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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

५४ मनुस्मृति ।
ब्रह्मचारी के धर्म ।
नित्य स्नान से पवित्र होकर द्विज, देवता, ऋषि और पितरों
का तर्पण, देवपूजन और होम करना चाहिए । मधु-शराब, मांस,
सुगन्ध का पदार्थ, पुष्प, रस, स्त्री जो सड़ी चीज़-सिरका वगैरह
और प्राणियों की हिंसा इनको छोड़ देना चाहिए । तैल लगाना,
आँखों में अंजन, जूता, छतरी, काम, क्रोध, लोभ, नाच, गान,
बाजा, जुआ, बकवाद करना, परनिन्दा, झूठ बोलना, स्त्रियों
को देखना और छूना, दूसरे का अनहित, ये सब छोड़ देना
चाहिए ॥ १७६-१७८ ॥
एकः शयीत सर्वत्र न रेतः स्कन्दयेत्क्वचित् ।
कामाद्धि स्कन्दयन् रेतो हिनस्ति व्रतमात्मनः ॥१८०॥
स्वप्ने सिक्त्वा ब्रह्मचारी द्विजः शुक्रमकामतः ।
स्नात्वार्कमर्चयित्वा त्रिः पुनर्मामित्यृचं जपेत् ॥१८१॥
उदकुम्भं सुमनसो गोशकृन्मृत्तिकाकुशान् ।
आहरेद्यावदर्थानि भैक्षं चाहरहश्चरेत् ॥ १८२ ॥
वेदयज्ञैरहीनानां प्रशस्तानां स्वकर्मसु ।
ब्रह्मचार्य्याहरेद्भैक्षं गृहेभ्यः प्रयतोऽन्वहम् ॥ १८३ ॥
गुरोः कुले न भिक्षेत न ज्ञातिकुलबन्धुषु ।
अलाभे त्वन्यगेहानां पूर्वं पूर्वं विवर्जयेत् ॥ १८४ ॥
हमेशा अकेला सोवे और वीर्य को न गिरावे । जो इच्छा से वीर्य-
पात करता है वह अपने ब्रह्मचर्यव्रत का नाश करता है । अपनी
इच्छा के बिना स्वप्न में वीर्यपात होजाय तो स्नान, सूर्यपूजन कर
के 'पुनर्मामेत्विन्द्रियम्' इस ऋचा का तीन बार जप करे । जल
का घड़ा, फूल, गोबर, मिट्टी और कुश ये चीज़ें ज़रूरत भर लावे
और प्रतिदिन भिक्षा माँगे । वेद और यज्ञ से जो रहित नहीं हैं,

दूसरा अध्याय । ५५

दूसरा अध्याय । ५५
अपने नित्यकर्म में परायण हैं, उनके घरों से ब्रह्मचारी भिक्षा
लावे। अपने गुरुकुल में, जाति में और सम्बन्धीयों से भिक्षा न
माँगे, यदि दूसरे जगह न मिल सके तो समीप के रिश्ते में छोड़-
कर दूरवाले में माँगे ॥ १८०-१८४ ॥
सर्वं वापि चरेद्ग्रामं पूर्वोक्तानामसम्भवे ।
नियम्य प्रयतो वाचमभिशस्तांस्तु वर्जयेत् ॥ १८५ ॥
दूरादाहृत्य समिधः संनिदध्याद्विहायसि ।
सायं प्रातश्च जुहुयात्ताभिरग्निमतन्द्रितः ॥ १८६ ॥
अकृत्वा भैक्षचरणमसमिध्य च पावकम् ।
अनातुरः सप्तरात्रमवकीर्णिब्रतं चरेत् ॥ १८७ ॥
अगर धर्म-कर्मवाले पुरुषों का गाँव में अभाव हो तो सब गाँवों
में भिक्षा को जाय । महापातकी लोगों को छोड़ देवे । और अपनी
वाणी का सदा संयम रक्खे । दूर से समिधा-होम की लकड़ी
लाकर ऊंचेपर धरे और निरालस होकर प्रातःकाल और सायंकाल
उससे अग्नि में हवन करे । ब्रह्मचारी नीरोग होने पर यदि सात
रात तक भिक्षा न लावे और हवन न करे तो उसको 'अवकीर्णिब्रत'
प्रायश्चित्त ( ११ अध्याय का ) करना चाहिए ॥ १८५-१८७ ॥
भैक्षेण वर्तयेन्नित्यं नैकान्नादी भवेद्व्रती ।
भैक्षेण व्रतिनो वृत्तिरुपवाससमा स्मृता ॥ १८८ ॥
व्रतवद्देवदैवत्ये पित्र्ये कर्मण्यथर्षिवत् ।
काममभ्यर्थितोऽश्नीयाद्वतमस्य न लुप्यते ॥ १८६ ॥
ब्राह्मणस्यैव कर्मैतदुपदिष्टं मनीषिभिः ।
राजन्यवैश्ययोस्त्वेवं नैतत्कर्म विधीयते ॥ १६० ॥
ब्रह्मचारी भिक्षा माँगकर नित्य भोजन करे, एकही के घर का

