मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
१८८ मनुस्मृति ।
सेह निन्दामवाप्नोति पतिलोकाच्च हीयते ॥ १६१ ॥
नान्योत्पन्ना प्रजास्तीह न चाप्यन्यपरिग्रहे ।
न द्वितीयश्च साध्वीनां क्वचिद्भर्त्तोपदिश्यते ॥ १६२ ॥
हज़ारों लाखों बालब्रह्मचारी, ब्राह्मण कुल की वृद्धि के लिए,
बिना सन्तान के ही स्वर्ग को प्राप्त भए हैं। पति की मृत्यु के बाद,
जो स्त्रियाँ ब्रह्मचर्य से रहती हैं, वे पुत्रहीन भी स्वर्ग को पाती हैं,
जैसे ब्रह्मचारियों को मिला है। परन्तु जो स्त्रियाँ पुत्र की लालसा से
व्यभिचार करती हैं, वे लोक में निन्दा पाकर, अन्त में पतिलोक से
भ्रष्ट होजाती हैं। पति के सिवा दूसरे से उत्पन्न सन्तान उस स्त्री
की सन्तान नहीं गिनी जाती। पतिव्रता स्त्रियों के लिए दूसरे पति
की व्यवस्था कहीं नहीं है। अर्थात् विवाहित पति ही उसको सब
सुख और स्वर्गलोक देने में समर्थ होता है ॥ १५६-१६२ ॥
पतिं हित्वापकृष्टं स्वमुत्कृष्टं या निषेवते ।
निन्द्यैव सा भवेल्लोके परपूर्वेति चोच्यते ॥ १६३ ॥
व्यभिचारात्तु भर्तुः स्त्री लोके प्राप्नोति निन्द्यताम् ।
शृगालयोनिं प्राप्नोति पापरोगैश्च पीड्यते ॥ १६४ ॥
पतिं या नाभिचरति मनोवाग्देहसंयता ।
सा भर्तृलोकमाप्नोति सद्भिःसाध्वीति चोच्यते ॥ १६५ ॥
अनेन नारी वृत्तेन मनोवाग्देहसंयता ।
इहाग्र्यां कीर्तिमाप्नोति पतिलोकं परत्र च ॥ १६६ ॥
जो स्त्री रूप, धन आदि से रहित अपने पति को छोड़कर दूसरे
पुरुष की सेवा करती है वह संसार में निन्दा पाती है और इसका
अमुक पति पहला है अमुक दूसरा है इस प्रकार लोग कहते हैं।
जो स्त्री पति को छोड़कर व्यभिचार करती है वह जगत् में निन्दा
पाँचवां अध्याय । १८६
पाँचवां अध्याय । १८६
पाती है और मरकर शृगाल की योनि में जन्म लेती है । पाप रोग
कोढ़ वगैरह से पीड़ित होती है। और जो स्त्री शरीर, वाणी और मन
को वश में रखकर पतिसेवा करती है। वह पतिलोक पाती है
और संसार में पतिव्रता कहलाती है। मन, वाणी और शरीर से
नियम और सदाचार से रहनेवाली स्त्री उत्तम कीर्ति और
स्वर्ग पाती है ॥ १६३-१६६ ॥
एवं वृत्तां सवर्णां स्त्रीं द्विजातिः पूर्वमारिणीम् ।
दाहयेदग्निहोत्रेण यज्ञपात्रैश्च धर्मवित् ॥ १६७ ॥
भार्यायै पूर्वमारिण्यै दत्त्वाग्नीनन्त्यकर्मणि ।
पुनर्दारक्रियां कुर्यात् पुनराधानमेव च ॥ १६८ ॥
अनेन विधिना नित्यं पञ्चयज्ञान्न हापयेत् ।
द्वितीयमायुषो भागं कृतदारो गृहे वसेत् ॥ १६६ ॥
इति मानवे धर्मशास्त्रे भृगुप्रोक्तायां संहितायां
पञ्चमोऽध्यायः ॥ ५ ॥
इस प्रकार साध्वी, सवर्णा स्त्री पति से पूर्व मर जाय तो उसका
दाह अग्निहोत्र की अग्नि और यज्ञपात्रों के साथ करना चाहिए।
पति से पूर्व स्त्रीका मरण होने पर, उसकी अन्त्येष्टि क्रियापूर्वक
दाह देकर, फिर विवाह करके, स्मार्ताग्नि या श्रौताग्नि का धारण
करना चाहिए। द्विजातियों को उक्त विधि के अनुसार, नित्य
पञ्चमहायज्ञ करना और विवाह करके आयु का दूसरा भाग
गृहस्थाश्रम में बिताना चाहिए ॥ १६७-१६६ ॥
पाँचवाँ अध्याय पूर्ण हुआ ।
अथ षष्ठोऽध्यायः ।
एवं गृहाश्रमे स्थित्वा विधिवत्स्नातको द्विजः ।
वने वसेत्तु नियतो यथावद्विजितेन्द्रियः ॥ १ ॥
गृहस्थस्तु यदा पश्येद्वलीपलितमात्मनः ।
अपत्यस्यैव चापत्यं तदारण्यं समाश्रयेत् ॥ २ ॥
संत्यज्य ग्राम्यमाहारं सर्वं चैव परिच्छदम् ।
पुत्रेषु भार्यां निक्षिप्य वनं गच्छेत्सहैव वा ॥ ३ ॥
अग्निहोत्रं समादाय गृह्यं चाग्निपरिच्छदम् ।
ग्रामादरण्यं निःसृत्य निवसेन्नियतेन्द्रियः ॥ ४ ॥
मुन्यन्नैर्विविधैर्मेध्यैः शाकमूलफलेन वा ।
