मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 532, कुल 649 में से
संदर्भ में पढ़ें३६२ मनुस्मृति ।
यैः कर्मभिः प्रचरितैः शुश्रूष्यन्ते द्विजातयः ।
तानि कारुककर्माणि शिल्पानि विविधानि च ॥१००॥
वैश्यवृत्तिमनातिष्ठन् ब्राह्मणः स्वेपथि स्थितः ।
अवृत्तिकर्शितः सीदन्निमं धर्मं समाचरेत् ॥ १०१ ॥
सर्वतः प्रतिगृह्णीयाद् ब्राह्मणस्त्वनयं गतः ।
पवित्रं दुष्यतीत्येतद्धर्मतो नोपपद्यते ॥ १०२ ॥
नाध्यापनाद्याजनाद्वा गर्हिताद्वा प्रतिग्रहात् ।
दोषो भवति विप्राणां ज्वलनाम्बुसमाहिते ॥ १०३ ॥
जो नीचजाति का पुरुष लोभ से, उत्तम जाति के कर्म से जी-
विका करे, उसका धन छीनकर राजा देश से निकाल दे । अपना
धर्म किसी अंश में न्यून हो तो भी अच्छा है । पर दूसरे का धर्म
सर्वांग पूर्ण भी अच्छा नहीं । क्योंकि दूसरे के धर्म से जीविका
करने वाला तत्काल जाति से भ्रष्ट होजाता है । यदि वैश्य अपनी
वृत्ति से जीविका न कर सके तो शूद्रवृत्ति से भी निर्वाह कर
सकता है । पर जूठा खाना आदि न करे और दुःख के दिन बीत
जाने पर उसको छोड़ देवे । यदि शूद्र द्विजोंकी सेवा न कर सके
औरउसके पुत्र, स्त्री भूखों मरते हों तो शिल्प कार्य से जीविका करे।
जिन कार्यों के करने से द्विजातियों की सेवा के लिए, अवकाश
मिल सके, ऐसे शिल्पकार्यों को करे । यदि ब्राह्मण धर्म मार्ग में
स्थित, जीविका की कमी से दुःखी हो तो सब से दान लेवे ।
क्योंकि पवित्र दूषित होता हो, यह धर्म से सिद्ध नहीं होता ।
आपत्तिकाल में, निंदित को वेद पढ़ाने, यज्ञ कराने और उनसे
दान लेने से ब्राह्मणों को दोष नहीं लगता । क्योंकि वे अग्नि और
जल के समान पवित्र हैं ॥ ९६-१०३ ॥
जीवितात्ययमापन्नो योऽन्नमत्ति यतस्ततः ।
आकाशमिव पङ्केन न स पापेन लिप्यते ॥ १०४.॥