५६ मनुस्मृति ।
अन्न लाकर न खावे । क्योंकि भिक्षा से जो निर्वाह होता है, वह
ऋत के समान माना जाता है । देवयज्ञ में निमन्त्रण हो तो निषिद्ध
पदार्थ छोड़कर एक का भी अन्न तृप्तिपूर्वक भोजन करे और
श्राद्ध में ऋषियों के समान भोजन करे इस प्रकार व्रत भंग
नहीं होता है । लेकिन विद्वानों ने यह कर्म ब्राह्मण ब्रह्मचारी
के लिए कहा है, क्षत्रिय और वैश्य के लिए ऐसा कर्म नहीं
है ॥ १८८-१६० ॥
चोदितो गुरुणा नित्यमप्रचोदित एव वा ।
कुर्यादध्ययने यत्नमाचार्यस्य हितेषु च ॥ १६१ ॥
शरीरं चैव वाचं च बुद्धीन्द्रियमनांसि च ।
नियम्य प्राञ्जलिस्तिष्ठेदीक्ष्यमाणो गुरोर्मुखम् ॥ १६२ ॥
नित्यमुद्धृतपाणिः स्यात्साध्वाचारः सुसंयुतः ।
आस्यतामिति चोक्तः सन्नासीताभिमुखं गुरोः ॥ १६३ ॥
हीनान्नवस्त्रवेशः स्यात्सर्वदा गुरुसन्निधौ ।
उत्तिष्ठेत्प्रथमं चास्य चरमं चैव संविशेत् ॥ १६४ ॥
प्रतिश्रवणसंभाषे शयानो न समाचरेत् ।
नासीनो न च भुञ्जानो न तिष्ठन्न पराङ्मुखः ॥ १६५ ॥
गुरु रोज़ कहे वा न कहे, पर अध्ययन और आचार्य के हित
के लिए सदा यत्न करना चाहिए । शरीर, वाणी, बुद्धि, ज्ञानेन्द्रिय
और मन का संयम करके हाथ जोड़कर गुरुमुख को देखता
हुआ रहा करे । ओढ़ने के वस्त्र से दाहना हाथ सदा बाहर रक्खे,
और गुरुआज्ञा से सामने बैठे । गुरु के पास में सादा भोजन और
सादा वस्त्र सदा पहने और गुरु के पहले जागे और पीछे सोवे ।
ब्रह्मचारी सोता, बैठा, खाता, खड़ा और मुँह फेरकर खड़ा हुआ
गुरु से बात चीत न करे ॥ १६१-१६५ ॥

दूसरा अध्याय । ५७

दूसरा अध्याय । ५७
आसीनस्य स्थितः कुर्यादभिगच्छंस्तु तिष्ठतः ।
प्रत्युद्गम्य त्वाव्रजतः पश्चाद्धावंस्तु धावतः ॥ १९६ ॥
पराङ्मुखस्याभिमुखो दूरस्थस्यैत्य चान्तिकम् ।
प्रणम्य तु शयानस्य निदेशे चैव तिष्ठतः ॥ १९७ ॥
नीचं शय्यासनं चास्य सर्वदा गुरुसन्निधौ ।
गुरोस्तु चक्षुर्विषये न यथेष्टासनो भवेत् ॥ १९८ ॥
नोदाहरेदस्य नाम परोक्षमपि केवलम् ।
न चैवास्यानुकुर्वीत गतिभाषितचेष्टितम् ॥ १९६ ॥
गुरोर्यत्र परीवादो निन्दा वापि प्रवर्तते ।
कर्णौ तत्र पिधातव्यौ गन्तव्यं वा ततोऽन्यतः ॥२००॥
परीवादात्खरो भवति श्वा वै भवति निन्दकः ।
परिभोक्ता कृमिर्भवति कीटो भवति मत्सरी ॥ २०१ ॥
गुरु आसन पर बैठे हों तो शिष्य आसन से उठकर, गुरु खड़े
हों तो पास जाकर, आते हों तो सन्मुख जाकर और जा रहे हों
तो उनके पीछे दौड़कर बात करना चाहिए । गुरु पीछे हों तो
सन्मुख होकर, दूर हों तो पास जाकर, लेटे हों तो प्रणाम करके,
खड़े हों तो समीप होकर आज्ञा को सुनना चाहिए । गुरु के पास
में बिछौना वा आसन गुरु से नीचा रखना चाहिए और उनके
सामने मनमानी तौर से न बैठे । गुरु के पीछे भी उनका अकेला
नाम लेकर न बोले और उनकी चाल, बोल, चेष्टाकी नक़ल न करे ।
जहाँ गुरुनिन्दा होती हो वहाँ शिष्य अपने दोनों कानों को बंद
करलेवे या वहां से अलग चला जाय । गुरुनिन्दा सच्ची या झूठी
करने से, मर कर गधा और कुत्ता होता है । गुरुधन भोगनेवाला
कृमि और कुचाल करनेवाला कीट होता है ॥ १९६—२०१ ॥
दूरस्थो नार्चयेदेनं न क्रुद्धो नान्तिके स्त्रियाः ।
यानासनस्थश्चैवैनमवरुह्याभिवादयेत् ॥ २०२ ॥

५८ । मनुस्मृति ।
प्रतिवातेऽनुवाते च नासीत गुरुणा सह ।
असंश्चवे चैव गुरोर्न किंचिदपि कीर्तयेत् ॥ २०३ ॥
शिष्य खुद दूर रहकर, दूसरे के द्वारा गुरुपूजा न करे। पूजा
में क्रोध न करे, गुरु अपनी स्त्री के पास हों तब पूजा न करे ।
अगर आसन या गाड़ी में बैठा हो तो उतर कर गुरु को प्रणाम
करे। गुरु के तरफ, शिष्य के तरफ से वायु लगता हो या शिष्य
के गुरु के तरफ से वायु लगता हो तो शिष्य गुरुसम्मुख में न
बैठे। और गुरु.न सुन सकें तो कुछ न कहना चाहिए ॥ २०२-२०३॥
गोऽश्वोष्ट्रयानप्रासादप्रस्तरेषु कटेषु च ।
आसीत गुरुणा सार्धं शिलाफलकनौषु च ॥ २०४ ॥
गुरोर्गुरौ सन्निहिते गुरुवद्वृत्तिमाचरेत् ।
न चानिसृष्टो गुरुणा स्वान्गुरूनाभिवादयेत् ॥ २०५ ॥
विद्यागुरुष्वेतदेव नित्या वृत्तिः स्वयोनिषु ।
प्रतिषेधत्सु चाधर्मान् हितं चोपदिशत्स्वपि ॥ २०६ ॥
श्रेयःसु गुरुवद्वृत्तिं नित्यमेव समाचरेत् ।
गुरुपुत्रेषु चार्येषु गुरोश्चैव स्वबन्धुषु ॥ २०७ ॥
बालः समानजन्मा वा शिष्यो वा यज्ञकर्मणि ।
अध्यापयन् गुरुसुतो गुरुवन्मानमर्हति ॥ २०८ ॥
बैल, घोड़ा, ऊंट की सवारी में, मकान की छत, चटाई, शिला.
पाटा और नाव पर गुरु के साथ बैठने का निषेध नहीं है। गुरु
का गुरु समीप आवे तो गुरु के माफिक बर्ताव करे । गुरु की
आज्ञा बिना अपने माता, पिता आदि को भी प्रणाम न करे ।
विद्या गुरु पिता आदि, अधर्म से बचानेवाला और हितैषी इन
से गुरु समान बर्ताव करे। विद्या, तप से श्रेष्ठ, अपने से बड़ा
सदाचारी, गुरुपुत्र और गुरुसम्बन्धी इनसे भी गुरु के समान
व्यवहार करे। गुरुपुत्र, अपने से छोटा, या समान अवस्था का