एतान्येव महायज्ञान्निर्वपेद्विधिपूर्वकम् ॥ ५ ॥
छठवां अध्याय ।
वानप्रस्थाश्रम-धर्म ।
इस प्रकार स्नातक द्विज गृहस्थाश्रम में विधिपूर्वक निवास
करके, शुद्ध और जितेन्द्रिय होकर वानप्रस्थाश्रम का स्वीकार करे।
जब गृहस्थ अपने शरीर की खाल ढीली, बाल पका और पुत्र के
भी पुत्र अर्थात् पौत्र देखे, तब वन में निवास करे । ग्राम का
आहार और घर का सामान छोड़कर, स्त्री को पुत्रों के पास छोड़
या साथ ही लेकर, वन यात्रा करे । अग्निहोत्र और उसकी सामग्री
साथ रखे और जितेन्द्रिय होकर निवास करे । नानाभांति के
मुनि अन्न, शाक, कन्द, फलों से पञ्चमहायज्ञ विधिपूर्वक
किया करे ॥ १-५ ॥
छठवां अध्याय । १६१
छठवां अध्याय । १६१
वसेत चर्म चीरं वा सायं स्नायात्प्रगे तथा ।
जटाश्च बिभ्रियान्नित्यं श्मश्रुलोमनखानि च ॥ ६ ॥
यद्भक्ष्यं स्यात्ततो दद्याद्बलिं भिक्षां च शक्तितः ।
अम्मूलफलभिक्षाभिरर्चयेदाश्रमागतान् ॥ ७ ॥
मृगचर्म या वल्कल धारण करे और प्रातःकाल-सायंकाल
दोनों समय स्नान करे। जटा, दाढ़ी मूंछ, लोम और नख का
सदा धारण करे। अपने भोजनार्थ जो कुछ हो उसमें से बलि और
भिक्षा देवे और आश्रम में आए मनुष्यों का जल, कन्द, फल और
भिक्षा से सत्कार करे ॥ ६-७ ॥
स्वाध्याये नित्ययुक्तः स्याद्दान्तो मैत्रः समाहितः ।
दाता नित्यमनादाता सर्वभूतानुकम्पकः ॥ ८ ॥
वैतानिकं च जुहुयादग्निहोत्रं यथाविधि ।
दर्शमस्कन्दयन्पर्व पौर्णमासं च योगतः ॥ ९ ॥
ऋक्षेष्ट्याग्रायणं चैव चातुर्मास्यानि चाहरेत् ।
उत्तरायणं च क्रमशॊ दक्षस्यायनमेव च ॥ १० ॥
वासन्तशारदैर्मेध्यैर्मुन्न्यन्नैः स्वयमाहृतैः ।
पुरोडाशांश्चरूंश्चैव विधिवन्निर्वपेत्पृथक् ॥ ११ ॥
देवताभ्यस्तु तद्हुत्वा वन्यं मेध्यतरं हविः ।
शेषमात्मनि युञ्जीत लवणं च स्वयंकृतम् ॥ १२ ॥
स्थलजौदकशाकानि पुष्पमूलफलानि च ।
मेध्यवृक्षोद्भवान्यद्यात्स्नेहांश्च फलसम्भवान् ॥ १३ ॥
वर्जयेन्मधुमांसं च भौमानि कवकानि च ।
१६२ मनुस्मृति ।
भूस्तृणं शिग्रुकं चैव श्लेष्मान्तकफलानि च ॥ १४ ॥
सदा वेदपाठ में लगा रहे, इन्द्रियाँ वश में रक्खे, सब से मित्रता
रक्खे, मनको स्थिर रक्खे, सदा दान देवे, किसीका दान न लेवे
और सब प्राणियों पर दयादृष्टि रक्खे । वैतानिक अग्निहोत्र सदा
करे, और अमावस—पूर्णिमा को इष्टि भी किया करे । नक्षत्रयाग,
चातुर्मास्य, उत्तरायण और दक्षिणायन याग को क्रम से करे । व-
सन्त और शरद् ऋतु के मुनि अन्नों को खुद लाकर, विधि से चरु
और पुरोडाश बनाकर याग करे । इस पवित्र हवि से देव होम
करके, बाक़ी खुद खा लेवै । भूमि और जल में पैदा होनेवाले शाक,
पवित्र वृक्षों के फूल, फल, कंद और फलों से निकला तेल आदि
खाना । मद्य, मांस, कुकुरमुत्ता, सहँजन, लहसोड़ा वगैरह
न खाना ॥ ८-१४ ॥
त्यजेदाश्वयुजे मासि मुन्यन्नं पूर्वसंचितम् ।
जीर्णानि चैव वासांसि शाकमूलफलानि च ॥ १५ ॥
कुआर के महीना में, पहले इकट्ठा किया हुआ मुनि अन्न को
अलग कर दे, नया संग्रह करले और पुराने कपड़े, शाक, कन्द, फल
को भी अलग करदेवे ॥ १५ ॥
न फालकृष्टमश्नीयादुत्सृष्टमपि केनचित् ।
न ग्रामजातान्यार्त्तोऽपि मूलानि च फलानि च ॥ १६ ॥
अग्निपक्काशनो वा स्यात्कालपक्वभुगेव वा ।
अश्मकुट्टो भवेद्वापि दन्तोलूखलिकोऽपि वा ॥ १७ ॥
सद्यःप्रक्षालको वा स्यान्माससंचयिकोऽपि वा ।
षण्मासनिचयो वा स्यात्समानिचय एव वा ॥ १८ ॥
नक्तं चान्नं समश्नीयाद्दिवा वाहृत्य शक्तितः ।
चतुर्थकालिको वा स्यात्स्याद्वाप्यष्टमकालिकः ॥ १९ ॥
छठवां अध्याय। १६३
छठवां अध्याय। १६३
खेत का अन्न दूसरे का छोड़ा हुआ भी और गाँव का फल, फूल,
शाक आदि दुःखी होनेपर भी न खावे। मुनि अन्नों को आग में
