मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
३७४ . मनुस्मृति ।
विप्राणां वेदविदुषां गृहस्थानां यशस्विनाम् ।
शुश्रूषैव तु शूद्रस्य धर्मो नैःश्रेयसः परः ॥ ३३४ ॥
शुचिरुत्कृष्टशुश्रूषुर्मृदुवागनहङ्कृतः ।
ब्राह्मणाद्याश्रयो नित्यमुत्कृष्टां जातिमश्नुते ॥ ३३५ ॥
एषोऽनापदि वर्णानामुक्तः कर्मविधिः शुभः ।
आपद्यपि हि यस्तेषां क्रमशस्तन्निबोधत ॥ ३३६ ॥
इति मानवे धर्मशास्त्रे भृगुप्रणीतायां स्मृतौ
नवमोऽध्यायः ॥ ६ ॥
गल्ले के अच्छे-बुरे का हाल, देशों में पदार्थों का भाव, गुण
आदि । समय में खरीद, बेंचने में मुनाफा आदि और पशुओं के
बढ़ने की रीति वैश्य जाना करे । नौकरोंकी नौकरी का परिमाण,
अनेक भाषा, माल ठीक रहने की विधि, खरीदने, बेंचने का ढंग
जाने । धर्मानुसार धन बढ़ाने में परमयत्न करे और सब प्राणियों
को अन्न देय यह सब वैश्यों का कर्त्तव्य है । वेदविशारद विद्वान्,
गृहस्थ, यशस्वी ब्राह्मण आदि की सेवा ही शूद्र का परम सुखदायी
धर्म है । जो शूद्र भीतर बाहर से पवित्र, उत्तमजाति का सेवक,
मधुरभाषी, निरहङ्कार और ब्राह्मणों के आश्रय में रहता है, वह
क्रम से उत्तम जाति में जन्म पाता है । इसप्रकार सुख के समय में
चारों वर्णों के कर्त्तव्य शुभकर्म कहे गये हैं । अब आपत्तिकाल में
चारों वर्णों का बर्त्ताव कहा जाता है ॥ ३३१-३३६ ॥
नवां अध्याय पूरा हुआ ।
अथ दशमोऽध्यायः ।
अधीयीरंस्त्रयोवर्णाः स्वकर्मस्था द्विजातयः।
प्रब्रूयाद् ब्राह्मणस्त्वेषां नेतराविति निश्चयः ॥ १ ॥
सर्वेषां ब्राह्मणो विद्याद्वृत्युपायान् यथाविधि ।
प्रब्रूयादितरेभ्यश्च स्वयं चैव तथा भवेत् ॥ २ ॥
वैशेष्यात्प्रकृतिश्रैष्ठ्यान्नियमस्य च धारणात् ।
संस्कारस्य विशेषाच्च वर्णानां ब्राह्मणः प्रभुः ॥ ३ ॥
ब्राह्मणः क्षत्रियो वैश्यस्त्रयो वर्णा द्विजातयः ।
चतुर्थ एकजातिस्तु शूद्रो नास्ति तु पञ्चमः ॥ ४ ॥
दशवां अध्याय ।
संकीर्ण-जातिभेद ।
अपने अपने धर्म कर्मों के अनुसार रहकर ब्राह्मण, क्षत्रिय
और वैश्य वेदों को पढ़ें । इन में ब्राह्मण सब को पढ़ावै और क्ष-
त्रिय, वैश्य पढ़ें, पढ़ावै नहीं, यह निर्णय है। ब्राह्मण सब वर्णों को
उनकी जीविका के उपायों को बतलावे और खुद भी अपने कर्त्तव्यों
को जाने । जाति की विशेषता परमात्मा के मुखसे उत्पत्ति नियमों
का धारण और जातकर्मादि संस्कारों की विशेषता से ब्राह्मण
वर्णों का स्वामी है। ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य ये तीन द्विजाति *
- ब्राह्मण आदि जातिवाचक शब्द ऋग्वेद में भी हैं, जैसा—'ब्राह्मणस्त्वा
शतक्रत उद्वंशमिव येमिरे ।' 'पञ्चजना मम होत्रं जुषध्वम्' इति । यहां पञ्चजन
शब्द चारों वर्ण के लिए है, ऐसा निरुक्त में यास्कमुनि ने लिखा है। जातिभेद
वैदिक युग का है, नवीन नहीं है ।
स्त्रीष्वनन्तरजातासु द्विजैरुत्पादितान् सुतान् ।
३७६ मनुस्मृति ।
कहलाते हैं और चौथा शूद्र एकजाति कहलाता है। पाँचवां वर्ण
कोई नहीं है ॥ १-४ ॥
सर्ववर्णेषु तुल्यासु पत्नीष्वक्षतयोनिषु ।
आनुलोम्येन संभूता जात्या ज्ञेयास्त एव ते ॥ ५ ॥
स्त्रीष्वनन्तरजातासु द्विजैरुत्पादितान् सुतान् ।
सदृशानेव तानाहुर्मातृदोषविगर्हितान् ॥ ६ ॥
अनन्तरासु जातानां विधिरेष सनातनः ।
द्वयेकान्तरासु जातानां धर्म्यं विद्यादिमं विधिम् ॥७॥
ब्राह्मणादि वर्गों की अक्षतयोनि स्त्रियों में क्रम से जो पुत्र पैदा
हों, उनको उसी जाति का जानना चाहिए। ब्राह्मणादि के अपने
से एक श्रेणी नीचे जाति की स्त्री में पैदा हुए पुत्र पिता के समान
जाति के गिने जाते हैं—क्योंकि वे माता के दोष से निन्दित हैं।
अपने से एक एक श्रेणी नीचे की जाति में उत्पन्न पुत्रों की यह
सनातन विधि है और अपने से दो दो जाति नीचे की स्त्रियों में
पैदा पुत्रों की विधि इसप्रकार है:—॥ ५-७॥
ब्राह्मणाद्वैश्यकन्यायामम्बष्ठो नाम जायते ।
निषादः शूद्रकन्यायां यः पारशव उच्यते ॥ ८ ॥
क्षत्रियाच्छूद्रकन्यायां क्रूराचारविहारवान् ।