दूसरा अध्याय । ५६

दूसरा अध्याय । ५६
या यज्ञकर्म में शिष्य हो तो भी वेद का अध्यापक होने से गुरु-
तुल्य मान्य होता है ॥ २०४-२०८ ॥
उत्सादनं च गात्राणां स्नापनोच्छिष्टभोजने ।
न कुर्याद्गुरुपुत्रस्य पादयोश्चावनेजनम् ॥ २०६ ॥
गुरुवत्प्रतिपूज्याः स्युः सवर्णा गुरुयोषितः ।
असवर्णास्तु संपूज्याः प्रत्युत्थानाभिवादनैः ॥ २१० ॥
अभ्यञ्जनं स्नापनं च गात्रोत्सादनमेव च ।
गुरुपत्न्या न कार्याणि केशानां च प्रसाधनम् ॥ २११ ॥
गुरु के समान गुरुपुत्र के तैल मलना, स्नान कराना, पैर
दबाना और झूठा खाना इतना काम न करना चाहिए। गुरु की
स्त्री सजातीय हो तो गुरुसमान पूज्य है, नहीं तो उसको उठकर
प्रणाम करले-यही सेवा है। तैल मलना, स्नान कराना, शरीर
दाबना, फूलों से बाल गूंथना, ये काम गुरुस्त्री के न करना
चाहिए ॥ २०६-२११ ॥
गुरुपत्नी तु युवतिर्नाभिवाद्येह पादयोः ।
पूर्णविंशतिवर्षेण गुणदोषौ विजानता ॥ २१२ ॥
स्वभाव एष नारीणां नराणामिह दूषणम् ।
अतोऽर्थान्न प्रमाद्यन्ति प्रमदासु विपश्चितः ॥ २१३ ॥
अविद्वांसमलं लोके विद्वांसमपि वा पुनः ।
प्रमदा ह्युत्पथं नेतुं कामक्रोधवशानुगम् ॥ २१४ ॥
मात्रा स्वस्रा दुहित्रा वा न विविक्तासनो भवेत् ।
बलवानिन्द्रियग्रामो विद्वांसमपि कर्षति ॥ २१५ ॥
कामं तु गुरुपत्नीनां युवतीनां युवा भुवि ।
विधिवद्वन्दनं कुर्यादसावहमिति ब्रुवन् ॥ २१६ ॥

६० मनुस्मृति ।
पूरे बीस साल का जवान और भला बुरा जाननेवाला शिष्य
जवान गुरुस्त्री के पैर छूकर प्रणाम न करे, दूर से सदा करे। यह
स्त्रियों का स्वभाव होता है कि पुरुषों को दोष लगा देना, इस
लिए बुद्धिमान् स्त्रियों से सदा सावधान रहते हैं। संसार में
पुरुष पण्डित हो या मूर्ख, उसको काम, क्रोध के वश कुमार्ग में
लेजाने को स्त्रियां बड़ी समर्थ होती हैं। माता, बहन वा लड़की
के साथ भी एकान्त में न बैठे, क्योंकि इन्द्रियां ऐसी प्रबल हैं कि
विद्वान् के मनको भी खींच लेती हैं। यदि इच्छा हो तो युवा
शिष्य युवती गुरुपत्नी को 'मैं अमुक हूं' कहकर दूर से प्रणाम
करलेवे ॥ २१२–२१६ ॥
विप्रोष्य पादग्रहणमन्वहं चाभिवादनम् ।
गुरुदारेषु कुर्वीत सतां धर्ममनुस्मरन् ॥ २१७ ॥
यथा खनन्खनित्रेण नरो वार्यधिगच्छति ।
तथा गुरुगतां विद्यां शुश्रूषुरधिगच्छति ॥ २१८ ॥
मुण्डो वा जटिलो वा स्यादथवा स्याच्छिखाजटः ।
नैनं ग्रामेऽभिनिम्लोचेत् सूर्यो नाभ्युदयात्क्वचित् ॥ २१६ ॥
विदेश से आने पर पैर छूकर और रोज़ दूर से, गुरुस्त्री को
प्रणाम करना चाहिए। यही शिष्यों का आचार है। जैसे पुरुष
कुदाल-फावड़े से भूमि खोदता हुआ जल पाता है वैसे सेवा से
गुरुविद्या को पाता है। ब्रह्मचारी, मुण्डित या शिखावाला, या
जटाधारी हो उसको गाँव के भीतर सूर्योदय और सूर्यास्त न
होना चाहिए। अर्थात् दोनों काल में गाँव के बाहर सन्ध्या-गायत्री
की उपासना में रहना चाहिए ॥ २१७–२१६ ॥
तं चेदभ्युदियात्सूर्यः शयानं कामचारतः ।
निम्लोचेद्वाप्यविज्ञानाज्जपन्नुपवसेद्दिनम् ॥ २२० ॥
सूर्येण ह्यभिनिर्मुक्तः शयानोऽभ्युदितश्च यः।
प्रायश्चित्तमकुर्वाणो युक्तः स्यान्महतेनसा ॥ २२१ ॥