पकाकर खाय, या ऋतु के पके फल खाय, पत्थर से पीसकर
खाय या दांतों से चबाकर खाय। एक दिन के योग्य या एक
महीना के या छः महीना के अथवा एक साल के निर्वाह लायक
अन्न का संग्रह करे। अन्न लाकर रात या दिन में एकबार भोजन
करे या एक दिन उपवास करके दूसरे दिन सायंकाल या तीन
दिन उपवास करके चौथे दिन सायंकाल भोजन करे॥ १६-१९॥
चान्द्रायणविधानैर्वा शुक्लकृष्णे च वर्तयेत्।
पक्षात्तयोर्वाप्यश्नीयाद्यवागूं कथितां सकृत् ॥ २०॥
पुष्पमूलफलैर्वापि केवलैर्वर्तयेत्सदा ।
कालपक्कैः स्वयंशीर्णैर्वैखानसमते स्थितः ॥ २१ ॥
भूमौ विपरिवर्तेत तिष्ठेद्वा प्रपदैर्दिनम् ।
स्थानासनाभ्यां विहरेत्सवनेषूपयन्नपः ॥ २२ ॥
ग्रीष्मे पञ्चतपास्तु स्याद्वर्षास्वभ्रावकाशिकः ।
आर्द्रवासास्तु हेमन्ते क्रमशो वर्धयंस्तपः ॥ २३ ॥
शुक्लपक्ष और कृष्णपक्ष में चान्द्रायण व्रत की विधि से रहे
अथवा पूर्णा और अमा को एक बार उबाली हुई यवागू खाय।
अथवा ऋतु में पके और स्वयं गिरे फल, मूल, फूलों से ही नि-
र्वाह करे। भूमि पर बैठा रहे या दिनभर पैरों से खड़ा रहे, अपने
स्थान और आसन में विहार करे। तीनों काल में स्नान किया करे।
गर्मी में पञ्चाग्नि सेवन करे। वर्षा में खुले स्थान में रहे, शीतकाल
में गीला कपड़ा धारण करे, इस प्रकार तपस्या को धीरे धीरे
बढ़ाता रहे ॥ २०-२३ ॥
उपस्पृशंस्त्रिषवणं पितॄन्देवांच्च तर्पयेत् ।
२५
१६४ मनुस्मृति ।
तपश्चरंश्चोग्रतरं शोषयेद्देहमात्मनः ॥ २४ ॥
अग्नीनात्मनि वैतानान्समारोप्य यथाविधि ।
अनग्निरनिकेतः स्यान्मुनिर्मूलफलाशनः ॥ २५ ॥
अप्रयत्नः सुखार्थेषु ब्रह्मचारी धराशयः ।
शरणेष्वममश्चैव वृक्षमूलनिकेतनः ॥ २६ ॥
तापसेष्वेव विप्रेषु यात्रिकं भैक्ष्यमाहरेत् ।
गृहमेधिषु चान्येषु द्विजेषु वनवासिषु ॥ २७ ॥
ग्रामादाहृत्य वाश्नीयादष्टौ ग्रासान्वने वसन् ।
प्रतिगृह्य पुटेनैव पाणिना शकलेन वा ॥ २८ ॥
एताश्चान्याश्च सेवेत दीक्षाविप्रो वने वसन् ।
विविधाश्चोपनिषदोरात्मसंसिद्धये श्रुतीः ॥ २९ ॥
तीनोंकाल स्नान करे, देवता और पितरों को तृप्त करे और उग्र
तपस्या करके अपना शरीर सुखाया करे। शास्त्रविधि के अनुसार
अग्निहोत्र का अपने में समारोप करके, अग्नि और घर को त्याग
दे और मौन रहकर फल मूल से निर्वाह किया करे। ब्रह्मचर्य से
रहे, भूमि पर सोवे, सुख के पदार्थों का उपाय न करे और निवास-
स्थान में ममता छोड़कर वृक्ष के नीचे रहाकरे। वनवासी ब्राह्मणों
से प्राणरक्षार्थ भिक्षा लावे या वनवासी गृहस्थ द्विजों से ही
मांग लावे। यह भिक्षा न मिले तो गाँव से भीख पत्ता या हाथ में
मांग कर, आठ ग्रास खा लेवे ॥ २४-२९ ॥
ऋषिभिर्ब्राह्मणैश्चैव गृहस्थैरेवं सेविताः ।
विद्यातपोविवृद्ध्यर्थं शरीरस्य च शुद्धये ॥ ३० ॥
अपराजितां वास्थाय व्रजेद्दिशमजिह्मगः ।
छठवां अध्याय । १६५
छठवां अध्याय । १६५
आनिपाताच्छरीरस्य युक्तो वार्यनिलाशनः ॥ ३१ ॥
वानप्रस्थ-ब्राह्मण इन नियमों का या दूसरों का पालन करता
हुआ, आत्मज्ञान के लिए उपनिषद् की श्रुतियों का अभ्यास करे।
इन नियमों का धारण, ऋषि, ब्राह्मण और गृहस्थों ने भी अपनी
विद्या और तपस्या की वृद्धि और शरीरशुद्धि के लिए सदा किया
है। इसभांति आचार करते भी कोई रोग आदि होजाय, जो न
दूर हो सके तो केवल वायु का आहार करता हुआ, ईशान कोण
को शरीरान्त तक चलाजाय ॥ ३०-३१ ॥
आसां महर्षिचर्याणां त्यक्त्वान्यतमया तनुम् ।
वीतशोकभयो विप्रो ब्रह्मलोके महीयते ॥ ३२ ॥
वनेषु च विहृत्यैवं तृतीयं भागमायुषः ।
चतुर्थमायुषो भागं त्यक्त्वा संगान्परिव्रजेत् ॥ ३३ ॥