क्षत्रशूद्रवपुर्जन्तुरुग्रो नाम प्रजायते ॥ ६ ॥
विप्रस्य त्रिषु वर्णेषु नृपतेर्वर्णयोर्द्वयोः ।
वैश्यस्य वर्णे चैकस्मिन् षडेतेऽपसदाः स्मृताः॥ १० ॥
क्षत्रियाद्विप्रकन्यायां सूतो भवति जातितः ।
वैश्यान्मागधवैदेहौ राजविप्राङ्गनासुतौ ॥ ११ ॥
दसवाँ अध्याय। ३७७
दसवाँ अध्याय। ३७७
शूद्रादायोगवः क्षत्ता चाण्डालश्चाधमो नृणाम्।
वैश्यराजन्यविप्रासु जायन्ते वर्णसंकराः ॥ १२ ॥
ब्राह्मण से वैश्यकन्या में अम्बष्ठ जाति का पुत्र होता है और
शूद्रकन्या में निषाद * ओर पारशव कहा जाता है। क्षत्रिय से
शूद्रकन्या में क्रूर आचारवाला पुत्र उग्रजाति का कहलाता है,
क्योंकि उसका शरीर क्षत्रिय और शूद्रा से हुआ है। ब्राह्मण के
क्षत्रिय-वैश्य-शूद्र जाति की कन्या से, क्षत्रिय के वैश्य-शूद्र-
कन्या से और वैश्य के शूद्र जाति की कन्या से उत्पन्न हुए पुत्र
अपसद-नीच कहलाते हैं। क्षत्रिय से ब्राह्मणीकन्या में पैदा हुआ
पुत्र जाति से सूत होता है। वैश्य से ब्राह्मणी में वैदेह जाति का
और वैश्य से क्षत्रिया में मागध जाति का होता है। शूद्र से
वैश्या, क्षत्रिया और ब्राह्मणी में क्रम से अयोगव, क्षत्ता और चा-
ण्डाल जाति के पुत्र होते हैं और ये मनुष्यों में अधम-वर्णसङ्कर
कहलाते हैं ॥ ८-१२ ॥
एकान्तरे त्वानुलोम्यादम्बष्ठोग्रौ यथा स्मृतौ ।
क्षतृवैदेहकौ तद्वत्प्रातिलोम्येऽपि जन्मनि ॥ १३ ॥
पुत्रा येऽनन्तरस्त्रीजाः क्रमेणोक्ता द्विजन्मनाम् ।
ताननन्तरनाम्नस्तु मातृदोषात्प्रचक्षते ॥ १४ ॥
ब्राह्मणादुग्रकन्यायामावृत्तो नाम जायते ।
आभीरोऽम्बष्ठकन्यायामायोगव्यां तु धिग्वणः ॥ १५ ॥
एक एक जाति के अन्तर से अर्थात् ब्राह्मण से वैश्या में अनुलोम
से उत्पन्न पुत्र जैसे अम्बष्ठ और उग्र कहे हैं वैसे प्रतिलोम से
अर्थात् शूद्र से क्षत्रिया में उत्पन्न पुत्र क्षत्ता और वैदेह कहलाते
- निषाद संकर जाति का बोधक है। निरुक्त में 'निषादः पञ्चमः' लेख है। यहां
पर जो वैश्य और शूद्रकन्याओं का ग्रहण है उसको विवाहिता समझना चाहिए।
क्योंकि याज्ञवल्क्य का वचन है:—‘विन्नास्वेष विधिः स्मृतः ।’
४८
३७८ मनुस्मृति ।
हैं। द्विजों के नीचे जाति की स्त्री में माता के दोष से उत्पन्न पुत्र
'अनन्तर' कहलाते हैं। ब्राह्मण से उग्र की कन्या में आवृत जाति
का अम्बष्ठकन्या में आभीर जाति का और आयोगवी में धिग्बण
जाति का पुत्र कहलाता है ॥ १३-१५ ॥
आयोगवश्च क्षत्ता च चाण्डालश्चाधमो नृणाम् ।
प्रातिलोम्येन जायन्ते शूद्रादपसदास्त्रयः ॥ १६ ॥
वैश्यान्मागधवैदेहौ क्षत्रियात्सूत एव तु ।
प्रतीपमेते जायन्ते परेऽप्यपसदास्त्रयः ॥ १७ ॥
जातो निषादाच्छूद्रायां जात्या भवति पुक्कसः ।
शूद्राज्जातो निषाद्यां तु स वै कुक्कुटकः स्मृतः ॥ १८ ॥
क्षत्तृर्जातस्तथोग्रायां श्वपाक इति कीर्त्यते ।
वैदेहकेन त्वम्बष्ठायामुत्पन्नो वेण उच्यते ॥ १६ ॥
द्विजातयः सवर्णासु जनयन्त्यव्रतांस्तु यान् ।
तान् सावित्री परिभ्रष्टान् व्रात्यानिति विनिर्दिशेत् ॥ २० ॥
व्रात्यात्तु जायते विप्रात्पापात्मा भूर्जकण्टकः ।
आवन्त्यवाटधानौ च पुष्पधः शैख एव च ॥ २१ ॥
झल्लो मल्लश्च राजन्याद्व्रात्यान्निच्छिविरेव च ।
नटश्च करणश्चैव खसो द्रविड एव च ॥ २२ ॥
वैश्यात्तु जायते व्रात्यात्सुधन्वाचार्य एव च ।
कारुषश्च विजन्मा च मैत्रः सात्वत एव च ॥ २३ ॥
आयोगव, क्षत्ता और चाण्डाल ये शूद्र से प्रतिलोमभाव से
पैदा तीन मनुष्यों में अधमहैं अपसदहैं । वैश्य से मागध और वैदेह
और क्षत्रिय से सूत, ये तीन भी प्रतिलोमभाव से पैदा होते हैं
अपसद् हैं। निषाद से शूद्रा में उत्पन्न पुत्र 'पुक्कस' जाति का और
शूद्र से निषादकन्या में कुक्कुट जाति का पुत्र होता है। इसीप्रकार
क्षत्ता से उग्रकन्या में 'श्वपाक' और वैदेह से अम्बष्ठी में 'वेण'
कहलाता है। द्विजाति अपनी सवर्णा स्त्री में उत्पन्न पुत्रों का सं-
स्कार जो न करें तो वे गायत्रीभ्रष्ट 'व्रात्य' कहलाते हैं। व्रात्य
