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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

पृष्ठ 104, कुल 649 में से

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पृष्ठ 104

१०२ मनुस्मृति ।
काको हंसति हंस एति बकतां वर्णोऽन्यवर्णायते
पीत्वा मोहमयीं प्रमादमदिरामुन्मत्तभूतं जगत् ॥ १६६ ॥'
उक्त विषय के सहायक प्रमाण-वाक्य पहिले आचुके हैं
और यथाप्रसङ्ग आगे ज्ञानकाण्ड में आवेंगे ।
मन्त्र और उसका अर्थ देवता, इन दोनों का जैसे श्रुति-
स्मृति में प्रतिपादन है वैसाही उनका तन्त्र ( आगम ) में भी
पूर्ण प्रतिपादन है । पहिले विष्णु-शिव की एकता लिखी जा
चुकी है अब देखिये ब्रह्मा, विष्णु, शिव नवार्णमन्त्र-प्रतिपाद्य
शक्ति के ऋषि कहे हैं; तथा अन्यान्य तन्त्रों में राम-कृष्ण की
उपास्य अन्यान्य शक्ति लिखी हैं, तथा मन्त्रशास्त्रीय-बीज
( वर्णविशेष ) राम-कृष्ण के मन्त्र में पड़े हैं, पढ़िये रामतापनी-
गोपालतापनी उपनिषत् । तथा ओडचाणपाठस्थायी श्री
जगन्नाथजी के प्रसादभक्षण की व्यवस्था को देखकर कति-
पय लोग उसे वामाचरण ठहराते हैं, इसीके आस पास श्री
बदरीनारायण में अटके की हाल है । इधर प्रायः सब संप्र-
दायी वैष्णवलोग अपने अपने संप्रदायानुसार दीक्षितलोगों
में वर्णभेद का आदर नहीं रखते इत्यादि ।
३ ज्ञानकाण्ड। उपासनाकाण्ड में सविशेष-ब्रह्म (साकार)
का विस्तारपूर्वक निरूपण होचुका है । अब निर्विशेष-ब्रह्म
(निराकार) का निरूपण किया जाता है। यद्यपि वर्तमान-
काल में ज्ञानमार्ग के अधिकारी देखने में नहीं आते, जो
दीखते हैं वे कर्मभीरु वा कर्म के अनधिकारी होने के कारण
ज्ञान का शरण ले रहे हैं तो भी ' कालोह्ययं निरवधिर्विपुला
च पृथ्वी ' की न्याय से कोई ज्ञानमार्ग के भी अधिकारी
होंगे इस दृष्टि से उसके मन्तव्य विषय में कुछ सिद्धान्त लिखते