इन महर्षियों के अनुष्ठानों में से कोई अनुष्ठान करके विप्र शरीर
को छोड़कर शोक, भय से रहित, ब्रह्मलोक में महिमा पाता है।
इस प्रकार आयु के तीसरे भाग को वन में बिताकर, चौथे भाग में
विषयादि वासना छोड़कर, संन्यास आश्रम को धारण करे ॥३२-३३॥
आश्रमादाश्रमं गत्वा हुतहोमो जितेन्द्रियः ।
भिक्षाबलिपरिश्रान्तः प्रव्रजन् प्रेत्य वर्धते ॥ ३४ ॥
ऋणानि त्रीण्यपाकृत्य मनो मोक्षे निवेशयेत् ।
अनपाकृत्य मोक्षं तु सेवमानो व्रजत्यधः ॥ ३५ ॥
अधीत्य विधिवद्वेदान्पुत्रांश्चोत्पाद्य धर्मतः ।
इष्ट्वा च शक्तितो यज्ञैर्मनो मोक्षे निवेशयेत् ॥ ३६ ॥
अनधीत्य द्विजो वेदाननुत्पाद्य तथा सुतान् ।
अनिष्ट्वा चैव यज्ञैश्च मोक्षमिच्छन्व्रजत्यधः ॥ ३७ ॥
१६६ मनुस्मृति ।
प्राजापत्यां निरूप्येष्टिं सर्ववेदसदक्षिणाम् ।
आत्मन्यग्नीन्समारोप्य ब्राह्मणःप्रव्रजेद्गृहात् ॥३८॥
संन्यासाश्रम-धर्म ।
आश्रम से आश्रम अर्थात् ब्रह्मचर्य से गृहस्थ, उससे वानप्रस्थ
में जाकर और हवन, भिक्षा, बलि आदि से थका हुआ, संन्यास
लेनेवाला पुरुष देह त्याग करने पर मोक्ष पाता है। ऋषिरृण, देव-
ऋण और पितृऋण इन तीनों से छुटकारा पाने पर, मनको मोक्ष
धर्म में लगावे अन्यथा करने से नरकगामी होता है । विधि से
वेदाध्ययन-ऋषिऋण, धर्म विवाह से पुत्रोत्पादन—पितृऋण, यज्ञ
आदि—देवऋण, इनसे यथाशक्ति छुट्टी लेकर मोक्ष में चित्त ल-
गावे । जो पुरुष वेदादि का पठन न करके संन्यास लेता है वह
नरक में पड़ता है । सर्वस्व दक्षिणा की प्रजापति इष्टि को करके
और आत्मा में अग्नि का आधान करके ब्राह्मण को संन्यास ग्रहण
करना चाहिए ॥ ३४-३८ ॥
यो दत्त्वा सर्वभूतेभ्यः प्रव्रजत्यभयं गृहात् ।
तस्य तेजोमया लोका भवन्ति ब्रह्मवादिनः॥ ३६ ॥
यस्मादण्वपि भूतानां द्विजात्नोत्पद्यते भयम् ।
तस्य देहाद्विमुक्तस्य भयं नास्ति कुतश्चन ॥ ४० ॥
आगारादभिनिष्क्रान्तः पवित्रोपचितो मुनिः ।
समुपोढेषु कामेषु निरपेक्षः परिव्रजेत् ॥ ४१ ॥
एक एव चरेन्नित्यं सिद्धयर्थमसहायवान् ।
सिद्धिमेकस्य संपश्यन्न जहाति न हीयते ॥ ४२ ॥
अनग्निरनिकेतः स्याद्ग्राममन्नार्थमाश्रयेत् ।
उपेक्षकोऽशङ्कुसुको मुनिर्भावसमाहितः ॥ ४३ ॥
छठवां अध्याय । १६७
छठवां अध्याय । १६७
जो पुरुष सब प्राणियों को अभय देकर, घर से चौथे आश्रम
को जाता है उसको तेजोमय लोक प्राप्त होते हैं । जिस द्विज से
प्राणियों को ज़रा भी भय नहीं होता, उसको देह त्यागने पर कहीं
किसीका भय नहीं होता । घर से निकल कर, पवित्र दण्ड और
कमण्डलु धारण करके, मौन भाव से विचरे और सब लौकिक
कार्यों से विरक्त हो जावे । अकेला ही नित्य विचरे किसीकी मदद
न लेवे, क्योंकि अकेले ही मुक्ति मिलती है । ऐसे पुरुष को न
किसी के त्याग का दुःख होता है और न उससे दूसरे कोही दुःख
पहुँचता है । अग्नि और घर को छोड़कर भिक्षा के लिए गाँव का
सहारा रक्खे । दुःख में चिन्ता न करे और स्थिर चित्त से काल
बितावे ॥ ३६-४३ ॥
कपालं वृक्षमूलानि कुचेलमसहायता ।
समता चैव सर्वस्मिन्नेतन्मुक्तस्य लक्षणम् ॥ ४४ ॥
नाभिनन्देत मरणं नाभिनन्देत जीवितम् ।
कालमेव प्रतीक्षेत निदेशं भृतको यथा ॥ ४५ ॥
दृष्टिपूतं न्यसेत्पादं वस्त्रपूतं जलं पिबेत् ।
सत्यपूतां वदेद्वाचं मनःपूतं समाचरेत् ॥ ४६ ॥
भिक्षापात्र, वृक्ष के नीचे निवास, फटे टूटे वस्त्र, किसी की
मदद न लेना और सब के ऊपर समान भाव रखना, ये सब मुक्त
पुरुष के लक्षण हैं। न मरने की और न जीने की ही इच्छा करे
किन्तु काल की प्रतीक्षा किया करे जैसे नौकर आज्ञा की प्रतीक्षा
करता है। आँखों से देखकर भूमि में पैर धरे, जल छानकर पीवे,