ब्राह्मण से पापी-भूर्जकंटक उत्पन्न होते हैं, उन की आवन्त्य, वाट-
धान, पुष्पध और शैखसंज्ञा होती है। व्रात्य-क्षत्रिय से उत्पन्न
पुत्र झल्ल, मल्ल, निच्छिवि, नट, करण, खस और द्रविड़ कहलाते
हैं। व्रात्य-वैश्य से उत्पन्न पुत्र सुधन्वाचार्य, कारुष, बिजन्मा, मैत्र
और सात्वत कहलाते हैं ॥ १६-२३ ॥
व्यभिचारेण वर्णानामवेद्यावेदनेन च ।
स्वकर्मणां च त्यागेन जायन्ते वर्णसंकराः ॥ २४ ॥
संकीर्णयोनयो ये तु प्रतिलोमानुलोमजाः ।
अन्योन्यव्यतिषक्ताश्च तान् प्रवक्ष्याम्यशेषतः ॥ २५ ॥
सूतो वैदेहकश्चैव चण्डालश्च नराधमः ।
मागधः क्षत्तृजातिश्च तथाऽयोगव एव च ॥ २६ ॥
एते षट् सदृशान्वर्णान्जनयन्ति स्वयोनिषु ।
मातृजात्यां प्रसूयन्ते प्रवरासु च योनिषु ॥ २७॥
तथा त्रयाणां वर्णानां द्वयोरात्मास्य जायते ।
आनन्तर्यात्स्वयोन्यां तु तथा बाह्येष्वपि क्रमात् ॥२८॥
ब्राह्मणादि वर्णों में आपस के व्यभिचार से, अपने सगोत्रा के
साथ विवाह न करने से और अपने वर्णाश्रम धर्मों को छोड़ने से
वर्णसङ्कर उत्पन्न होते हैं। जो सङ्कीर्णयोनि, प्रतिलोम और अनु-
लोम के परस्पर सम्बन्ध से उत्पन्न होती हैं उनको विशेषरीति से
कहते हैं:-सूत, वैदेह, चाण्डाल, मागध, क्षत्ता और आयोगव ये छः
पुरुष अपनी माता की जाति में और अपने से ऊंची जाति में जो
३८० मनुस्मृति ।
सन्तान पैदा करें वे अपनी जाति की होती हैं। और जैसे ब्राह्मण
का तीनों वर्गों में से क्षत्रिय और वैश्यकन्या में और अपनी जाति
की कन्या में पैदा पुत्र द्विज कहाजाता है, वैसे क्षत्रिय से ब्राह्मणी,
वैश्य से क्षत्रिया और ब्राह्मणीकन्या में उत्पन्न पुत्र उत्तम गिने
जाते हैं ॥ २४-२८ ॥
ते चापि बाह्यान्सुबहूंस्ततोऽप्यधिकदूषितान् ।
परस्परस्य दारेषु जनयन्ति विगर्हितान् ॥ २९ ॥
यथैव शूद्रो ब्राह्मण्यां बाह्यं जन्तुं प्रसूयते ।
तथा बाह्यतरं बाह्यश्चातुर्वर्ण्ये प्रसूयते ॥ ३० ॥
प्रतिकूलं वर्तमाना बाह्याद्वाह्यतरान् पुनः ।
हीना हीनान् प्रसूयन्ते वर्णान् पञ्चदशैव तु ॥ ३१ ॥
आयोगव आदि छः प्रतिलोम पुत्र परस्पर में अपने से अधम
जाति के पुत्रों को पैदा करते हैं । जैसे शूद्र ब्राह्मण की कन्या में
वर्णसंकर चाण्डाल पुत्र पैदा करता है वैसे चाण्डाल चारोंवर्ण
की कन्याओं में अपने से भी नीच-जाति के पुत्रों को उत्पन्न करता
है। चाण्डाल वगैरह अपनी दूसरी पाँच प्रतिलोम जातियों में
अति अधम पुत्रों को उत्पन्न करते हैं और प्रतिलोम जाति के वर्ण-
संकर अपने से उत्तम जाति की कन्या में हीन जाति के पन्द्रह
पुत्रों को उत्पन्न करता है । अर्थात् चारोंवर्ण की स्त्रियों में तीन
अधमों के तीन तीन पुत्र बारह हुए और उनके पिता तीन अधम
मिलकर १५ हुए ॥ २९-३१ ॥
प्रसाधनोपचारज्ञमदासं दासजीवनम् ।
सैरन्ध्रं वागुरावृत्तिं सूते दस्युरयोगवे ॥ ३२ ॥
मैत्रेयकं तु वैदेहो माधूकं संप्रसूयते ।
नृन्प्रशंसत्यजस्रं यो घण्टाताडोऽरुणोदये ॥ ३३ ॥
दशवां अध्याय। ३८१
दशवां अध्याय। ३८१
निषादो मार्गवं सूते दासं नौकर्मजीविनम् ।
कैवर्त्तमिति यं प्राहुरार्यावर्त्तनिवासिनः ॥ ३४ ॥
मृतवस्त्रभृत्सु नारीषु गर्हितान्नाशनासु च ।
भवन्त्यायोगवीष्वेते जातिहीनाः पृथक् त्रयः ॥ ३५ ॥
कारावरो निषादात्तु चर्मकारः प्रसूयते ।
वैदेहिकान्ध्रमेदौ बहिर्ग्रामप्रतिश्रयौ ॥ ३६ ॥
चण्डालात्पाण्डुसोपाकस्त्वक्सारव्यवहारवान् ।
आहिण्डिको निषादेन वैदेह्यामेव जायते ॥ ३७ ॥
चण्डालेन तु सोपाको मूलव्यसनवृत्तिमान् ।
पुक्कस्यां जायते पापः सदा सज्जनगर्हितः ॥ ३८ ॥
निषादस्त्री तु चण्डालात्पुत्रमन्त्यावसायिनम् ।
श्मशानगोचरं सूते बाह्यानामपि गर्हितम् ॥ ३९ ॥
दस्यु से आयोगवी में 'सैरन्ध्र' जाति का पुत्र होता है । वह
दास न होकर भी केश सँभालना·हाथ-पैर दाबना वगैरह काम
करे और जाल से मृग आदि को पकड़े । वैदेह से आयोगवी स्त्री
में 'मैत्रेयक' जाति का पुत्र होता है । वह मधुरभाषी, सूर्योदय-स-
मय में घंटा आदि का शब्द करके राजा आदि भद्र पुरुषों की प्र-