दूसरा अध्याय । ६१

दूसरा अध्याय । ६१
आचम्य प्रयतो नित्यमुभे सन्ध्ये समाहितः ।
शुचौ देशे जपञ्जप्यमुपासीत यथाविधि ॥ २२२ ॥
यदि स्त्री यद्यवरजः श्रेयः किंचित्समाचरेत् ।
तत्सर्वमाचरेद्युक्तो यत्र वास्य रमेन्मनः ॥ २२३ ॥
यदि ब्रह्मचारी, इच्छा से सोता रहे और सूर्योदय होजाय या
नगर में ही बिना जाने सूर्यास्त होजाय, तो एक दिन उपवास
और गायत्रीजप करे । यदि सोते हुए को सूर्योदय और सूर्यास्त
होजाय और उसका प्रायश्चित्त न करे तो उसको महापातक
लगता है । रोज़ दोनों सन्ध्या में एकाग्रमन होकर पवित्र स्थान
में गायत्रीजप करे । यदि किसी धर्म का स्त्री या शूद्र आचरण
करता हो और उसमें मन लगे तो उसीका पालन करे । या जिस
में अपना चित्त प्रसन्न हो वही करे ॥ २२०-२२३ ॥
धर्मार्थावुच्यते श्रेयः कामार्थौ धर्म एव च ।
अर्थ एवेह वा श्रेयस्त्रिवर्ग इति तु स्थितिः ॥ २२४ ॥
आचार्यो ब्रह्मणो मूर्तिः पिता मूर्तिः प्रजापतेः ।
माता पृथिव्या मूर्तिस्तु भ्राता स्वो मूर्तिरात्मनः ॥ २२५॥
आचार्यश्च पिता चैव माता भ्राता च पूर्वजः ।
नार्तेनाप्यवमन्तव्या ब्राह्मणेन विशेषतः॥ २२६ ॥
यं मातापितरौ क्लेशं सहेते सम्भवे नृणाम् ।
न तस्य निष्कृतिः शक्या कर्तुं वर्षशतैरपि ॥ २२७ ॥
कोई अर्थ और धर्म को, कोई काम, अर्थ को, कोई अर्थ को,
कोई धर्म को ही अच्छा मानते हैं। पर धर्म, अर्थ और काम इन
तीनों का आचरण करने से भला होता है-यह धर्मशास्त्र की आज्ञा
है। आचार्य ब्रह्मा की मूर्ति, पिता प्रजापति की मूर्ति, माता पृ-
थिवी की मूर्ति और बड़ा भाई अपनी ही मूर्ति है। इनसे दुःखी
होने पर भी इनका अपमान न करे और ब्राह्मण को तो कभी भ

६२ मनुस्मृति ।
करना चाहिए । मनुष्यों की उत्पत्ति और पालन आदि में; माता,
पिता जो दुःख सहते हैं उसका बदला सैकड़ों वर्ष सेवा से भी
नहीं हो सकता ॥ २२४—२२७ ॥
तयोर्नित्यं प्रियं कुर्यादाचार्यस्य च सर्वदा ।
तेष्वेव त्रिषु तुष्टेषु तपः सर्वं समाप्यते ॥ २२८ ॥
तेषां त्रयाणां शुश्रूषा परमं तप उच्यते ।
न तैरभ्यननुज्ञातो धर्ममन्यं समाचरेत् ॥ २२६ ॥
त एव हि त्रयो लोकास्त एव त्रय आश्रमाः ।
त एव हि त्रयो वेदास्त एवोक्तास्त्रयोऽग्नयः ॥ २३० ॥
पिता वै गार्हपत्योऽग्निर्माताग्निर्दक्षिणः स्मृतः ।
गुरुराहवनीयस्तु साग्नित्रेता गरीयसी ॥ २३१ ॥
त्रिष्वप्रमाद्यन्नेतेषु त्रीँल्लोकान् विजयेद्गृही ।
दीप्यमानः स्ववपुषा देववद्दिवि मोदते ॥ २३२ ॥
इमं लोकं मातृभक्त्या पितृभक्त्या तु मध्यमम् ।
गुरुशुश्रूषया त्वेव ब्रह्मलोकं समश्नुते ॥ २३३ ॥
सर्वे तस्यादृता धर्मा यस्यैते त्रय आदृताः ।
अनादृतास्तु यस्यैते सर्वास्तस्याफलाः क्रियाः॥२३४ ॥
यावत्त्रयस्ते जीवेयुस्तावन्नान्यं समाचरेत् ।
तेष्वेव नित्यं शुश्रूषां कुर्यात् प्रियहिते रतः ॥ २३५ ॥
इसलिए सदा माता, पिता और आचार्य का प्रिय कार्य करे ।
इन तीनों के सन्तुष्ट होने से सब तप पूरे हो जाते हैं। इन तीनों
की सेवा परम तप कहा जाता है। इनकी आज्ञा लेकर दूसरे धर्मों
का आचरण करना चाहिए । ये ही तीनों लोक, पृथ्वी, अन्तरिक्ष,
स्वर्ग हैं। तीनों आश्रम, तीनों वेद और तीनों अग्नि हैं। पिता
गार्हपत्याग्नि, माता दक्षिणाग्नि और गुरु आहवनीयाग्नि का

दूसरा अध्याय । ६३

दूसरा अध्याय । ६३
स्वरूप है, ये तीनों अग्नि संसार में बड़े हैं। इन तीनों की भक्ति-
सेवा से तीनों लोक गृहस्थ जीतता है। और स्वर्ग में देवताओं
की भांति सुख पाता है। मातृभक्ति से यह लोक, पितृभक्ति से
मध्यलोक और गुरुभक्ति से ब्रह्मलोक को पाता है। जिसने इन
तीनों का आदर किया उसने सब धर्मों का पालन किया—और
जिसने अनादर किया उसके सब धर्म-कर्म निष्फल हैं। जब तक ,
पिता, माता और गुरु जीवित रहें तब तक इनकी सेवा में विशेष
लगा रहे ॥ २२८—२३५ ॥
तेषामनुपरोधेन पारत्र्यं यद्यदाचरेत् ।
तत्तन्निवेदयेत्तेभ्यो मनोवचनकर्मभिः ॥ २३६ ॥
त्रिष्वेतेष्विति कृत्यं हि पुरुषस्य समाप्यते ।
एष धर्मः परः साक्षादुपधर्मोऽन्य उच्यते ॥ २३७ ॥
श्रद्दधानः शुभां विद्यामाददीतावरादपि ।
अन्त्यादपि परं धर्मं स्त्रीरत्नं दुष्कुलादपि ॥ २३८ ॥
विषादप्यमृतं ग्राह्यं बालादपि सुभाषितम् ।
अमित्रादपि सद्वृत्तममेध्यादपि काञ्चनम् ॥ २३६ ॥
स्त्रियो रत्नान्यथो विद्या धर्मः शौचं सुभाषितम् ।
विविधानि च शिल्पानि समादेयानि सर्वतः ॥२४०॥
इसके सिवा जो कर्म करे वह इनको निवेदन करदेवे। इन तीनों
की सेवा से, पुरुष के कर्तव्य पूरे पड़जाते हैं। यह मुख्य धर्म है
और गौणधर्म माना जाता है। श्रद्धामय पुरुष उत्तम विद्याओं को
हीनजाति से भी सीखे और चण्डाल से भी लोकमर्यादा सीखे
और हीनकुल से भी सुशील स्त्री का विवाह करे। विष से भी
अमृत और बालक से भी हित वचन ग्रहण करले। शत्रु से भी
सदाचार और अपवित्र में से भी सुवर्ण निकाल लेवे। स्त्री, रत्न
विद्या, धर्म, शौच, अच्छे वचन और भांति भांति की दस्तकारी
आदि सब से सीख लेवे ॥ २३६—२४० ॥