सत्य वाणी बोले और मन पवित्र रखकर आचरण करे ॥ ४४-४६ ॥
अतिवादांस्तितिक्षेत नावमन्येत कञ्चन ।
न चेमं देहमाश्रित्य वैरं कुर्वीत केनचित् ॥ ४७ ॥
क्रुध्यन्तं न प्रतिक्रुध्येदाक्रुष्टः कुशलं वदेत् ।
१६८ मनुस्मृति।
सप्तद्वारावकीर्णां च न वाचमनृतां वदेत् ॥ ४८ ॥
अध्यात्मरतिरासीनो निरपेक्षो निरामिषः।
आत्मनैव सहायेन सुखार्थी विचरेदिह ॥ ४६ ॥
कोई व्यर्थ झगड़ा करे तो उसको सहन करे, किसीका अपमान
न करे। और इस देह से किसी से वैर करना भी अच्छा नहीं है।
क्रोध करनेवाले पर क्रोध, निन्दक की निन्दा न करे वरन कुशल
वृत्तान्त उसका पूंछे। पांच इन्द्रियां, मन और बुद्धि इन सात द्वारों
में बिखरी हुई असत्य वाणी न बोले, किन्तु ईश्वर चिन्ता में लगा
रहे। परब्रह्म के ध्यान में मग्न, योगासन से स्थित, ममता को छोड़-
कर, केवल अपनी सहायता से ही मोक्षसुख चाहता हुआ इस
जगत् में विचरे ॥ ४७-४६ ॥
न चोत्पातनिमित्ताभ्यां न नक्षत्राङ्गविद्यया।
नानुशासनवादाभ्यां भिक्षां लिप्सेत कर्हिचित्॥५०॥
न तापसैर्ब्राह्मणैर्वा वयोभिरपि वा श्वभिः।
आकीर्णं भिक्षुकैर्वाऽन्यैरगारमुपसंव्रजेत् ॥ ५१ ॥
कॢप्तकेशनखश्मश्रुः पात्री दण्डी कुसुम्भवान्।
विचरेन्नियतो नित्यं सर्वभूतान्यपीडयन् ॥ ५२ ॥
अतैजसानि पात्राणि तस्य स्युर्निर्व्रणानि च।
तेषामद्भिःस्मृतं शौचं चमसानामिवाध्वरे ॥ ५३ ॥
अलाबुं दारुपात्रं च मृण्मयं वैदलं तथा।
एतानि यतिपात्राणि मनुःस्वायम्भुवोऽब्रवीत् ॥५४॥
भूकम्प आदि उत्पात, ग्रह-नक्षत्र का फल, हाथकी रेखा, उप-
देश या शास्त्रार्थ के बहाने भिक्षा की इच्छा न करनी। वानप्रस्थ,
दूसरे कोई ब्राह्मण, पक्षी, कुत्ता या भिखारियों से घिरे स्थान में
भिक्षा को न जावे । केश, नख और दाढ़ी मूंछों को मुड़ाकर, भिक्षा-
पात्र, दण्ड, कमण्डलु और रंगे वस्त्रों के सहित, किसी को दुःख
न देकर, नियम से विचरा करे । संन्यासी के पात्र, सोना, चांदी
आदि धातु के न हों, उन पात्रों की पवित्रता यज्ञपात्रों की भांति
जल से ही होती है । तुंबी, काठ, मिट्टी या बांस का पात्र संन्या-
सियों के लिए शास्त्र में लिखा है । इनको ' यतिपात्र '
कहते हैं ॥ ५०-५४ ॥
एककालं चरेद्भैक्षं न प्रसज्जेत विस्तरे ।
भैक्षे प्रसक्तो हि यतिर्विषयेष्वपि सज्जति ॥ ५५ ॥
विधूमे सन्नमुसले व्यङ्गारे भुक्तवज्जने ।
वृत्ते शरावसंपाते भिक्षां नित्यं यतिश्चरेत् ॥ ५६ ॥
अलाभे न विषादी स्याल्लाभे चैव न हर्षयेत् ।
प्राणयात्रिकमात्रः स्यान्मात्रासङ्गाद्विनिर्गतः ॥ ५७ ॥
अभिपूजितलाभांस्तु जुगुप्सेतैव सर्वशः ।
अभिपूजितलाभैश्च यतिर्मुक्तोऽपि बध्यते ॥ ५८ ॥
संन्यासी एकवार भिक्षा करे, अधिकवार भिक्षा न करे । क्योंकि
अधिक भिक्षा से कामादि विषयों में मन लग जाता है । रसोई का
धुंआ निकल गया हो, कूटना बंद हो चुका हो, आग बुझादी गई
हो, सब भोजन करचुके हों, पात्र फेंक दिये हों तब भिक्षा करनी
चाहिए । भिक्षा न मिलने पर खेद और मिलने पर आनन्द न माने,
जीवनमात्र का उपाय करे । शब्द, स्पर्श आदि विषयों से रहित
होवे । सत्कार के साथ मिली भिक्षाओं से घृणा करे, क्योंकि-
ऐसी भिक्षाओं से मुक्त हुआ भी संन्यासी बन्धन में पड़
जाता है ॥ ५५-५८ ॥
अल्पान्नाभ्यवहारेण रहःस्थानासनेन च ।
२०० मनुस्मृति।
ह्रियमाणानि विषयैरिन्द्रियाणि निवत्र्तयेत् ॥ ५६ ॥
इन्द्रियाणां निरोधेन रागद्वेषक्षयेण च ।
अहिंसया च भूतानाममृतत्वाय कल्पते ॥ ६० ॥
अवेक्षेत गतीर्नॄणां कर्मदोषसमुद्भवाः ।
निरये चैव पतनं यातनाश्च यमक्षये ॥ ६१ ॥
विप्रयोगं प्रियैश्चैव संयोगं च तथाप्रियैः ।
जरया चाभिभवनं व्याधिभिश्चोपपीडनम् ॥ ६२ ॥