शंसा का काम करे । निषाद, आयोगवी में मार्गव जाति का पुत्र
पैदा करता है वह दास भी कहाता है, नौका से जीविका करता
है और आर्यावर्त्तदेशनिवासी उसको 'कैवर्त्त' कहते हैं । इसी
प्रकार मृत मनुष्य वस्त्र पहननेवाली, क्ररस्वभाव, जूठने खाने
वाली आयोगवी में अपने पिता के भेद से अधम जातीय सैरन्ध्र,
मैत्रेय और मार्गवजाति के तीन पुत्र पैदा होते हैं । निषाद से
वैदेहीकन्या में कारावर जाति का पुत्र होता है, वह मोची का
काम करे । वैदेहिक से वैदेही में आंध्र और मेदजाति के पुत्र होते
[Header: ३८२ मनुस्मृति ।]
हैं वे गांव से बाहर रहें । चाण्डाल से वैदेही में पाण्डुसोपाक पैदा
होता है, वह वृक्षों की छाल से पंखा, सूप, आदि से जीविका
करे । निषाद से वैदेही में आहिण्डक, चाण्डाल से पुक्कसी में, सो-
पाक और चांडाल से निषादस्त्री में अन्त्यावसायी जाति के पुत्र
होते हैं । ये जल्लादी का काम करें, मरघटमें रहें । ये सब महादूषित
होते हैं ॥ ३२-३६ ॥
संकरे जातयस्त्वेताः पितृमातृप्रदर्शिताः ।
प्रच्छन्ना वा प्रकाशा वा वेदितव्याः स्वकर्मभिः॥४०॥
सजातिजानन्तरजाः षट् सुता द्विजधर्मिणः ।
शूद्राणां तु सधर्माणः सर्वेऽपध्वंसजाःस्मृताः ४१ ॥
तपो बीजप्रभावैस्तु ते गच्छन्ति युगे युगे ।
उत्कर्षं चापकर्षं च मनुष्येष्विह जन्मतः ॥ ४२ ॥
शनकैस्तु क्रियालोपादिमाः क्षत्रियजातयः ।
वृषलत्वं गता लोके ब्राह्मणादर्शनेन च ॥ ४३ ॥
पौण्ड्रकाश्चौड्रद्रविडाः काम्बोजा यवनाः शकाः ।
पारदापह्लवाश्चीनाः किराता दरदाः खशाः ॥ ४४ ॥
मुखबाहूरुपज्जानां या लोके जातयो बहिः ।
म्लेच्छवाचश्चार्यवाचः सर्वे ते दस्यवः स्मृताः ॥ ४५ ॥
ये द्विजानामपसदा ये चापध्वंसजाः स्मृताः ।
ते निन्दितैर्वर्त्तेयुर्द्विजानामेव कर्मभिः ॥ ४६ ॥
सूतानामश्वसारथ्यमम्बष्ठानां चिकित्सनम् ।
वैदेहकानां स्त्रीकार्यं मागधानां वणिक्पथः ॥ ४७ ॥
इस प्रकार वर्णसंकरों की जातियां उनके माता-पिता के साथ
दसवां अध्याय। ३८३
दसवां अध्याय। ३८३
कही गई हैं। इन में छिपी या प्रकट जातियों को उनके कर्मों से
जानना चाहिए। अपनी जाति और पिछली जाति की स्त्री में द्विज
के पैदाकिए छः पुत्र उपनयन संस्कार के योग्य होते हैं। और प्रति-
लोम से उत्पन्न हुए सब शूद्र के समान माने जाते हैं। तप के प्रभाव
से (विश्वामित्र) और बीज के प्रभाव से (ऋष्यशृङ्ग) सब युगों
में मनुष्यजन्म की उंचाई और निचाई को प्राप्त होते हैं। पुंड्र, उड्र,
द्रविड़, कम्बोज, यवन, शक, पारद, अपह्व, चीन, किरात, दरद
और खसदेश के क्षत्रियगण धीरे धीरे धर्मक्रियाओं को छोड़ देने
से और धर्मोपदेशक ब्राह्मणों का संग न करने से वृषल-म्लेच्छ-
पने को प्राप्त होगये। इस जगत् में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र-
जाति के पुरुष जो क्रिया के लोप से पतित जाति के होगए हों, वे
आर्यभाषा बोलें या म्लेच्छभाषा, पर उन को ‘दस्यु’ चोर सम-
झना चाहिए *। द्विजों में जिनको अपसद् वा वर्णसंकर कहा
है वे द्विजों के ही दूषित कामों से जीविका करें। सूतों का काम,
घोड़े का सारथि होना, अम्बष्ठों का चिकित्सा, वैदेहों का अन्तःपुर
का काम और मागधों का व्यापार कर्म है॥ ४०-४७॥
मत्स्यघातो निषादानां त्वष्टिस्त्वायोगवस्य च।
मेदान्ध्रचुञ्चुमद्गूनामारण्यपशुहिंसनम् ॥ ४८ ॥
क्षत्तूग्रपुक्कसानां तु बिलौको वधबन्धनम् ।
धिग्वणानां चर्मकार्यं वेणानां भाण्डवादनम् ॥ ४९ ॥
चैत्यद्रुमश्मशानेषु शैलेषूपवनेषु च ।
- इसीलिए जिन देशों में ब्राह्मणादि आर्यजन निवास नहीं करते वे देश ‘कीकट’
आदि निंद्य शब्दों से वेद में लिखे हैं। जैसा—‘किं ते कृण्वन्ति कीकटेषु गावः’।
यास्क मुनि ने निरुक्त में व्याख्या की है—‘कीकटो नाम देशोऽनार्यनिवासः...’।
शक, यवन आदि म्लेच्छों के भाषा शब्द हमारी आर्यभाषा से बहुत मिलते हैं।
इससे अनुमान होता है सबका मूल कुटुम्ब एक ही था। देश और कर्म त्याग से
अनार्य होगये हैं।
३८४ मनुस्मृति ।
वसेयुरेते विज्ञाता वर्तयन्तः स्वकर्मभिः ॥ ५० ॥
