किं ? रूपि, वाऽरूपं, भवेन्नीरूपमेव वा ।
द्विविध-श्रुतिसद्भावाद् ब्रह्म स्याद्-उभयात्मकम् ॥
नीरूपमेव वेदान्तैः प्रतिपाद्यमपूर्वतः ।
रूपं त्वनूद्यते भ्रान्तम्, उभयत्वं विरुध्यते ॥'
उक्त ब्रह्म की प्राप्ति में ज्ञान ही एक साधन है, ज्ञान के
बिना ब्रह्म नहीं पहिचाना जाता, ब्रह्मलाभ-ब्रह्मदर्शन-ब्रह्म
साक्षात्कार ज्ञानही से होता है; यही श्रुति, स्मृति, इतिहास
और पुराण आदिकों का आदेश-उपदेश-सुभाषित-सारांश
है। विवेक, वैराग्य, शम, दम, श्रद्धा, समाधान, उपराम, तितिक्ष-
षाषट्क, मुमुक्षुता, श्रवण, मनन, निदिध्यासन और तत्त्वं पदार्थ-
शोधन, ये आठ ज्ञान के अन्तरङ्ग साधन हैं और कर्म बहिरङ्ग
साधन है। अत एव ब्रह्म (आत्मा) के साक्षात्कार में ज्ञान
और कर्म का परमार्थदृष्टि से समुच्चय, वा विकल्प, वा अङ्गाङ्गि-
भाव कथमपि नहीं है। उक्त विषय में कतिपय प्रमाण-वाक्य
लिखते हैं-
'न कर्मणा न प्रजया धनेन-'
'नान्यैर्देवैस्तपसा कर्मणा वा-'
'तद्विज्ञानेन परिपश्यन्ति धीराः-'
इत्यादि श्रुति.

१२०६ । मनुस्मृति ।
'ज्ञानं निःश्रेयसं प्राहुर्दृढा निश्चयदर्शिनः ।
तस्माज्ज्ञानेन शुद्धेन मुच्यते सर्वपातकैः ॥'
'व्रतानि दानानि तपांसि यज्ञाः
सत्यं च तीर्थाश्रमकर्मयोगाः ।
स्वर्गार्थमेवाशुभमध्रुवं च
ज्ञानं ध्रुवं शान्तिकरं महार्थम् ॥'
'अर्थस्य मूलं निकृतिः क्षमा च
कामस्य रूपं च वपुर्वयश्च ।
धर्मस्य यागादि दया दमश्च
मोक्षस्य सर्वोपरमः क्रियाभ्यः ॥'
इत्यादि स्मृति.
किंबहुना, प्रतितन्त्र सांख्यदर्शन में भी कहा है कि—
'ज्ञानान्मुक्तिः । बन्धो विपर्ययात् । नियतकारणत्वाच्च
समुच्चय-विकल्पौ । स्वप्नजागराभ्यामिव मायिका मायिकाभ्यां
नोभयोर्मुक्तिः पुरुषस्य' (३ अध्याय २३-२६ सूत्र.)
तथा भगवद्गीताभाष्य में भगवत्पाद ने भी केवल ज्ञान
ही से मोक्षप्राप्ति कही है और अन्त में तात्पर्य-निर्णायक भाष्य
में गीताशास्त्र का रहस्य दिखलाया है । प्रमाणवाक्य—
'तस्माद् गीतासु केवलादेव तत्त्वज्ञानान्मोक्षप्राप्तिः, न कर्म-
समुच्चितादिति निश्चितोऽर्थः' ।
ऐसी दशा में भी ज्ञान कर्म की सहानुभूति के लिये
श्रीभाष्य में यह एक अलौकिक कल्पना की है कि जैमिनि
की द्वादशाध्यायी (पूर्वमीमांसा) अपने परिशिष्ट चतुरध्यायी
(संकर्षणकाण्ड) के साथ षोडशाध्यायी बनती है, इस षोडशा-
ध्यायी और वेदान्तचतुरध्यायी (ब्रह्मसूत्र) की जो एकविंशत्य-