५४ मनुस्मृति ।
अब्राह्मणादध्ययनमापत्काले विधीयते ।
अनुव्रज्या च शुश्रूषा यावदध्ययनं गुरोः ॥ २४१ ॥
नाब्राह्मणे गुरौ शिष्यो वासमात्यन्तिकं वसेत् ।
ब्राह्मणे चाननूचाने काङ्क्षन् गतिमनुत्तमाम् ॥ २४२ ॥
यदि त्वात्यन्तिकं वासं रोचयेत गुरोः कुले ।
युक्तः परिचरेदेनमाशरीरविमोचनात् ॥ २४३ ॥
आपत्तिकाल में क्षत्रिय, वैश्य से भी अध्ययन का विधान है ।
पर ऐसे गुरु की सेवा अध्ययनकाल तक ही करनी चाहिए । जो
गुरु ब्राह्मण न हो या साङ्गवेद का ज्ञाता न हो तो मोक्षार्थी ब्रह्म-
चारी जीवनभर गुरुकुलवास न करे । यदि नैष्ठिक-ब्रह्मचारी जीवन
भर गुरुकुलवास चाहे तो देहान्त तक सावधानी से गुरुसेवा में
लगा रहे ॥ २४१—२४३ ॥
आसमाप्तेः शरीरस्य यस्तु शुश्रूषते गुरुम् ।
स गच्छत्यञ्जसा विप्रो ब्रह्मणः सद्म शाश्वतम् ॥ २४४ ॥
न पूर्वं गुरवे किञ्चिदुपकुर्वीत धर्मवित् ।
स्नास्यंस्तु गुरुणाज्ञप्तः शक्त्या गुर्वर्थमाहरेत् ॥ २४५ ॥
क्षेत्रं हिरण्यं गामश्वं छत्रोपानहमासनम् ।
धान्यं शाकं च वासांसि गुरवे प्रीतिमावहेत् ॥ २४६ ॥
जो ब्राह्मण देहान्त तक गुरु की शुश्रूषा करता है वह मोक्ष को
पाता है । धर्मज्ञ ब्रह्मचारी, अध्ययन के पहले दक्षिणा आदि से गुरु
का कुछ भी उपकार न करे । किन्तु समावर्तन के बाद, गुरु की
आज्ञा से शक्ति के अनुसार गुरुदक्षिणा देनी चाहिए । खेत, सोना,
गौ, घोड़ा, छतरी, जूता, आसन, अन्न, शाक और वस्त्र अर्पण
करके गुरुको प्रसन्न करे ॥ २४४—२४६ ॥

दूसरा अध्याय । ६५

दूसरा अध्याय । ६५
आचार्ये तु खलु प्रेते गुरुपुत्रे गुणान्विते ।
गुरुदारे सपिण्डे वा गुरुवद्वृत्तिमाचरेत् ॥ २४७ ॥
एतेष्वविद्यमानेषु स्नानासनविहारवान् ।
प्रयुञ्जानोऽग्निशुश्रूषां साधयेद्देहमात्मनः ॥ २४८ ॥
एवं चरति यो विप्रो ब्रह्मचर्यमविप्लुतः ।
स गच्छत्युत्तमं स्थानं न चेहाजायते पुनः ॥ २४६ ॥
इति मानवे धर्मशास्त्रे भृगुप्रोक्तायां संहितायां
द्वितीयोऽध्यायः ॥
गुरु के मरजाने पर, विद्वान् गुरुपुत्र, गुरुस्त्री और गुरु के सहो-
दर भाई आदि हों तो उनको गुरुसमान मानना चाहिये । और ये
मौजूद न हों तो, गुरुस्थान में उनके अग्नि की सेवा करे और उपा-
सना से निज देह को ब्रह्मलय के लायक किया करे । इस प्रकार जो
ब्राह्मण, अखण्ड ब्रह्मचर्य का पालन करता है वह परमात्मा में लय
को पाकर फिर इस लोक में जन्म नहीं पाता ॥ २४७-२४६ ॥
दूसरा अध्याय पूरा हुआ ।

तदर्धिकं पादिकं वा ग्रहणान्तिकमेव वा ॥ १ ॥

अथ तृतीयोऽध्यायः ।
षट्त्रिंशदाब्दिकं चर्यं गुरौ त्रैवेदिकं व्रतम् ।
तदर्धिकं पादिकं वा ग्रहणान्तिकमेव वा ॥ १ ॥
वेदानधीत्य वेदौ वा वेदं वापि यथाक्रमम् ।
अविप्लुतब्रह्मचर्यो गृहस्थाश्रममावसेत् ॥ २ ॥
तं प्रतीतं स्वधर्मेण ब्रह्मदायहरं पितुः ।
स्रग्विणं तल्प आसीनमर्हयेत्प्रथमं गवा ॥ ३ ॥
गुरुणानुमतः स्नात्वा समावृत्तो यथाविधि ।
उद्वहेत द्विजो भार्या सवर्णा लक्षणान्विताम् ॥ ४ ॥
असपिण्डा च या मातुरसगोत्रा च या पितुः ।
सा प्रशस्ता द्विजातीनां दारकर्मणि मैथुने ॥ ५ ॥
महान्त्यपि समृद्धानि गोजाविधनधान्यतः ।
स्त्रीसम्बन्धे दशैतानि कुलानि परिवर्जयेत् ॥ ६ ॥
हीनक्रियं निष्पुरुषं निश्छन्दो रोमशार्शनम् ।
क्षयामयाव्यपस्मारिश्वित्रिकुष्ठिकुलानि च ॥ ७ ॥
तीसरा अध्याय ।
गुरुकुल में तीनों वेद छत्तीस वर्ष या, अठारह वर्ष या, नव वर्ष
तक ब्रह्मचारी पढ़े या, जितने काल में होसके, उतने काल तक ही
पढ़े और ब्रह्मचर्य का पालन करे । क्रम से तीन, दो, वा एकही
वेद पढ़कर, ब्रह्मचर्य की रक्षा करके गृहस्थाश्रम में प्रवेश करे ।
उस वेदज्ञ ब्रह्मचारी को आसन पर बैठाकर, पिता वा आचार्य
पुष्पमालः पहनाकर मधुपर्कविधि से पूजा करे । फिर गुरु की