चण्डालश्वपचानां तु बहिर्ग्रामात्प्रतिश्रयः ।
अपपात्राश्च कर्त्तव्या धनमेषां श्वगर्दभम् ॥ ५१ ॥
वासांसि मृतचैलानि भिन्नभाण्डेषु भोजनम् ।
कार्ष्णाय समलङ्कारः परिव्रज्या च नित्यशः ॥ ५२ ॥
न तैः समयमन्विच्छेत्पुरुषो धर्ममाचरन् ।
व्यवहारो मिथस्तेषां विवाहः सदृशैः सह ॥ ५३ ॥
अन्नमेषां पराधीनं देयं स्याद्भिन्नभाजने ।
रात्रौ न विचरेयुस्ते ग्रामेषु नगरेषु च ॥ ५४ ॥
दिवाचरेयुः कार्यार्थ चिह्निता राजशासनैः ।
अबान्धवं चैव शवं निर्हरेयुरिति स्थितिः ॥ ५५ ॥
निषादों का काम मछली मारना, आयोगव का लकड़ी काटना,
मेद, आंध्र, चंचु और मद्गुका वनपशुओंको मारना, क्षत्ता, उग्र और
पुक्कस का बिलों में रहनेवाले साँप, नौला को मारना वा पकड़ना ।
धिग्वसों का मोची का काम और वेणों का बाजा बनाने का काम
है । क्षत्ता आदि जातिवाले गाँव के पास प्रसिद्ध वृक्ष के नीचे,
श्मशान में, पर्वत पर, बगीचे में रहकर अपनी अपनी जीविका को
करें । चाण्डाल और श्वपच गाँव के बाहर रहें, इनके पात्रों को
काम में न लाना । कुत्ता, गधा आदि इनके धन हैं । ये मुरदा के
कफ़न धारण करें, फूटे पात्रों में भोजन करें, लोह के गहने पहनें
और रोज़ गांवों में घूमा करें । पुरुष को धर्माचरण के समय इन
चाण्डालों का दर्शन भी न करना चाहिए, इनका व्यवहार और
विवाह समान-जातिवालों में होना चाहिए । इनका भोजन परा-
धीन होवे, फूटे पात्रों में खाने को अन्न देवे और ये लोग रात में
गाँव या नगर में न फिरें । राजा की आज्ञा से चपड़ास पाए हुए
दसवां अध्याय । ३८५
दसवां अध्याय । ३८५
काम के लिए दिन में घूमैं और वे वारिश मुरदों को ले जावैं ।
यह मर्यादा है ॥ ४८-५५ ॥
वध्यांश्च हन्युः सततं यथाशास्त्रं नृपाज्ञया ।
वध्यवासांसि गृह्णीयुः शय्याश्चाभरणानि च ॥ ५६ ॥
वर्णापेतमविज्ञातं नरं कलुषयोनिजम् ।
आर्यरूपमिवानार्यं कर्मभिः स्वैर्विभावयेत् ॥ ५७ ॥
अनार्यता निष्ठुरता क्रूरता निष्क्रियात्मता ।
पुरुषं व्यञ्जयन्तीह लोके कलुषयोनिजम् ॥ ५८ ॥
पित्र्यं वा भजते शीलं मातुर्वोभयमेव वा ।
न कथंचन दुर्योनिः प्रकृतिं स्वां नियच्छति ॥ ५६ ॥
कुले मुख्येऽपि जातस्य यस्य स्याद्योनिसंकरः ।
संश्रयत्येव तच्छीलं नरोऽल्पमपि वा बहु ॥ ६० ॥
यत्र त्वेते परिध्वंसाज्जायन्ते वर्णदूषकाः ।
राष्ट्रिकैः सह तद्राष्ट्रं क्षिप्रमेव विनश्यति ॥ ६१ ॥
ब्राह्मणार्थे गवार्थे वा देहत्यागोऽनुपस्कृतः ।
स्त्रीबालाभ्युपपत्तौ च बाह्यानां सिद्धिकारणम् ॥ ६२ ॥
जिनको राजाज्ञा से फाँसी का दण्ड हुआ हो उनको शास्त्रानु-
सार मारे और उनके वस्त्र, शय्या, आभूषणों को लेवे । जातिभ्रष्ट,
वर्णसङ्कर, अपरिचित और आर्य मालूम होनेवाला ऐसे अनार्यों को
उनके कर्मों से पहचाने । असभ्यता, कठोरपन, क्रूरता और अना-
चार से लोक में पुरुष की वर्णसङ्करता प्रकट होती है । वर्णसङ्कर
अपने पिता का या माता का अथवा दोनों का स्वभाव पाता है ।
वह अपने स्वभाव-शील को किसी भांति छिपा नहीं सकता । वर्ण-
सङ्कर उत्तम कुल में पैदा होने पर भी अपने उत्पादक के स्वभाव
४६
३८६ मनुस्मृति ।
को कुछ न कुछ पाता ही है। जिस देश में ये वर्णदूषक सन्तान होते
हैं वह देश प्रजा के साथ जल्द ही बिगड़ जाता है। ब्राह्मण, गौ,
स्त्री और बालरक्षा के लिए निष्कामभाव से प्राण छोड़ने से प्रति-
लोमजों को उत्तम जाति में जन्म मिलता है ॥ ५६-६२ ॥
अहिंसा सत्यमस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः ।
एतं सामासिकं धर्मं चातुर्वर्ण्येऽब्रवीन्मनुः ॥ ६३ ॥
चारों वर्णों के धर्म-कर्म-जीविका आदि।
अहिंसा, सत्य, चोरी न करना, पवित्रता और इन्द्रिय-निग्रह
यह चारों वर्णों का संक्षिप्त-धर्म मनुजी ने कहा है ॥ ६३ ॥
शूद्रायां ब्राह्मणाज्जातः श्रेयसा चेत्प्रजायते ।
अश्रेयान् श्रेयसीं जातिं गच्छत्यासप्तमाद्युगात् ॥ ६४॥
शूद्रो ब्राह्मणतामेति ब्राह्मणश्चैति शूद्रताम् ।
क्षत्रियाज्जातमेवं तु विद्याद्वैश्यात्तथैव च ॥ ६५ ॥
अनार्यायां समुत्पन्नो ब्राह्मणात्तु यदृच्छया ।