थोड़ा भोजन से, निर्जन में निवास से, विषयों में खिंची हुई
इन्द्रियों को रोके। इन्द्रियों के रोक, राग-द्वेष के नाश और प्रा-
णियों की हिंसा न करने से पुरुष मोक्ष के योग्य होता है। मनुष्य
के कर्म दोषों से दुर्गति, नरक में पड़ना और यम-यातना आदि
का विचार करे। पुत्र, स्त्री आदि प्रियजनों का वियोग, अप्रियों
का समागम, वृद्धावस्था में तिरस्कार और रोगों से शरीरक्लेश
यह सब निषिद्ध कर्मों का फल समझना चाहिए ॥ ५६-६२ ॥
देहादुत्क्रमणं चास्मात्पुनर्गर्भे च सम्भवम् ।
योनिकोटिसहस्रेषु सृतीश्चास्यान्तरात्मनः ॥ ६३ ॥
अधर्मप्रभवं चैव दुःखयोगं शरीरिणाम् ।
धर्मार्थप्रभवं चैव सुखसंयोगमक्षयम् ॥ ६४ ॥
सूक्ष्मतां चान्ववेक्षेत योगेन परमात्मनः ।
देहेषु च समुत्पत्तिमुत्तमेष्वधमेषु च ॥ ६५ ॥
दूषितोऽपि चरेद्धर्मं यत्र तत्राश्रमे रतः ।
समः सर्वेषु भूतेषु न लिङ्गं धर्मकारणम् ॥ ६६ ॥
फलं कतकवृक्षस्य यद्यप्यम्बुप्रसादकम् ।
छठवां अध्याय । २०१
छठवां अध्याय । २०१
न नामग्रहणादेव तस्य वारि प्रसीदति ॥ ६७ ॥
इस देह से निकलना, फिर गर्भ में उत्पत्ति और लाखों योनियों
में इस जीवात्मा का जाना, ये सब अपने कर्मफलं हैं। अधर्म से
दुःख में पड़ना और धर्म से अक्षय सुख-मोक्ष मिलना-इसका
विचार करे। योग से परमात्मा की सूक्ष्मता का ध्यान करे । और
उत्तम-अधम योनियों में शुभाशुभ फलभोगार्थ जीवों की उत्पत्ति
का विचार करे। आश्रम के विरुद्ध कोई दोष भी लगे, तोभी जीवों
पर समभाव रखकर, धर्माचरण करता रहे । क्योंकि दण्ड-कम-
ण्डलु चिह्न धारण करना ही धर्माचरण नहीं कहलाता । निर्मली
के फल का नाम लेने से ही जल निर्मल नहीं होता, उसको जल
में छोड़ने से होता है । ऐसेही आश्रमचिह्न धारण से फल नहीं
होता किन्तु आचरण से होता है ॥ ६३-६७ ॥
संरक्षणार्थं जन्तूनां रात्रावहनि वा सदा ।
शरीरस्यात्यये चैव समीक्ष्य वसुधां चरेत् ॥ ६८ ॥
अह्ना रात्र्या च याञ्जन्तून् हिनस्त्यज्ञानतो यतिः ।
तेषां स्नात्वा विशुद्धयर्थं प्राणायामान्षडाचरेत् ॥ ६९ ॥
: प्राणायामा ब्राह्मणस्य त्रयोऽपि विधिवत्कृताः ।
व्याहृतिप्रणवैर्युक्ता विज्ञेयं परमं तपः ॥ ७० ॥
दिन या रात में, संन्यासी को भूमि में जीवों को बचाकर पैर
रखना चाहिए। चाहे शरीर को दुःख भी मिले। जो यति चलता
फिरता अनजान में, जीवों की हिंसा करता है, उस पाप के ना-
शार्थ स्नान करके छ प्राणायाम करना चाहिए । यदि ब्राह्मण
प्रणव और व्याहृति से विधिपूर्वक तीन भी प्राणायाम करे तो भी
उसको परम तप मानना चाहिए ॥ ६८-७० ॥
दह्यन्ते ध्मायमानानां धातूनां हि यथा मलाः ।
२६
२०२ मनुस्मृति।
तथेन्द्रियाणां दह्यन्ते दोषाः प्राणस्य निग्रहात् ॥७१॥
प्राणायामैर्दहेद्दोषान्धारणाभिश्च किल्बिषम् ।
प्रत्याहारेण संसर्गान् ध्यानेनानीश्वरान् गुणान्॥७२॥
उच्चावचेषु भूतेषु दुर्ज्ञेयामकृतात्मभिः ।
ध्यानयोगेन संपश्येद्गतिमस्यान्तरात्मभिः ॥ ७३ ॥
सम्यग्दर्शनसंपन्नः कर्मभिर्न निवध्यते ।
दर्शनेन विहीनस्तु संसारं प्रतिपद्यते ॥ ७४ ॥
जैसे सुवर्ण आदि धातुओं का मैल अग्नि में धौंकने से जल
जाता है वैसेही प्राणायाम से इन्द्रियों के दोष जलजाते हैं। प्राणा-
याम से दोषों को, ब्रह्म में मनकी धारणा से पाप को, इन्द्रियसंयम
से विषयों को और ध्यान से काम, क्रोध, मोह आदि को जलावे।
इस जीव की ऊंची, नीची योनियों में जन्मप्राप्ति का ध्यान योग
से विचार करे, क्योंकि, जीवगति सब को ज्ञात नहीं होती । ब्रह्म
साक्षात्कार करनेवाला पुरुष कर्मबन्धन में नहीं बँधता और
जो उससे रहितहै वह जन्म-मरण के बन्धन में पड़ता है ॥ ७१-७४॥
