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सर्वकोश
मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

पृष्ठ 530, कुल 649 में से

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पृष्ठ 530

३६० मनुस्मृति ।
करसके तो खेती, गोरक्षा आदि वैश्यजीविका से निर्वाह करे।
ब्राह्मण और क्षत्रिय वैश्य जीविका से निर्वाह करता हुआ भी
खेती को कभी न करे। कोई खेती को अच्छी मानते हैं, पर यह
सत्पुरुषों में निन्दित है। क्योंकि इसमें हलसे जीव हिंसा, अवर्षा-
सूखा आदि का डर है, पराधीन कर्म है। ब्राह्मण और क्षत्रिय की
जीविका अपने कर्मों से न चले तो निन्दित कर्मों को छोड़कर, वे
वैश्य वृत्ति, व्यापार का आश्रय लेवें। ब्राह्मण सब भांति के रस,
सब अन्न, तिल, पत्थर, निमक, पशुओं को न बेंचे। सब प्रकार के
लाल वस्त्र, सन-अलसी-ऊन के विनारँगे वस्त्र, फल, कंद, औषधों
को न बेंचे ॥ ८०-८७ ॥
अपःशस्त्रं विषं मांसं सोमं गन्धांश्च सर्वशः ।
क्षीरं क्षौद्रं दधि घृतं तैलं मधु गुडं कुशान् ॥ ८८ ॥
आरण्यांश्च पशून् सर्वान् दंष्ट्रिणश्च वयांसि च ।
मद्यं नीलिं च लाक्षां च सर्वांश्चैकशफांस्तथा ॥८६॥
काममुत्पाद्य कृष्यां तु स्वयमेव कृषीवलः ।
विक्रीणीत तिलाञ्छुद्धान् धर्मार्थमचिरस्थितान् ॥६०॥
भोजनाभ्यञ्जनादानाद्यदन्यत्कुरुते तिलैः ।
कृमिभूतःश्वविष्ठायां पितृभिः सह मज्जति ॥ ६१ ॥
सद्यः पतति मांसेन लाक्षया लवणेन च ।
त्र्यहेण शूद्रो भवति ब्राह्मणः क्षीरविक्रयात् ॥ ६२ ॥
इतरेषां तु पण्यानां विक्रयादिह कामतः ।
ब्राह्मणः सप्तरात्रेण वैश्यभावं नियच्छति ॥ ६३ ॥
जल, हथियार, विष, मांस, सोमरस, सब तरहकी सुगन्धि, दूध,
शहद, दही, घी, तेल, मद्य, गुड़, कुश, जंगली पशु, दाढ़वाले पशु,
पक्षी, भांग, गांजा, नील, लाख और एक खुरके पशु, इन सबका