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सर्वकोश
मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

पृष्ठ 101, कुल 649 में से

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भूमिका । ६६
विष्णुने रामरूप से रामेश्वर ( लिङ्ग ) की स्थापना की तथा
कृष्णरूप से पुत्रार्थ शिव की तपस्या की, ये बातें रामायण
और भारत आदि में विख्यात हैं । और देखिये शिवकी
दिव्यमूर्ति की यह महिमा लिखी है-
' तवैश्वर्यं यत्नाद् यदुपरि विरञ्चिर्हरिरधः
परिच्छेत्तुं यातावन्नलमनलस्कन्धवपुषः ।
ततो भक्तिश्रद्धाभरगुरुगृणद्भ्यां गिरिश य-
त्स्वयं तस्थे ताभ्यां तव किमनुवृत्तिर्न फलति ॥ १ ॥
और देखिये इतिहास-पुराणधुरन्धर रोमहर्षण ( सूत )
का नैमिषीय ऋषियों के प्रति यह वचन है-
' विष्णुर्विश्वजगन्नाथो विश्वेशस्य शिवस्य तु ।
आज्ञया परया युक्तो व्यासो जज्ञे गुरुर्मम ॥ '
( सूतसंहिता माहात्म्यखण्डे १ अध्या० ४२ श्लो० )
इत्यादि अनेकानेक प्रमाणों से विशिष्टाद्वैतवाद के
अनुसार विष्णु शिव के मूर्तिभेद मानने पर भी उनका परस्पर
पूज्य-पूजक वा ध्यातृ-ध्येय भाव के निर्बाध होने से जगत् की
एक स्वामिकता में विरोध नहीं है ।
और जो स्मृति-पुराण-महर्षियों को गुण विभाग से विभक्त
मानते हैं, तथा विष्णु के अतिरिक्त शिवादि मोक्ष को नहीं
दे सकते-इत्यादि गीत गाया करते हैं; वे सब बातें वास्तविक
विचार से विरुद्ध हैं । यह मात्स्य वचन है-
' यस्मिन् कल्पे च यत्प्रोक्तं पुराणं ब्रह्मणा पुरा ।
तस्य तस्य च माहात्म्यं तत्स्वरूपेण वर्ण्यते ॥
अग्नेः शिवस्य माहात्म्यं तामसेषु प्रकीर्तितम् ।
राजसेषु च कल्पेषु माहात्म्यं ब्रह्मणो विदुः ॥