अहिंसयेन्द्रियासङ्गैर्वैदिकैश्चैव कर्मभिः ।
तपसश्चरणैश्चोग्रैः साधयन्तीह तत्पदम् ॥ ७५ ॥
अस्थिस्थूणं स्नायुयुतं मांसशोणितलेपनम् ।
चर्मावनद्धं दुर्गन्धिपूर्णं मूत्रपुरीषयोः ॥ ७६ ॥
जराशोकसमाविष्टं रोगायतनमातुरम् ।
रजस्वलमनित्यं च भूतावासमिमं त्यजेत् ॥ ७७ ॥
नदीकूलं यथा वृक्षो वृक्षं वा शकुनिर्यथा ।
तथा त्यजन्निमं देहं कृच्छ्राद्ग्राह्याद्विमुच्यते ॥ ७८ ॥
छठवां अध्याय । २०३
छठवां अध्याय । २०३
अहिंसा, इन्द्रियनिग्रह, वैदिक कर्मानुष्ठान, व्रत आदि उग्र तपों
से इस लोक में ब्रह्मपद का साधन होता है । यह शरीर हड्डी
रूप खंभा में स्नायुरूप डोरियों से बँधा, मांस और रुधिर रूप
गारा से लिपा चमड़ा से मढ़ा, मल-मूत्र और दुर्गन्धि से पूर्ण है ।
बुढ़ापा शोक, रोग, दुःख का घर है, रजोगुणी है, अनित्य है,
पांच महाभूतों का निवासस्थान है, इससे ममता छोड़देनी चा-
हिए । जैसे नदीतट को वृक्ष छोड़ देता है, पक्षी वृक्ष को छोड़ देता
है, वैसे संन्यासी इस देह की ममता छोड़ देवे तो कठिन संसारी
ग्राह से छूट जाता है ॥ ७५-७८ ॥
प्रियेषु स्वेषु सुकृतमप्रियेषु च दुष्कृतम् ।
विसृज्य ध्यानयोगेन ब्रह्माभ्येति सनातनम् ॥ ७६ ॥
यदा भावेन भवति सर्वभावेषु निःस्पृहः ।
तदा सुखमवाप्नोति प्रेत्य चेह च शाश्वतम् ॥ ८० ॥
अनेन विधिना सर्वांस्त्यक्त्वा सङ्गान् शनैः शनैः ।
सर्वद्वन्द्वविनिर्मुक्तो ब्रह्माण्येवावतिष्ठते ॥ ८१ ॥
ध्यानिकं सर्वमेवैतद्यदेतदभिशब्दितम् ।
नह्यनध्यात्मवित्कश्चित्क्रियाफलमुपाश्नुते ॥ ८२ ॥
ब्रह्मज्ञानी पुरुष अपने प्रिय पुरुषों के ऊपर पुण्य और अप्रियों
के ऊपर पाप त्यागकर, ध्यानयोग से सनातन ब्रह्मपद को प्राप्त
होता है । जब संन्यासी सब भांति निःस्पृह होजाता है, तब इस
लोक में सुख पाता है और मरण के बाद मोक्षसुख को पाता है ।
इस रीति से धीरे धीरे संग को छोड़कर दुःखसुख से मुक्त होकर,
ब्रह्म में ही स्थित होजाता है । यह जो धन, पुत्र आदि की ममता
का त्याग कहा है, वह सब परमात्मा के ध्यान से ही होसकता
है । जिसको आत्मा के स्वरूप का ज्ञान नहीं है वह ध्यानादि कर्मों
का फल नहीं पाता है ॥ ७६-८२ ॥
३०४ मनुस्मृति ।
अधियज्ञं ब्रह्म जपेदाधिदैविकमेव च ।
आध्यात्मिकं च सततं वेदान्ताभिहितं च यत् ॥ ८३ ॥
इदं शरणमज्ञानामिदमेव विजानताम् ।
इदमन्विच्छतां स्वर्गमिदमानन्त्यमिच्छताम् ॥ ८४ ॥
अनेन क्रमयोगेन परिव्रजति यो द्विजः ।
स विधूयेह पाप्मानं परंब्रह्माधिगच्छति ॥ ८५ ॥
एष धर्मोऽनुशिष्टो वो यतीनां नियतात्मनाम् ।
वेदसंन्यासिकानां तु कर्मयोगं निबोधत ॥ ८६ ॥
यज्ञ, देवता और आत्मा के विषय में जो वेदमन्त्र हैं और वे-
दान्त ( ब्रह्मज्ञान ) प्रतिपादक जो मन्त्र हैं उनका सदा पाठ और
जप विचार करे । यह वेद ज्ञानी, अज्ञानी और स्वर्ग, मोक्ष की
इच्छावालों का भी शरण है अर्थात् वेद ही सर्वस्व है । इस क्रम
से जो द्विज संन्यास धारण करता है, वह सब पापों से छूटकर,
ब्रह्मभाव में लीन होजाता है । इस प्रकार, यह धर्म जितेन्द्रिय
यतियों का कहा गया ,है अब वेद संन्यासी, अर्थात् जो चिह्न
धारण गृहत्याग न करके ज्ञान सेही संन्यासी है उनका कर्मयोग
सुनो ॥ ८३-८६ ॥
ब्रह्मचारी गृहस्थश्च वानप्रस्थो यतिस्तथा ।
एते गृहस्थप्रभवाश्चत्वारः पृथगाश्रमाः ॥ ८७ ॥
सर्वेऽपि क्रमशस्त्वेते यथाशास्त्रं निषेविताः ।
यथोक्तकारिणं विप्रं नयन्ति परमां गतिम् ॥ ८८ ॥
सर्वेषामपि चैतेषां वेदस्मृतिविधानतः ।
गृहस्थ उच्यते श्रेष्ठः स त्रीनेतान् बिभर्त्ति हि ॥ ८६ ॥
छठवां अध्याय । २०५
छठवां अध्याय । २०५
यथानदीनदाः सर्वे सागरे यान्ति संस्थितिम् ।