तीसरा अध्याय। ६७

तीसरा अध्याय। ६७
आज्ञा से, स्नान, समावर्तन करने के बाद, अपने वर्ण की शुभ-
लक्षणवाली कन्या से विवाह करे। जो माता की सपिण्ड-सात
पीढ़ी में न हो और पिता के गोत्र में न हो, ऐसी कन्या द्विजों के
लिये विवाह योग्य होती है। यदि गौ, बकरी, भेड़, धन और धान्य
से खूब धनी भी हो तौभी विवाहसम्बन्ध जातकर्मसंस्कार-रहित,
कन्यामात्र पैदा करनेवाला, वेदपाठनरहित, शरीर में बहुत बाल-
वाला, बवासीरवाला, क्षयरोगी, मन्दाग्नि, मृगी, श्वेतकुष्ठ, और
गलितकुष्ठ इन दश कुलों में न करना चाहिये ॥ १-७ ॥
नोद्वहेत्कपिलां कन्यां नाधिकाङ्गीं न रोगिणीम् ।
नालोमिकां नातिलोमां न वाचाटां न पिङ्गलाम् ॥ ८ ॥
नर्क्षवृक्षनदीनाम्नीं नान्त्यपर्वतनामिकाम् ।
न पक्ष्यहिप्रेष्यनाम्नीं न च भीषणनामिकाम् ॥ ६ ॥
अव्यङ्गाङ्गीं सौम्यनाम्नीं हंसवारणगामिनीम् ।
तनुलोमकेशदशनां मृद्वङ्गीमुद्वहेत्स्त्रियम् ॥ १० ॥
यस्यास्तु न भवेद् भ्राता न विज्ञायेत वा पिता ।
नोपयच्छेत तां प्राज्ञः पुत्रिकाधर्मशङ्कया ॥ ११ ॥
विवाह-नियम ।
जिसके देह में लाल बाल हों, अधिक अङ्गवाली, रोगी, बिना
बालवाली, अधिक बालवाली, ज्यादा बोलनेवाली और पीली
आँखोंवाली कन्या से विवाह न करे। नक्षत्र, वृक्ष, नदी, म्लेच्छ,
पर्वत, पक्षी, साँप और शूद्र नामवाली और भयदायक नामवाली
के साथ विवाह न करे। सुन्दर अङ्गवाली, सुन्दर नामवाली,
हंस और हाथी के समान चालवाली, पतले रोम, बाल और दांत-
वाली, कोमल शरीरवाली कन्या के साथ विवाह करना चाहिये।
जिसका भाई न हो, जिसके पिता का पता मालूम न हो, ऐसी
कन्या के साथ 'पुत्रिकाधर्म' से डरकर विवाह न करना
चाहिये ॥ ८-११ ॥

६८ मनुस्मृति ।
सवर्णाग्रे द्विजातीनां प्रशस्ता दारकर्मणि ।
कामतस्तु प्रवृत्तानामिमाः स्युः क्रमशॊ वराः ॥ १२ ॥
शूद्रैव भार्या शूद्रस्य सा च स्वा च विशः स्मृते ।
ते च स्वा चैव राज्ञश्च ताश्च स्वा चाग्रजन्मनः ॥ १३ ॥
न ब्राह्मणक्षत्रिययोरापद्यपि हि तिष्ठतोः ।
कस्मिंश्चिदपि वृत्तान्ते शूद्रा भार्योपदिश्यते ॥ १४ ॥
हीनजातिस्त्रियं मोहादुद्वहन्तो द्विजातयः ।
कुलान्येव नयन्त्याशु ससन्तानानि शूद्रताम् ॥ १५ ॥
ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य को अपने वर्ण की कन्या से विवाह
श्रेष्ठ है। पर कामवश होकर जो विवाह होता है वह अधम विवाह
है । शूद्र पुरुष शूद्र कन्या के साथ, वैश्य-वैश्य और शूद्र कन्या के
साथ, क्षत्रिय-क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र कन्या के साथ, ब्राह्मण-
ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र कन्या के साथ विवाह कर सकता
है-यह अधम विवाह है । ब्राह्मण और क्षत्रिय को, आपत्तिकाल
में भी शूद्र कन्या से विवाह न करना चाहिये । जो द्विजाति मोह-
वश हीनजाति की कन्या से विवाह करता है वह अपने कुल और
परिवार कोही शूद्र करदेता है ॥ १२-१५ ॥
शूद्रावेदी पतत्यत्रेरुतथ्यतनयस्य च ।
शौनकस्य सुतोत्पत्त्या तदपत्यतया भृगोः ॥ १६ ॥
शूद्रां शयनमारोप्य ब्राह्मणो यात्यधोगतिम् ।
जनयित्वा सुतं तस्यां ब्राह्मण्यादेव हीयते ॥ १७ ॥
दैवपित्र्यातिथेयानि तत्प्रधानानि यस्य तु ।
नाश्नन्ति पितृदेवास्तन्न च स्वर्गं स गच्छति ॥ १८ ॥
शूद्र कन्या के साथ विवाह करनेवाला ब्राह्मण पतित होजाता
है । यह अत्रि और उतथ्य के पुत्र गौतमऋषि का मत है । शौनक