ब्राह्मण्यामप्यनार्याच्च श्रेयस्त्वं केति चेद्भवेत् ॥ ६६ ॥
जातो नार्यामनार्यायामार्यादार्यो भवेद्गुणैः ।
जातोऽप्यनार्यादार्यायामनार्य इति निश्चयः ॥ ६७ ॥
तावुभावप्यसंस्कार्याविति धर्मो व्यवस्थितः ।
वैगुण्याज्जन्मनः पूर्व उत्तरः प्रतिलोमतः ॥ ६८ ॥
ब्राह्मण से शूद्रा में कन्या हो, वह कन्या ब्राह्मण को विवाहित
हो, उसके भी कन्या हो और वह भी ब्राह्मण को दी जाय, यों सा-
तवीं पुस्त में जो पुरुष उत्पन्न होगा, उसका पूर्वज पारशव होने पर
भी वह पुरुष ब्राह्मण माना जाता है। शूद्र जैसे ब्राह्मणता को पाता
दशवां अध्याय । ३८७
दशवां अध्याय । ३८७
है वैसे ही ब्राह्मण शूद्रता को पाता है । ऐसे ही क्षत्रिय से शूद्रा में
उत्पन्न पुत्र छठी पीढ़ी में शूद्र होता है और वैश्य से शूद्रा में उ-
त्पन्न पांचवीं पीढ़ी में शूद्र होता है। ब्राह्मण से शूद्रा में और शूद्र
से ब्राह्मणी में दैवेच्छा से पुत्र पैदा हो, उनमें श्रेष्ठता इस प्रकार है-
ब्राह्मण से शूद्रा में उत्पन्न पुत्र यज्ञादि कर्म करताहो तो 'आर्य'
कहलाता है। और शूद्र से ब्राह्मणी में उत्पन्न हुआ, 'अनार्य' कह -
लाता है। पहला नीच जाति में होने से और दूसरा प्रतिलोम होने
से दोनों संस्कार के अयोग्य हैं। यह धर्म की मर्यादा है ॥ ६४-६८॥
सुवीजं चव सुक्षेत्रे जातं संपद्यते यथा ।
तथाऽऽर्याज्जात आर्यायां सर्वं संस्कारमर्हति ॥ ६६ ॥
वीजमेके प्रशंसन्ति क्षेत्रमन्ये मनीषिणः ।
वीजक्षेत्रे तथैवान्ये तत्रेयं तु व्यवस्थितिः ॥ ७० ॥
अक्षेत्रे वीजमुत्सृष्टमन्तरैव विनश्यति ।
अवीजकमपि क्षेत्रं केवलं स्थण्डिलं भवेत् ॥ ७१ ॥
अच्छा बीज अच्छे खेत में बोने से जैसे अच्छा होता है, वैसे आर्य
से आर्या में पैदा हुआ पुत्र सब संस्कार के योग्य होता है। कोई वि-
द्वान् बीज की प्रशंसा करते हैं, कोई क्षेत्र की प्रशंसा करते हैं, कोई
बीज और क्षेत्र दोनों की प्रशंसा करते हैं, उसमें व्यवस्था यों है-
ऊसर में बोया बीज बीच ही में नष्ट हो जाता है और विना बीज के
खेत कोरा-सपाट पड़ा रहता है ॥ ६६-७१ ॥
यस्माद्बीजप्रभावेण तिर्यग्जा ऋषयोऽभवन् ।
पूजिताश्च प्रशस्ताश्च तस्माद्बीजं प्रशस्यते ॥ ७२ ॥
अनार्यमार्यकर्माणमार्यं चानार्यकर्मिणम् ।
संप्रधार्याब्रवीद्धाता न समौ नासमाविति ॥ ७३ ॥
३८८ मनुस्मृति ।
ब्राह्मणा ब्रह्मयोनिस्था ये स्वकर्मण्यवस्थिताः ।
ते सम्यगुपजीवेयुः षट् कर्माणि यथाक्रमम् ॥ ७४ ॥
अध्यापनमध्ययनं यजनं याजनं तथा।
दानं प्रतिग्रहश्चैव षट् कर्माण्यग्रजन्मनः ॥ ७५ ॥
षण्णां तु कर्मणामस्य त्रीणि कर्माणि जीविका ।
याजनाध्यापने चैव विशुद्धाच्च प्रतिग्रहः ॥ ७६ ॥
त्रयो धर्मा निवर्तन्ते ब्राह्मणात्क्षत्रियं प्रति ।
अध्यापनं याजनं च तृतीयश्च प्रतिग्रहः ॥ ७७ ॥
वैश्यं प्रति तथैवैते निवर्तेरन्निति स्थितिः ।
न तौ प्रति हि तान् धर्मान् मनुरह प्रजापतिः ॥ ७८ ॥
शस्त्रास्त्रभृत्वं क्षत्रस्य वणिक्पशुकृषिर्विशः ।
आ जीवनार्थं धर्मस्तु दानमध्ययनं यजिः ॥ ७६ ॥
क्योंकि बीज केही प्रभाव से हरिणी आदि में ऋष्यशृङ्ग उत्पन्न
हुए और माननीय-पूज्य हुए इसलिए बीज उत्तम माना जाता है।
शूद्र द्विज का कर्म और द्विज शूद्र का कर्म करता हो तो दोनों की
तुलना करके ब्रह्मा ने कहा है-शूद्र द्विजकर्म में अनधिकारी होने से और
ब्राह्मण निषिद्ध आचरण करने से समान नहीं है। क्योंकि गुण-
स्वभाव के बिना केवल कर्म से अनार्य, आर्य नहीं होसकते । जो
ब्रह्मयोनिज ब्राह्मण हैं, वे अच्छे प्रकार इन छः कर्मों का अनुष्ठान करें
पढ़ना, पढ़ाना, यज्ञ करना, यज्ञ कराना, दान देना और दान लेना।
ब्राह्मण के ये छः कर्म हैं । इनमें यज्ञ कराना, पढ़ाना और शुद्धदान
लेना ये तीन कर्म जीविका हैं। ब्राह्मण के धर्मों से क्षत्रिय के तीन
धर्म छूटे हैं पढ़ाना, यज्ञ कराना और दान लेना । अर्थात् इन कामों
को क्षत्रिय न करें । और वैश्य भी न करें, यही शास्त्रमर्यादा है।
