मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 330, कुल 649 में से
संदर्भ में पढ़ेंअथ षष्ठोऽध्यायः ।
एवं गृहाश्रमे स्थित्वा विधिवत्स्नातको द्विजः ।
वने वसेत्तु नियतो यथावद्विजितेन्द्रियः ॥ १ ॥
गृहस्थस्तु यदा पश्येद्वलीपलितमात्मनः ।
अपत्यस्यैव चापत्यं तदारण्यं समाश्रयेत् ॥ २ ॥
संत्यज्य ग्राम्यमाहारं सर्वं चैव परिच्छदम् ।
पुत्रेषु भार्यां निक्षिप्य वनं गच्छेत्सहैव वा ॥ ३ ॥
अग्निहोत्रं समादाय गृह्यं चाग्निपरिच्छदम् ।
ग्रामादरण्यं निःसृत्य निवसेन्नियतेन्द्रियः ॥ ४ ॥
मुन्यन्नैर्विविधैर्मेध्यैः शाकमूलफलेन वा ।
एतान्येव महायज्ञान्निर्वपेद्विधिपूर्वकम् ॥ ५ ॥
छठवां अध्याय ।
वानप्रस्थाश्रम-धर्म ।
इस प्रकार स्नातक द्विज गृहस्थाश्रम में विधिपूर्वक निवास
करके, शुद्ध और जितेन्द्रिय होकर वानप्रस्थाश्रम का स्वीकार करे।
जब गृहस्थ अपने शरीर की खाल ढीली, बाल पका और पुत्र के
भी पुत्र अर्थात् पौत्र देखे, तब वन में निवास करे । ग्राम का
आहार और घर का सामान छोड़कर, स्त्री को पुत्रों के पास छोड़
या साथ ही लेकर, वन यात्रा करे । अग्निहोत्र और उसकी सामग्री
साथ रखे और जितेन्द्रिय होकर निवास करे । नानाभांति के
मुनि अन्न, शाक, कन्द, फलों से पञ्चमहायज्ञ विधिपूर्वक
किया करे ॥ १-५ ॥