तीसरा अध्याय । ६६

तीसरा अध्याय । ६६
ऋषि के मत से क्षत्रिय, शूद्रकन्या में सन्तान पैदा करने से पतित
होता है। और भृगुऋषि के मत से, शूद्रकन्या से विवाह करनेवाले
वैश्य के पौत्र होजाने पर वह पतित होता है। ब्राह्मण, शूद्र स्त्री के
संयोग से पतित होता है और उससे सन्तान पैदा करने से
ब्राह्मणत्व से हीन होजाता है। शूद्रास्त्री की प्रधानता में देव,
पितर श्राद्ध में अन्न का ग्रहण नहीं करते। और वह पुरुष स्वर्गगामी
नहीं होता ॥ १६-१८ ॥
वृषलीफेनपीतस्य निःश्वासोपहतस्य च।
तस्यां चैव प्रसूतस्य निष्कृतिर्न विधीयते ॥ १९ ॥
चतुर्णामपि वर्णानां प्रेत्य चेह हिताहितान् ।
अष्टाविमान् समासेन स्त्रीविवाहान्निबोधत ॥ २० ॥
ब्राह्मो दैवतथैवार्षः प्राजापत्यस्तथासुरः ।
गान्धर्वो राक्षसश्चैव पैशाचश्चाष्टमोऽधमः ॥ २१ ॥
यो यस्य धर्म्यो वर्णस्य गुणदोषौ च यस्य यौ ।
तत् सर्वं प्रवक्ष्यामि प्रसवे च गुणागुणान् ॥ २२ ॥
शूद्रा का अधर चुम्बन से और उसकी सांस लगने से, उस
पुरुष की और उसके सन्तान की पापशुद्धि का कोई उपाय नहीं
है। चारों वर्णों का लोक और परलोक में हित अहित करनेवाला,
आठ प्रकार का विवाह होता है-ब्राह्म, दैव, आर्ष, प्राजापत्य,
आसुर, गान्धर्व, राक्षस और पैशाच। जिस वर्णका जो विवाह
धर्मानुकूल है और जो गुण, दोष जिसमें है और उनसे पैदा सन्तानों
में जो हैं, उनको कहता हूं ॥ १६-२२ ॥
षडानुपूर्व्या विप्रस्य क्षत्रस्य चतुरोऽवरान् ।
विट्शूद्रयोस्तु तानेव विद्याद्धर्म्यान राक्षसान् ॥ २३ ॥
चतुरो ब्राह्मणस्याद्यान् प्रशस्तान् कवयो विदुः ।
राक्षसं क्षत्रियस्यैकमासुरं वैश्यशूद्रयोः ॥ २४ ॥

७० मनुस्मृति ।
पञ्चानां तु त्रयो धर्म्या द्वावधर्म्यौ स्मृताविह ।
पैशाचश्चासुरश्चैव न कर्तव्यौ कदाचन ॥ २५ ॥
पृथक् पृथग्वा मिश्रौ वा विवाहौ पूर्वचोदितौ ।
गान्धर्वो राक्षसश्चैव धर्म्यौ क्षत्रस्य तौ स्मृतौ ॥ २६ ॥
ब्राह्मण को क्रम से पहले के छः विवाह धर्म हैं अन्त के चार
क्षत्रिय वैश्य और शूद्र को धर्म हैं पर राक्षस विवाह किसी के लिए
अच्छा नहीं है। ब्राह्मण के लिए पहले चार विवाह श्रेष्ठ हैं। क्षत्रिय
के लिए एक राक्षस, वैश्य और शूद्र के लिए आसुर विवाह श्रेष्ठ
माना गया है। पांच विवाहों में तीन-प्रजापत्य, गान्धर्व और
राक्षस, धर्म कहा है। और दो-पैशाच और आसुर अधर्म हैं।
इस लिए इन दोनों को न करना चाहिए । पहले कहे विवाह
अलग अलग या मिले हुए गान्धर्व और राक्षस क्षत्रियों के धर्म-
सम्बन्धी हैं ॥ २३-२६ ॥
आच्छाद्य चार्चयित्वा च श्रुतिशीलवते स्वयम् ।
आहूय दानं कन्याया ब्राह्मो धर्मः प्रकीर्तितः ॥ २७ ॥
यज्ञे तु वितते सम्यगृत्विजे कर्म कुर्वते ।
अलङ्कृत्य सुतादानं दैवं धर्मं प्रचक्षते ॥ २८ ॥
एकं गोमिथुनं द्वे वा वरादादाय धर्मतः ।
कन्याप्रदानं विधिवदार्षो धर्मः स उच्यते ॥ २९ ॥
वेदज्ञ और सुशील वर को बुलाकर उसका पूजन सत्कार करके
कन्यादान को ब्राह्म विवाह कहते हैं। बड़े यज्ञ में ऋत्विक् ब्राह्मण
को, वस्त्र-आभूषण से सुशोभित कन्या का दान 'दैव विवाह'
कहाजाता है। एक एक या दो दो गौ, बैल यज्ञ के लिए, वर से
लेकर, जो कन्यादान होता है उसको आर्षविवाह कहते हैं ॥२७-२९॥
सहैव चरतां धर्ममिति वाचाऽनुभाष्य च ।
कन्याप्रदानमभ्यर्च्य प्राजापत्यो विधिः स्मृतः ॥३०॥

तीसरा अध्याय । ७१

तीसरा अध्याय । ७१
ज्ञातिभ्यो द्रविणं दत्त्वा कन्यायै चैव शक्तितः ।
कन्याप्रदानं स्वाच्छन्द्यादासुरो धर्म उच्यते ॥ ३१ ॥
इच्छयान्योन्यसंयोगः कन्यायाश्च वरस्य च ।
गान्धर्वः स तु विज्ञेयो मैथुन्यः कामसम्भवः ॥ ३२ ॥
हत्वा छित्त्वा च भित्त्वा च क्रोशन्तीं रुदतीं गृहात् ।
प्रसह्य कन्याहरणं राक्षसो विधिरुच्यते ॥ ३३ ॥
सुप्तां मत्तां प्रमत्तां वा रहो यत्रोपगच्छति ।
स पापिष्ठो विवाहानां पैशाचश्चाष्टमोऽधमः ॥ ३४ ॥
'तुम दोनों साथ धर्माचरण करो' ऐसा कहकर वर कन्या का
पूजन करके जो कन्यादान होता है उसको 'प्राजापत्य विवाह'
कहते हैं। वर के माता पिता और कन्या को यथाशक्ति धन देकर
जो इच्छापूर्वक कन्यादान है उसको 'आसुर विवाह' कहते हैं।
कन्या और वर की इच्छा से जो संयोग होता है उसको गान्धर्व
विवाह कहते हैं, यह कामवश भोगमात्र के लिए है, धर्मार्थ नहीं
है। मारकर, दुःख देकर, रोती हुई कन्या को ज़बरदस्ती हरलेजाना,
'राक्षस विवाह' कहलाता है। सोती, नशे में और बेसुध कन्या
के साथ एकान्त में संभोग करना 'पैशाच विवाह' होता है। यह
महाअधम और पापपूर्ण विवाह है ॥ ३०-३४ ॥
अद्भिरेव द्विजाग्र्याणां कन्यादानं विशिष्यते ।
इतरेषां तु वर्णानामितरेतरकाम्यया ॥ ३५ ॥
यो यस्यैषां विवाहानां मनुना कथितो गुणः ।
सर्वं शृणुत तं विप्राः सम्यक् कीर्तयतो मम ॥ ३६ ॥
वर के हाथ में जल देकर कन्यादान ब्राह्मणों के लिए उत्तम पक्ष
है। दूसरे वर्णों में इच्छानुसार विनाजल, वचनमात्र से ही विवाह
होजाता है। भृगु ने ब्राह्मणों से कहा-इन सब विवाहों में जिसका
जो गुण मनु ने कहा है वह आप लोग सुनिए ॥ ३५-३६ ॥