तथैवाश्रमिणःसर्वे गृहस्थे यान्ति संस्थितिम् ॥ ६० ॥
ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ और यति ये चार अलग अलग
आश्रम गृहस्थ से उत्पन्न हैं । ये चारों आश्रम नियम से सेवित हों
तो उत्तमगति देनेवाले हैं । इन सब आश्रमों में वेद और स्मृतियों के
अनुसार गृहस्थाश्रम श्रेष्ठ कहा गया है । क्योंकि यह तीनों का पा-
लन करता है । जैसे सब नदी और नद समुद्र में जाकर ठहरते हैं,
वैसे सब आश्रमी गृहस्थ में आश्रम रखते हैं ॥ ८७-६० ॥
चतुर्भिरपि चैवैतैर्नित्यमाश्रमिभिर्द्विजैः ।
दशलक्षणको धर्मः सेवितव्यः प्रयत्नतः ॥ ६१ ॥
धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः ।
धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम् ॥ ६२ ॥
दशलक्षणानि धर्मस्य ये विप्राः समधीयते ।
अधीत्य चानुवर्त्तन्ते ते यान्ति परमांगतिम् ॥ ६३ ॥
ब्रह्मचारी आदि चारों आश्रमवाले द्विजों को दशलक्षणवाले धर्म
का सेवन यत्न से करना चाहिए । उनके लक्षण इस प्रकार हैं-
१-धैर्य, २-क्षमा, ३-दम-मनको रोकना, ४-अस्तेय-चोरी न
करना, ५-शौच-बाहर भीतरसे शुद्ध, ६-इन्द्रिय-निग्रह, ७-धी-
शास्त्रज्ञान, ८-विद्या-ब्रह्मविद्या, ९-सत्य, १०-अक्रोध-क्रोध न
करना । जो विप्र धर्म के दशलक्षणों को पढ़ते हैं और उसके अनु-
सार आचरण करते हैं, वे परमगति को पाते हैं ॥ ६१-६३ ॥
दशलक्षकं धर्ममनुतिष्ठन्समाहितः ।
वेदान्तविधिवच्छ्रुत्वा संन्यसेदनृणो द्विजः ॥ ६४ ॥
संन्यस्य सर्वकर्माणि कर्मदोषानपानुदन् ।
२०६ मनुस्मृति।
नियतो वेदमभ्यस्य पुत्रैश्वर्ये सुखं वसेत् ॥ ९५ ॥
एवं संन्यस्य कर्माणि स्वकार्यपरमोऽस्पृहः ।
संन्यासेनापहत्यैनः प्राप्नोति परमां गतिम् ॥ ९६ ॥
एष वोऽभिहितो धर्मो ब्राह्मणस्य चतुर्विधः ।
पुण्योऽक्षयफलः प्रेत्य राज्ञां धर्मं निबोधत ॥ ९७ ॥
इति मानवे धर्मशास्त्रे भृगुप्रोक्तायां संहितायां
षष्ठोऽध्यायः ॥
ऋषि, देव और पितरों के ऋण से मुक्त होकर, दशलक्षण धर्म
का सेवन करता हुआ द्विज वेदान्त को सुनकर संन्यास धारण
करे। सब अग्निहोत्रादि कर्मों को छोड़कर, पापों का प्राणायाम
से नाश करके, जितेन्द्रिय होकर वेद का अध्ययन करे और पुत्रों
के दिये भोजन, वस्त्रादि का सुख से उपभोग करे। इस प्रकार,
सब कर्मों को छोड़कर, केवल आत्मसाक्षात्कार में तत्पर रहकर,
संन्यास धारण करने से ब्रह्मपद को पहुँचता है। यह पवित्र
और परलोक में अक्षय फल देनेवाला ब्राह्मण का चारों प्रकार
का धर्म कहा गया है। अब राजधर्म को सुनो ॥ ९४-९७ ॥
छठवां अध्याय पूरा हुआ।
अथ सप्तमोऽध्यायः ।
राजधर्मान्प्रवक्ष्यामि यथावृत्तो भवेन्नृपः ।
संभवश्च यथा तस्य सिद्धिश्च परमा यथा ॥ १ ॥
ब्राह्मं प्राप्तेन संस्कारं क्षत्रियेण यथाविधि ।
सर्वस्यास्य यथान्यायं कर्तव्यं परिरक्षणम् ॥ २ ॥
अराजके हि लोकेऽस्मिन् सर्वतो विद्रुते भयात् ।
रक्षार्थमस्य सर्वस्य राजानमसृजत्प्रभुः ॥ ३ ॥
इन्द्रानिलयमार्काणामग्नेश्च वरुणस्य च ।
चन्द्रवित्तेशयोश्चैव मात्रा निर्हृत्य शाश्वतीः ॥ ४ ॥
यस्मादेषां सुरेन्द्राणां मात्राभ्यो निर्मितो नृपः ।
तस्मादभिभवत्येष सर्वभूतानि तेजसा ॥ ५ ॥
तपत्यादित्यवच्चैष चक्षूंषि च मनांसि च ।
न चैनं भुवि शक्नोति कश्चिदप्यभिवीक्षितुम् ॥ ६ ॥
सोऽग्निर्भवति वायुश्च सोऽर्कःसोमःस धर्मराट् ।
स कुबेरः स वरुणः स महेन्द्रः प्रभावतः ॥ ७ ॥
सातवां अध्याय ।
राजधर्म ।
जैसा राजा का आचरण होना चाहिए, जैसे उसकी उत्पत्ति
हुई है, और जिस प्रकार उसको परम सिद्धि प्राप्त होती है वह
सब कहा जाता है । उपनयन संस्कारवाले क्षत्रिय राजा को न्याया-