मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंदूसरा अध्याय । ६५
आचार्ये तु खलु प्रेते गुरुपुत्रे गुणान्विते ।
गुरुदारे सपिण्डे वा गुरुवद्वृत्तिमाचरेत् ॥ २४७ ॥
एतेष्वविद्यमानेषु स्नानासनविहारवान् ।
प्रयुञ्जानोऽग्निशुश्रूषां साधयेद्देहमात्मनः ॥ २४८ ॥
एवं चरति यो विप्रो ब्रह्मचर्यमविप्लुतः ।
स गच्छत्युत्तमं स्थानं न चेहाजायते पुनः ॥ २४६ ॥
इति मानवे धर्मशास्त्रे भृगुप्रोक्तायां संहितायां
द्वितीयोऽध्यायः ॥
गुरु के मरजाने पर, विद्वान् गुरुपुत्र, गुरुस्त्री और गुरु के सहो-
दर भाई आदि हों तो उनको गुरुसमान मानना चाहिये । और ये
मौजूद न हों तो, गुरुस्थान में उनके अग्नि की सेवा करे और उपा-
सना से निज देह को ब्रह्मलय के लायक किया करे । इस प्रकार जो
ब्राह्मण, अखण्ड ब्रह्मचर्य का पालन करता है वह परमात्मा में लय
को पाकर फिर इस लोक में जन्म नहीं पाता ॥ २४७-२४६ ॥
दूसरा अध्याय पूरा हुआ ।