मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 528, कुल 649 में से
संदर्भ में पढ़ें३८८ मनुस्मृति ।
ब्राह्मणा ब्रह्मयोनिस्था ये स्वकर्मण्यवस्थिताः ।
ते सम्यगुपजीवेयुः षट् कर्माणि यथाक्रमम् ॥ ७४ ॥
अध्यापनमध्ययनं यजनं याजनं तथा।
दानं प्रतिग्रहश्चैव षट् कर्माण्यग्रजन्मनः ॥ ७५ ॥
षण्णां तु कर्मणामस्य त्रीणि कर्माणि जीविका ।
याजनाध्यापने चैव विशुद्धाच्च प्रतिग्रहः ॥ ७६ ॥
त्रयो धर्मा निवर्तन्ते ब्राह्मणात्क्षत्रियं प्रति ।
अध्यापनं याजनं च तृतीयश्च प्रतिग्रहः ॥ ७७ ॥
वैश्यं प्रति तथैवैते निवर्तेरन्निति स्थितिः ।
न तौ प्रति हि तान् धर्मान् मनुरह प्रजापतिः ॥ ७८ ॥
शस्त्रास्त्रभृत्वं क्षत्रस्य वणिक्पशुकृषिर्विशः ।
आ जीवनार्थं धर्मस्तु दानमध्ययनं यजिः ॥ ७६ ॥
क्योंकि बीज केही प्रभाव से हरिणी आदि में ऋष्यशृङ्ग उत्पन्न
हुए और माननीय-पूज्य हुए इसलिए बीज उत्तम माना जाता है।
शूद्र द्विज का कर्म और द्विज शूद्र का कर्म करता हो तो दोनों की
तुलना करके ब्रह्मा ने कहा है-शूद्र द्विजकर्म में अनधिकारी होने से और
ब्राह्मण निषिद्ध आचरण करने से समान नहीं है। क्योंकि गुण-
स्वभाव के बिना केवल कर्म से अनार्य, आर्य नहीं होसकते । जो
ब्रह्मयोनिज ब्राह्मण हैं, वे अच्छे प्रकार इन छः कर्मों का अनुष्ठान करें
पढ़ना, पढ़ाना, यज्ञ करना, यज्ञ कराना, दान देना और दान लेना।
ब्राह्मण के ये छः कर्म हैं । इनमें यज्ञ कराना, पढ़ाना और शुद्धदान
लेना ये तीन कर्म जीविका हैं। ब्राह्मण के धर्मों से क्षत्रिय के तीन
धर्म छूटे हैं पढ़ाना, यज्ञ कराना और दान लेना । अर्थात् इन कामों
को क्षत्रिय न करें । और वैश्य भी न करें, यही शास्त्रमर्यादा है।
क्योंकि प्रजापति ने क्षत्रिय, वैश्य के लिए ये धर्म नहीं कहे हैं।