७२ · मनुस्मृति । ·
दश पूर्वान्परान्वंश्यानात्मानं चैकविंशकम् ।
ब्राह्मीपुत्रः सुकृतकृन्मोचयेदेनसः पितॄन् ॥ ३७ ॥
दैवोढाजः सुतश्चैव सप्त सप्त परावरान् ।
आर्षोढाजः सुतस्त्रींस्त्रीन् षट्षट् कायोढजः सुतः ॥३८॥
ब्राह्मादिषु विवाहेषु चतुर्ष्वेवानुपूर्वशः ।
ब्रह्मवर्चस्विनः पुत्रा जायन्ते शिष्टसंमताः ॥ ३६ ॥
ब्राह्म विवाह से पैदा हुआ पुत्र सुकर्म करे तो अपने पिता-
पितामह आदि दश पूर्वपुरुषों को और पुत्र-पौत्र आदि दश आगे
के वंशजों को और इक्कीसवें अपनी आत्मा को पाप से मुक्त
करता है। दैव विवाह का पुत्र सात पीढ़ी पहली और सात आगे
की, आर्ष विवाह का तीन पीढ़ी पहली और तीन आगे की, और
प्राजापत्य का छः पीढ़ी पहली और छः आगे की-और अपने को
तारता है। क्रम से ब्राह्म आदि चार विवाहों से जो सन्तान होती
है वह तेजस्वी और शिष्ट पुरुषों में मान्य होती है ॥ ३७-३६ ॥
रूपसत्त्वगुणोपेता धनवन्तो यशस्विनः ।
पर्याप्तभोगा धर्मिष्ठा जीवन्ति च शतं समाः॥ ४० ॥
इतरेषु तु शिष्टेषु नृशंसाऽनृतवादिनः ।
जायन्ते दुर्विवाहेषु ब्रह्मधर्मद्विषः सुताः ॥ ४१ ॥
अनिन्दितैः स्त्रीविवाहैरनिन्द्या भवति प्रजा ।
निन्दितैर्निन्दिता नॄणां तस्मान्निन्द्यान्विवर्जयेत्॥४२॥
पाणिग्रहणसंस्कारः सवर्णासूपदिश्यते ।
असवर्णास्वयं ज्ञेयो विधिरुद्वाहककर्मणि ॥ ४३ ॥
ब्राह्म आदि विवाहों से पैदा हुए पुत्र, सुरूप, सत्त्वगुणी, धनवान्,
यशस्वी, भोगी, धार्मिक होते हैं और सौ वर्ष जीते हैं। और दूषित
विवाहों से पैदा हुए, कुकर्मी, झूठे और धर्मनिन्दक होते हैं। अच्छे

तीसरा अध्याय । ७३

तीसरा अध्याय । ७३
विवाहों से अच्छी और बुरे से बुरी सन्तान पैदा होती हैं। इसलिए
निन्दित विवाहों को न करना चाहिए। विवाह-संस्कार अपने
वर्ण-जाति की कन्या के साथ करना उत्तम है और दूसरे वर्ण की
कन्या के साथ विवाहविधि इसप्रकार जाननी चाहिए ॥४०-४३॥
शरः क्षत्रियया ग्राह्यः प्रतोदो वैश्यकन्यया ।
वसनस्य दशा ग्राह्या शूद्रयोत्कृष्टवेदने ॥ ४४ ॥
ऋतुकालाभिगामी स्यात्स्वदारनिरतः सदा ।
पर्ववर्जं व्रजेच्चैनां तद्व्रतो रतिकाम्यया ॥ ४५ ॥
ऋतुः स्वाभाविकः स्त्रीणां रात्रयः षोडशः स्मृताः ।
चतुर्भिरितरैः सार्धमहोभिः सद्भिर्गर्हितैः ॥ ४६ ॥
तासामाद्याश्चतस्रस्तु निन्दितेकादशी च या ।
त्रयोदशी च शेषास्तु प्रशस्ता दशरात्रयः ॥ ४७ ॥
युग्मासु पुत्रा जायन्ते स्त्रियोऽयुग्मासु रात्रिषु ।
तस्माद्युग्मासु पुत्रार्थी संविशेदार्तवे स्त्रियम् ॥ ४८ ॥
ब्राह्मण के साथ क्षत्रिय कन्या का विवाह हो तो वर का हाथ
न पकड़ कर उसके हाथ का बाण पकड़े। वैश्य की कन्या प्रतोद-
पशु हांकने का दण्डा, को और शूद्र कन्या पहने वस्त्र का किनारा
पकड़ लेवे। ऋतुकाल में अपनी स्त्री से संभोग करे और अमा-
वास्या आदि पांच पर्व दिनों को छोड़ देवे। स्त्रियों की स्वाभाविक
ऋतुरात्रि सोलह हैं। उन में शुरू के चार दिन निन्दित हैं। उन
सोलह रात्रियों में शुरू की चार रात्रि, ग्यारहवीं और तेरहवीं भोग
के लिए निन्दित हैं बाकी दशरात्रि अच्छी हैं। युग्म-सम-छठी,
आठवीं—दशवीं आदि रात्रि में भोग करने से पुत्र और अयुग्म-
पांचवीं, सातवीं-नवीँ रात्रि में कन्या उत्पन्न होती है। इसलिए
पुत्र की इच्छा से युग्म रात्रि में भोग करना चाहिए ॥ ४४-४८ ॥
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