क्योंकि प्रजापति ने क्षत्रिय, वैश्य के लिए ये धर्म नहीं कहे हैं।
दशवां अध्याय। ३८६
दशवां अध्याय। ३८६
शस्त्र, अस्त्र धारण करना क्षत्रिय की और व्यापार, पशुपालन,
खेती वैश्य की आजीविका के लिए हैं और दान देना, वेद पढ़ना,
यज्ञकरना, इन दोनों का धर्म है ॥ ७२-७९ ॥
वेदाभ्यासो ब्राह्मणस्य क्षत्रियस्य च रक्षणम् ।
वार्ता कर्मैव वैश्यस्य विशिष्टानि स्वकर्मसु ॥ ८० ॥
अजीवंस्तु यथोक्तेन ब्राह्मणः स्वेन कर्मणा ।
जीवेत्क्षत्रियधर्मेण स ह्यस्य प्रत्यनन्तरः ॥ ८१ ॥
उभाभ्यामप्यजीवंस्तु कथं स्यादिति चेद्भवेत् ।
कृषिगोरक्षमास्थाय जीवेद्वैश्यस्य जीविकाम् ॥ ८२ ॥
वैश्यवृत्त्यापि जीवंस्तु ब्राह्मणः क्षत्रियोऽपि वा ।
हिंसाप्रायां पराधीनां कृषिं यत्नेन वर्जयेत् ॥ ८३ ॥
कृषिं साध्विति मन्यन्ते सा वृत्तिः सद्भिगर्हिता ।
भूमिं भूमिशयांश्चैव हन्ति काष्ठमयोमुखम् ॥ ८४ ॥
इदं तु वृत्तिवैकल्यात्त्यजतो धर्मनैपुणम् ।
विट्पण्यमुद्धृतोद्धारं विक्रेयं वित्तवर्धनम् ॥ ८५ ॥
सर्वान् रसानपोहेत कृतान्नं च तिलैः सह ।
अश्मनो लवणं चैव पशवो ये च मानुषाः ॥ ८६ ॥
सर्वं च तान्तवं रक्तं शाणक्षौमाविकानि च ।
अपि चेत्स्युररक्तानि फलमूले तथौषधीः ॥ ८७ ॥
ब्राह्मण का वेदाभ्यास करना, क्षत्रिय का रक्षा करना और वैश्य
का व्यापार करना ये अपने अपने कर्मों में विशेष कर्म हैं। ब्राह्मण
यदि वेद पढ़ाकर अपनी जीविका न करसके तो क्षत्रिय के कर्म से
जीविका करे । यदि ब्राह्मण, क्षत्रिय दोनों के कर्मों से जीविका न
३६० मनुस्मृति ।
करसके तो खेती, गोरक्षा आदि वैश्यजीविका से निर्वाह करे।
ब्राह्मण और क्षत्रिय वैश्य जीविका से निर्वाह करता हुआ भी
खेती को कभी न करे। कोई खेती को अच्छी मानते हैं, पर यह
सत्पुरुषों में निन्दित है। क्योंकि इसमें हलसे जीव हिंसा, अवर्षा-
सूखा आदि का डर है, पराधीन कर्म है। ब्राह्मण और क्षत्रिय की
जीविका अपने कर्मों से न चले तो निन्दित कर्मों को छोड़कर, वे
वैश्य वृत्ति, व्यापार का आश्रय लेवें। ब्राह्मण सब भांति के रस,
सब अन्न, तिल, पत्थर, निमक, पशुओं को न बेंचे। सब प्रकार के
लाल वस्त्र, सन-अलसी-ऊन के विनारँगे वस्त्र, फल, कंद, औषधों
को न बेंचे ॥ ८०-८७ ॥
अपःशस्त्रं विषं मांसं सोमं गन्धांश्च सर्वशः ।
क्षीरं क्षौद्रं दधि घृतं तैलं मधु गुडं कुशान् ॥ ८८ ॥
आरण्यांश्च पशून् सर्वान् दंष्ट्रिणश्च वयांसि च ।
मद्यं नीलिं च लाक्षां च सर्वांश्चैकशफांस्तथा ॥८६॥
काममुत्पाद्य कृष्यां तु स्वयमेव कृषीवलः ।
विक्रीणीत तिलाञ्छुद्धान् धर्मार्थमचिरस्थितान् ॥६०॥
भोजनाभ्यञ्जनादानाद्यदन्यत्कुरुते तिलैः ।
कृमिभूतःश्वविष्ठायां पितृभिः सह मज्जति ॥ ६१ ॥
सद्यः पतति मांसेन लाक्षया लवणेन च ।
त्र्यहेण शूद्रो भवति ब्राह्मणः क्षीरविक्रयात् ॥ ६२ ॥
इतरेषां तु पण्यानां विक्रयादिह कामतः ।
ब्राह्मणः सप्तरात्रेण वैश्यभावं नियच्छति ॥ ६३ ॥
जल, हथियार, विष, मांस, सोमरस, सब तरहकी सुगन्धि, दूध,
शहद, दही, घी, तेल, मद्य, गुड़, कुश, जंगली पशु, दाढ़वाले पशु,
पक्षी, भांग, गांजा, नील, लाख और एक खुरके पशु, इन सबका
दशवां अध्याय। ३६१
दशवां अध्याय। ३६१
व्यापार न करे। ब्राह्मण किसान खेती करके तिल पैदा किये हो तो
उसको यज्ञादि के लिए बेंच डाले। जो पुरुष भोजन, दान और
स्नान के सिवा, दूसरे कामों में तिलका उपयोग करता है वह कीड़ा
होकर पितरों के साथ कुत्ते की विष्ठा में डूबता है। मांस, लाख
और लोन बेंचने से ब्राह्मण तुरंत पतित होजाता है। और दूध
बेंचने से तीन दिनमें शूद्र होजाता है ॥ ८८-९३ ॥
रसा रसैर्निसातव्या न त्वेव लवणं रसैः ।
कृतान्नं चाकृतान्नेन तिला धान्येन तत्समाः ॥ ९४॥
जीवेदेतेन राजन्यः सर्वेणाप्यनयं गतः ।
न त्वेव ज्यायसीं वृत्तिमभिमन्येत कर्हिचित् ॥ ९५ ॥
ऊपर गिनाये पदार्थों को छोड़कर, दूसरे शास्त्र में निषिद्ध पदार्थों
को यदि ब्राह्मण इच्छा से बेंचता है, तो वह सात रात्रि के बाद,
वैश्यपने को पाता है। गुड़ आदि रसोंका घी आदि रसोंसे बदला