ध्यायी ( १२ अध्याय पूर्वमीमांसा + ४ अध्याय संकर्षण-

: भूमिका । १०७

ध्यायी ( १२ अध्याय पूर्वमीमांसा + ४ अध्याय संकर्षण-
काण्ड + ४ अध्याय उत्तर मीमांसा=२० अध्याय ) बनती है।
उसको एक शास्त्र मानना चाहिये । भला देखिये तो सही प्रवृत्ति
निवृत्तिरूप धर्मों के भेद से जिज्ञासा के भेद होने पर भी उनके
भिन्नप्रतिपादक शास्त्रों को एक बना देना कैसी उद्दण्डता है ।
कई एक वादी सविशेष ब्रह्म ( साकार ) ही को उपास्य
मानते हैं निर्विशेष ब्रह्म ( निराकार ) को उपास्य नहीं बत-
लाते परन्तु यह बात अविचारित रमणीय है । जब श्रुति
स्मृतियों में दोनों की उपासना कही है तब एकही की उपा-
स्यता क्यों ? अधिकारिभेद से दोनों की उपासना क्यों नहीं ?
सविशेष ब्रह्म के नानात्व के कारण उसकी उपासना का भी
नानात्व है अर्थात् ध्येयाकार के भेद से ध्याता के धारणा,
ध्यान, समाधि ( संयम ) और उपचार भिन्न हैं, इधर अन्त में
विशेषक-गुणों का उपसंहार मानकर निर्विशेष ही पर विश्राम
होता है भलेही वह एक विषयक-विशेष ( आकार ) क्यों
न हो, श्रुतिसिद्ध अव्याकृतावस्था तो शिर पड़ी है, इस
कारण निर्विशेष ब्रह्म प्रधान है उसके एकत्व के कारण उसकी
उपासना धारणा-ध्यान-समाधि एकाश्रित है, और ब्रह्म के
निर्विशेषत्व का निरूपण करके उसके साक्षात्कार का मोक्ष-
रूप फल इस सिद्धान्तश्रुति में प्रसिद्ध है-
'अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययं
तथाऽरसं नित्यमगन्धवच्च यत् ।
अनाद्यनन्तं महतः परं ध्रुवं
निचाय्य तन्मृत्युमुखात् प्रमुच्यते ॥'
कठोपनिषद्.

१०८ मनुस्मृति।

˙ऐसी अवस्था में सविशेष पक्ष लेकर विष्णु वा शिव के
ऐच्छिक एकही आकार पर अथवा ऐच्छिक आकार के उप-
संहार पर निर्भर होकर ब्रह्मसूत्रों की योजना करना ऐच्छिक
व्याख्या ( ब्रह्मसूत्र-भाष्य ) नहीं है तो और क्या है ? उसे
क्या कहना चाहिये ? देखिये यदि किसी संहिता ब्राह्मण-
भाग, वा तदाश्रित ब्रह्मसूत्र में विष्णु वा शिव का सविशेष
( आकारघटक लिङ्ग ) प्राप्त होता तो पुराणों की तरह सविशेष
( विष्णु शिव आदि ) के अभिप्राय से ब्रह्मसूत्र की व्याख्या
करने में क्या दोष था ? कुछ भी नहीं । पर ऐसा न होने से
भगवान् वेदव्यास ने निर्विशेष के लक्ष्य से तदनुकूल 'ब्रह्म'
शब्द का प्रयोग 'अथातो ब्रह्मजिज्ञासा' इस शास्त्रारम्भ के सूत्र
में किया । ऐसी दशा में सविशेष पक्ष का आलम्बन करके
'ब्रह्म' शब्द का केवल विष्णु वा केवल शिव अर्थ करना
एकदेशीय-मत है। अत एव ये सब व्याख्यान एकदेशी हैं—
'ब्रह्मशब्देन च स्वभावतो निरस्तनिखिलदोषोऽनवधिकाति-
शयासंख्येयकल्याणगुणगणः पुरुषोत्तमोऽभिधीयते' श्रीभाष्य।
'अनन्ताचिन्त्यस्वाभाविकस्वरूपगुणशक्त्यादिभिर्बृहत्तमो यो
रमाकान्तः पुरुषोत्तमो, ब्रह्मशब्दाभिधेयः—' वेदान्तपा-
रिजातसौरभ.
'ब्रह्मशब्दश्च विष्णावेव' पूर्णप्रज्ञदर्शन.
तात्पर्य यह है कि 'सविशेष ब्रह्मवाद' में भी ब्रह्मशब्द
केवल विष्णु का वाचक नहीं होसकता क्योंकि ब्रह्मशब्द का
विष्णु में शक्तिग्रह नहीं है इसीलिये श्रुति स्मृति में ब्रह्म विष्णु
शिव आदि शब्द पर्याय ( प्रयोगप्रवाह से एकार्थक ) नहीं
माने गये । यदि वेदान्तप्रक्रिया से ब्रह्मशब्द का विष्णु अर्थ

