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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

पृष्ठ 514, कुल 649 में से

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पृष्ठ 514

३७४ . मनुस्मृति ।
विप्राणां वेदविदुषां गृहस्थानां यशस्विनाम् ।
शुश्रूषैव तु शूद्रस्य धर्मो नैःश्रेयसः परः ॥ ३३४ ॥
शुचिरुत्कृष्टशुश्रूषुर्मृदुवागनहङ्कृतः ।
ब्राह्मणाद्याश्रयो नित्यमुत्कृष्टां जातिमश्नुते ॥ ३३५ ॥
एषोऽनापदि वर्णानामुक्तः कर्मविधिः शुभः ।
आपद्यपि हि यस्तेषां क्रमशस्तन्निबोधत ॥ ३३६ ॥
इति मानवे धर्मशास्त्रे भृगुप्रणीतायां स्मृतौ
नवमोऽध्यायः ॥ ६ ॥
गल्ले के अच्छे-बुरे का हाल, देशों में पदार्थों का भाव, गुण
आदि । समय में खरीद, बेंचने में मुनाफा आदि और पशुओं के
बढ़ने की रीति वैश्य जाना करे । नौकरोंकी नौकरी का परिमाण,
अनेक भाषा, माल ठीक रहने की विधि, खरीदने, बेंचने का ढंग
जाने । धर्मानुसार धन बढ़ाने में परमयत्न करे और सब प्राणियों
को अन्न देय यह सब वैश्यों का कर्त्तव्य है । वेदविशारद विद्वान्,
गृहस्थ, यशस्वी ब्राह्मण आदि की सेवा ही शूद्र का परम सुखदायी
धर्म है । जो शूद्र भीतर बाहर से पवित्र, उत्तमजाति का सेवक,
मधुरभाषी, निरहङ्कार और ब्राह्मणों के आश्रय में रहता है, वह
क्रम से उत्तम जाति में जन्म पाता है । इसप्रकार सुख के समय में
चारों वर्णों के कर्त्तव्य शुभकर्म कहे गये हैं । अब आपत्तिकाल में
चारों वर्णों का बर्त्ताव कहा जाता है ॥ ३३१-३३६ ॥
नवां अध्याय पूरा हुआ ।