करे, किन्तु लोन का रसों से बदला न करे। पका अन्न, कच्चा अन्न
से और तिल दूसरे अन्न से बदल लेवे। इन विधियों से आपत्ति
में पड़ा क्षत्रिय भी वैश्यवृत्ति से जीवन निर्वाह करे। परन्तु ब्राह्मण
की जीविका से कभी जीविका न करे ॥ ९४-९५ ॥
यो लोभादधमो जात्या जीवेदुत्कृष्टकर्मभिः ।
तं राजा निर्धनं कृत्वा क्षिप्रमेव प्रवासयेत् ॥ ९६ ॥
वरं स्वधर्मो विगुणो न पारक्यः स्वनुष्ठितः ।
परधर्मेण जीवन् हि सद्यः पतति जातितः ॥ ९७ ॥
वैश्योऽजीवन् स्वधर्मेण शूद्रवृत्त्यापि वर्तयेत् ।
अनाचरन्नकार्याणि निवर्तेत च शक्तिमान् ॥ ९८ ॥
अशक्नुवंस्तु शुश्रूषां शूद्रः कर्तुं द्विजन्मनाम् ।
पुत्रदारात्ययं प्राप्तो जीवेत्कारुककर्मभिः ॥ ९९ ॥
३६२ मनुस्मृति ।
यैः कर्मभिः प्रचरितैः शुश्रूष्यन्ते द्विजातयः ।
तानि कारुककर्माणि शिल्पानि विविधानि च ॥१००॥
वैश्यवृत्तिमनातिष्ठन् ब्राह्मणः स्वेपथि स्थितः ।
अवृत्तिकर्शितः सीदन्निमं धर्मं समाचरेत् ॥ १०१ ॥
सर्वतः प्रतिगृह्णीयाद् ब्राह्मणस्त्वनयं गतः ।
पवित्रं दुष्यतीत्येतद्धर्मतो नोपपद्यते ॥ १०२ ॥
नाध्यापनाद्याजनाद्वा गर्हिताद्वा प्रतिग्रहात् ।
दोषो भवति विप्राणां ज्वलनाम्बुसमाहिते ॥ १०३ ॥
जो नीचजाति का पुरुष लोभ से, उत्तम जाति के कर्म से जी-
विका करे, उसका धन छीनकर राजा देश से निकाल दे । अपना
धर्म किसी अंश में न्यून हो तो भी अच्छा है । पर दूसरे का धर्म
सर्वांग पूर्ण भी अच्छा नहीं । क्योंकि दूसरे के धर्म से जीविका
करने वाला तत्काल जाति से भ्रष्ट होजाता है । यदि वैश्य अपनी
वृत्ति से जीविका न कर सके तो शूद्रवृत्ति से भी निर्वाह कर
सकता है । पर जूठा खाना आदि न करे और दुःख के दिन बीत
जाने पर उसको छोड़ देवे । यदि शूद्र द्विजोंकी सेवा न कर सके
औरउसके पुत्र, स्त्री भूखों मरते हों तो शिल्प कार्य से जीविका करे।
जिन कार्यों के करने से द्विजातियों की सेवा के लिए, अवकाश
मिल सके, ऐसे शिल्पकार्यों को करे । यदि ब्राह्मण धर्म मार्ग में
स्थित, जीविका की कमी से दुःखी हो तो सब से दान लेवे ।
क्योंकि पवित्र दूषित होता हो, यह धर्म से सिद्ध नहीं होता ।
आपत्तिकाल में, निंदित को वेद पढ़ाने, यज्ञ कराने और उनसे
दान लेने से ब्राह्मणों को दोष नहीं लगता । क्योंकि वे अग्नि और
जल के समान पवित्र हैं ॥ ९६-१०३ ॥
जीवितात्ययमापन्नो योऽन्नमत्ति यतस्ततः ।
आकाशमिव पङ्केन न स पापेन लिप्यते ॥ १०४.॥
दशवां अध्याय। ३६३
दशवां अध्याय। ३६३
अजीगर्तः सुतं हन्तुमुपासर्पद् बुभुक्षितः ।
न चालिप्यत पापेन क्षुत्प्रतीकारमाचरन् ॥ १०५ ॥
श्वमांसमिच्छन्नार्त्तोऽत्तुं धर्माधर्मविचक्षणः ।
प्राणानां परिरक्षार्थं वामदेवो न लिप्तवान् ॥ १०६ ॥
भरद्वाजः क्षुधार्तस्तु सपुत्रो विजने वने ।
बह्वीर्गाः प्रतिजग्राह वृधोस्तक्षणो महातपाः ॥ १०७ ॥
क्षुधार्त्तश्चात्तुमभ्यागाद्विश्वामित्रः श्वजाघनीम् ।
चण्डालहस्तादादाय धर्माधर्मविचक्षणः ॥ १०८ ॥
प्राणान्त दुःख न पड़कर, जो पुरुष मनमाना अन्न खाता है,
वह कीच से आकाश के समान, पाप से लिप्त नहीं होता। भूखसे
दुःखी अजीगर्त ऋषि (सौ गो के लोभ से) पुत्र मारने को तैयार
हुए थे पर उन्हें दोष नहीं लगा। धर्माधर्म के ज्ञाता वामदेव ऋषि
क्षुधा से प्राणरक्षार्थ कुत्ता का मांस खाना चाहा। महातपस्वी
भरद्वाज पुत्रसहित निर्जन वन में क्षुधा से पीड़ित होकर, वृधु-
नामक बढ़ई से बहुत गौ दान में लीथीं। धर्माधर्म के ज्ञाता, विश्वा-
मित्र भूख से दुःखी होकर, चाण्डाल के हाथ से कुत्ता की जाँघ
लेकर, खाने को उद्यत हुए थे ॥ १०४-१०८ ॥
प्रतिग्रहाद्याजनाद्वा तथैवाध्यापनादपि ।
प्रतिग्रहः प्रत्यंवरः प्रेत्य विप्रस्य गर्हितः ॥ १०६ ॥
याजनाध्यापने नित्यं क्रियेते संस्कृतात्मनाम् ।
प्रतिग्रहस्तु क्रियते शूद्रादप्यन्त्यजन्मनः ॥ ११० ॥
जपहोमैरपैत्येनो याजनाध्यापनैः कृतम् ।
प्रतिग्रहनिमित्तं तु त्यागेन तपसैव च ॥ १११ ॥
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