माना जाय तब उसके शिवादि अर्थ भी किसी तरह खण्डित

माना जाय तब उसके शिवादि अर्थ भी किसी तरह खण्डित
नहीं होसकते अर्थात् ब्रह्मशब्द पञ्चदेवतावाचक हुआ । विज्ञान-
भिक्षु ने भी कहा है कि-
“ यत्त्वाधुनिकाः केचन परस्य साक्षादपि लीलावग्रहं
कल्पयन्ति तदप्रामाणिकम्, विष्ण्वादीनामेव लीलावतारश्रव-
णात् । विष्ण्वादीनां च परमात्मन्येवाहं भावात्तेषामवतारा एव
परमेश्वरावतारतया श्रुतिस्मृतिषूच्यन्ते । तेन तु ते भ्रान्ताः
‘न तस्य कार्यं करणं च विद्यते-’ इत्यादि श्रुतिभ्यः परमे-
श्वरस्य कार्यकारणाख्यशरीरद्वयप्रतिषेधात् । ‘अनादिमत् परं
ब्रह्म सर्वदेहविवर्जितम् ’ इत्यादि स्मृतिभ्यश्चेति दिक् । ”
तथा-‘ब्रह्मविष्णुशिवादीनां यः परः स महेश्वरः ’ इति ।
( योगवार्तिक. )
और उक्तरीति से ब्रह्मशब्द केवल पञ्चदेवतामात्र का
वाचक नहीं है, किंतु राम-कृष्ण आदि इतिहास-पुराण-तन्त्र
प्रसिद्ध अनेकानेक लीलावग्रह का भी वाचक है । यही
तात्पर्य रामतापिनी-गोपालतापिनी आदि ग्रन्थों से स्पष्ट ज्ञात
होता है- ( राम )
‘ रमन्ते योगिनोऽनन्ते नित्यानन्दे चिदात्मनि ।
इति रामपदेनासौ परं ब्रह्माभिधीयते ॥
चिन्मयस्याद्वितीयस्य निष्कलस्याशरीरिणः ।
उपासनानां कार्यार्थे ब्रह्मणो रूपकल्पना ॥
रूपस्थानां देवतानां पुंस्त्र्यङ्गाङ्गादिकल्पना ।
द्विचत्वारिषडष्टासां दश द्वादश षोडश ॥
अष्टादशापि कथिता हस्ताः शङ्खादिभिर्युताः ।
सहस्रान्तास्तथा तासां वर्णवाहनकल्पना ॥

११० मनुस्मृति ।

शक्तिसेनाकल्पना च ब्रह्मह्येवं हि पञ्चधा ।
कल्पितस्य शरीरस्य तस्य सेनादिकल्पना ॥
रामतापनी.
( कृष्ण )
‘कृषिर्भूवाचकः शब्दो णश्च निर्वृत्तिवाचकः ।
तयोरैक्यं परंब्रह्म कृष्ण इत्यभिधीयते ॥’
गोपालतापनी.
‘कृष्यते विलिख्यते इति कृट्, भूमिः सर्वाधारः, निर्वृत्तिः
आनन्दः सुखम्; तयोरैक्यं सामानाधिकरण्यम् । तच्च यदा कर्म-
धारयेण भवति तदा परंब्रह्म कृष्णे इति शब्देनाभिधीयते ।
अथवा भूग्रहणं दृश्योपलक्षणम् , निर्वृत्तिः सुखस्वरूपं ब्रह्म,
तयोरैक्यम् अध्यासन्निवृत्त्या शुद्धात्मतापादनम् ।’ इति
नारायणः।
पश्चात्ताप का विषय है कि जब शास्त्रों में अथ से इति
तक यथास्थान निर्विशेष ब्रह्म का प्रतिपादन प्राप्त होता है
और उसी का प्राधान्य माना है; केवल उपासनार्थ सविशेष
ब्रह्म का निरूपण किया है; और निर्विशेष ब्रह्म की सिद्धि
के लिये अद्वैतवाद तथा उसके उपयोगी अध्यासवाद
विवर्तवाद आदि श्रुति युक्तिसिद्ध पदार्थ कल्पना किये हैं
और यह अद्वैतवाद आत्मसाक्षात्कार के पश्चात् अनुभव में
आता है यह बात—
‘देहात्मप्रत्ययो यद्वत्प्रमाणत्वेन कल्पितः ।
लौकिकं तद्वदेवेदं प्रमाणं त्वाऽऽत्मनिश्चयात् ॥’
इत्यादि श्रुति-स्मृति-युक्ति-सिद्ध प्रमाणों से स्पष्ट है और
व्यवहार दशा में द्वैतवाद ही मानागया है तोभी हठात् संप्र-

