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मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

पृष्ठ 206, कुल 649 में से

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पृष्ठ 206

अथ तृतीयोऽध्यायः ।
षट्त्रिंशदाब्दिकं चर्यं गुरौ त्रैवेदिकं व्रतम् ।
तदर्धिकं पादिकं वा ग्रहणान्तिकमेव वा ॥ १ ॥
वेदानधीत्य वेदौ वा वेदं वापि यथाक्रमम् ।
अविप्लुतब्रह्मचर्यो गृहस्थाश्रममावसेत् ॥ २ ॥
तं प्रतीतं स्वधर्मेण ब्रह्मदायहरं पितुः ।
स्रग्विणं तल्प आसीनमर्हयेत्प्रथमं गवा ॥ ३ ॥
गुरुणानुमतः स्नात्वा समावृत्तो यथाविधि ।
उद्वहेत द्विजो भार्या सवर्णा लक्षणान्विताम् ॥ ४ ॥
असपिण्डा च या मातुरसगोत्रा च या पितुः ।
सा प्रशस्ता द्विजातीनां दारकर्मणि मैथुने ॥ ५ ॥
महान्त्यपि समृद्धानि गोजाविधनधान्यतः ।
स्त्रीसम्बन्धे दशैतानि कुलानि परिवर्जयेत् ॥ ६ ॥
हीनक्रियं निष्पुरुषं निश्छन्दो रोमशार्शनम् ।
क्षयामयाव्यपस्मारिश्वित्रिकुष्ठिकुलानि च ॥ ७ ॥
तीसरा अध्याय ।
गुरुकुल में तीनों वेद छत्तीस वर्ष या, अठारह वर्ष या, नव वर्ष
तक ब्रह्मचारी पढ़े या, जितने काल में होसके, उतने काल तक ही
पढ़े और ब्रह्मचर्य का पालन करे । क्रम से तीन, दो, वा एकही
वेद पढ़कर, ब्रह्मचर्य की रक्षा करके गृहस्थाश्रम में प्रवेश करे ।
उस वेदज्ञ ब्रह्मचारी को आसन पर बैठाकर, पिता वा आचार्य
पुष्पमालः पहनाकर मधुपर्कविधि से पूजा करे । फिर गुरु की