दायियों ने निर्विशेषवाद खण्डनपूर्वक सविशेषवाद की सिद्धि

भूमिका । १११
दायियों ने निर्विशेषवाद खण्डनपूर्वक सविशेषवाद की सिद्धि
के लिये दुर्व्याख्याओं से भगवान् वेदव्यास के ब्रह्मसूत्रों को
आकुल कर दिया है और मायावाद के विरोधी होकर भी
श्रुति स्मृतियों को साधारण लोगों के लिये घोर मायावाद में
पटक दिया है, एवं कुकर्म से जो प्रत्यवाय होता है वह धर्मशास्त्र
में छिपा नहीं है । अब साधारण लोगों के भी समझ में आने
योग्य निर्विशेष ब्रह्म की प्रतिपादक कुछ श्रुतियां दिखलाते हैं,
जिनमें दृढ़ता के लिये वार वार उसी बात की चर्चा की गई है-
'यद्वाचानभ्युदितं येन वागभ्युद्यते ।
तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते ॥
यन्मनसा न मनुते येनाहुर्मनो मतम् ।
तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते ॥
यच्चक्षुषा न पश्यति येन चक्षूंषि पश्यति ।
तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते ॥
यच्छ्रोत्रेण न शृणोति येन श्रोत्रमिदं श्रुतम् ।
तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते ॥
यत्प्राणेन न प्राणिति येन प्राणः प्रणीयते ।
तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते ॥'
( निचाय्यतन्मृत्युमुखत्प्रमुच्यते )
केनोपनिषत्.
कई एक कारणों से ब्रह्मसूत्र ( वेदान्तदर्शन ) का अर्थ वही
माननीय (श्रवण-मनन-निदिध्यासनयोग्य) है जिसको भगवत्पादने
शारीरक-भाष्य में लिखा है और जिसका विस्तार ईश-केन-कठ-
प्रश्न-मुण्ड-माण्डूक्य-तैत्तिरीय-छान्दोग्य-बृहदारण्य-ऐतरेय उप-
निषदों के भाष्यों में तथा श्री ६ गीताभाष्य में किया है ।

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११२ मनुस्मृति ।
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कारण- ' श्रौतस्मार्तप्रतिष्ठार्थं भक्तानां हितकाम्यया ।
उपदेक्ष्यति तज्ज्ञानं शिष्याणां ब्रह्मसंमितम् ॥
' युगे युगे ममांशश्च हरांशश्चैव शङ्करः ।
उद्धरिष्यति मे मूर्तीस्तावकीनहृदाच्छुभात् ॥'
इत्यादि प्रमाणों से श्री ६ शङ्कर-भगवत्पाद का अवतार
वेदान्त-सिद्धान्त तथा श्रौत-स्मार्त कर्म के स्थापन के लिये
हुआ है।
भगवत्पाद श्रीवेदव्यास की शिष्यपरम्परा में परिगणित
हैं इसलिये व्यासकृत ब्रह्मसूत्रों का आशय जो उन्होंने वर्णन
किया है वही प्रामाणिक है।
भगवत्पाद ने श्रुतियों के आधार पर जिस अद्वैतवाद के
अनुसार प्रस्थानत्रय का भाष्य किया है वही भगवान् वेदव्यास
का आशय था, वह भारत के अनेक स्थलों में विभक्त है जिसका
परिचय इस भारतीय-माङ्गलिक-श्लोक से भी होता है—
'नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम् ।
देवीं सरस्वतीं चैव ततो जयमुदीरयेत् ॥'
श्रीलक्ष्मणार्यश्रित-नीलकण्ठव्याख्या—' नरोऽविद्यावच्छिन्नं
चैतन्यं जीवः, तेन विषयीकृतेऽनवच्छिन्नचैतन्यरूपे ब्रह्मणि, शुक्तौ
रजतवत् कल्पितं चराचरमप्-शब्दवाच्यं नारम्, तदेव अयनं
शुक्तीदमंशस्य रजतमिव प्रवेशस्थानं यस्य स नारायणः।
स्वस्मिन् जीवकल्पितस्य प्रपञ्चस्य सत्तास्फूर्तिमदत्वेन कारणीभूत
इत्यर्थः । यथोक्तम्—'आपो नारा इति प्रोक्ता आपो वै नरसूनवः।
अयनं तस्य ताः पूर्वं तेन नारायणः स्मृतः ' इति । तं नारायणं
नमस्कृत्य । तथा नरमुक्तरूपं नमस्कृत्य; एनं विशिनष्टि-नरो-
त्तममिति । जीवो हि चेतनत्वेन जडवर्गादुत्कृष्टः, तत उत्कृष्टतरः

भूमिका । ११३
कारणात्मा नारायणः, ततोऽप्युत्कृष्टतमं निरुपाधि चैतन्यम् 'सत्यं
ज्ञानमनन्तं ब्रह्म-विज्ञानमानन्दं ब्रह्म' इत्यादि श्रुतिषु प्रसिद्धम् ।
तदेव नरोत्तमस्य निरस्ताविद्यस्य जीवस्य निष्प्रपञ्चं पारमा-
र्थिकं रूपमिति युक्तं तत्रोत्तमत्वविशेषणम् । यथोक्तम्-
'पिण्डब्रह्माण्डनेतुत्वान्नरो जीवेश्वरावुभौ ।
तयोश्च नयनाच्छुद्धं ब्रह्मापि नर उच्यते ॥
नरजानामपां कार्यं नारं ब्रह्माण्डमिष्यते ।
तद् यस्य वसति स्थानं तेन नारायणो विभुः ॥
स्वाविद्यासृष्टपिण्डेन तादात्म्यं यो गतो नरः ।
स जीवः स परब्रह्म नरोत्तमपदाभिधम् ॥
तद्द्योतिकां गिरं नत्वा ततो व्यासस्तथैव सन् ।
संसारजयिनं ग्रन्थं जयनामानमीरयेत् ॥
एवं जीवाविद्याकल्पितत्वाज्जगतो मिथ्यात्वम्, ब्रह्मणश्च
तत्र सत्तास्फूर्तिमदत्वेन सत्यत्वम्, जीवस्य तदभिन्नत्वं चेति
विषयो दर्शितः । अविद्यानिवृत्तौ तत्कृतस्य प्रपञ्चस्य त्रैका-
लिकवाधाद् आत्यन्तिकी अनर्थनिवृत्तिः प्रयोजनम् ।
भारत के पूर्व ग्रन्थ अध्यात्मरामायण ( रामहृदय-
रामगीता) और योगवासिष्ठ में भी अद्वैतवाद की परिपूर्ण
चर्चा है । किं बहुना, भेदवादसंबन्धी व्यावहारिक दशा को
छोड़ कर पारमार्थिक दशा में सर्वत्र अद्वैतवादही का प्राधान्य
है और अन्यान्य मार्गावलम्बी लोगों ने भी अद्वैतवादही का
आदर किया है । और पद्मपुराण के निम्नलिखित वाक्यों
से जो निन्दा प्राप्त होती है वह अविचारित-रमणीय है अर्थात्
जब तक उन वचनों का विचार न किया जावे तब तक ही वे

११४ मनुस्मृति ।
वचन और निन्दा सत्य प्रतीत होते हैं विचार के बाद सब
निर्मूल हैं—
' शृणु देवि प्रवक्ष्यामि तामसानि यथाक्रमात् ।
येषां श्रवणमात्रेण पातित्यं ज्ञानिनामपि ॥
प्रथमं हि मयैवोक्तं शैवं पाशुपतादिकम् ।
मच्छक्त्यावेशितैर्विप्रैः संप्रोक्तानि ततः परम् ॥
काणादेन च संप्रोक्तं शास्त्रं वैशेषिकं मतम् ।
गौतमेन तथा न्यायं सांख्यं तु कपिलेन च ॥
धिषणेन तथा प्रोक्तं चार्वाकमतिगर्हितम् ।
दैत्यानां नाशनार्थाय विष्णुना बुद्धरूपिणा ॥
बौद्धशास्त्रमसत् प्रोक्तं नग्ननीलपटादिकम् ।
मायावादमसच्छास्त्रं प्रच्छन्नं बौद्धमुच्यते ॥
मयैव कथितं देवि कलौ ब्राह्मणरूपिणा ।
अपार्थं श्रुतिवाक्यानां दर्शयल्लोकगर्हितम् ॥
परेशजीवयोरैक्यं मयात्र प्रतिपाद्यते ।
ब्रह्मणोऽस्य परं रूपं नैर्गुण्यं वक्ष्यते मया ॥
सर्वस्य जगतोऽप्यत्र मोहनार्थं कलौ युगे ।
वेदार्थवन्महाशास्त्रं मायावादमवैदिकम् ॥
मयैव वक्ष्यते देवि जगतां क्लेशकारणात् ।
द्विजन्मना जैमिनिना पूर्वं वेदमपार्थतः ॥
निरीश्वरेण वादेन कृतं शास्त्रं महत्तरम् ।
षोडशाध्यायसंयुक्तं तामसं तामसप्रियम् ॥'
पद्मपुराण उत्तरखण्ड.
देखिये—पञ्चरात्र को निकाल दिया है जिसके बारे में
पहिले मतामत का विचार होचुका है । वास्तव में निषिद्ध पाशु-