मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)
Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation
महर्षि मनु द्वारा
स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)
पृष्ठ 210, कुल 649 में से
संदर्भ में पढ़ें७० मनुस्मृति ।
पञ्चानां तु त्रयो धर्म्या द्वावधर्म्यौ स्मृताविह ।
पैशाचश्चासुरश्चैव न कर्तव्यौ कदाचन ॥ २५ ॥
पृथक् पृथग्वा मिश्रौ वा विवाहौ पूर्वचोदितौ ।
गान्धर्वो राक्षसश्चैव धर्म्यौ क्षत्रस्य तौ स्मृतौ ॥ २६ ॥
ब्राह्मण को क्रम से पहले के छः विवाह धर्म हैं अन्त के चार
क्षत्रिय वैश्य और शूद्र को धर्म हैं पर राक्षस विवाह किसी के लिए
अच्छा नहीं है। ब्राह्मण के लिए पहले चार विवाह श्रेष्ठ हैं। क्षत्रिय
के लिए एक राक्षस, वैश्य और शूद्र के लिए आसुर विवाह श्रेष्ठ
माना गया है। पांच विवाहों में तीन-प्रजापत्य, गान्धर्व और
राक्षस, धर्म कहा है। और दो-पैशाच और आसुर अधर्म हैं।
इस लिए इन दोनों को न करना चाहिए । पहले कहे विवाह
अलग अलग या मिले हुए गान्धर्व और राक्षस क्षत्रियों के धर्म-
सम्बन्धी हैं ॥ २३-२६ ॥
आच्छाद्य चार्चयित्वा च श्रुतिशीलवते स्वयम् ।
आहूय दानं कन्याया ब्राह्मो धर्मः प्रकीर्तितः ॥ २७ ॥
यज्ञे तु वितते सम्यगृत्विजे कर्म कुर्वते ।
अलङ्कृत्य सुतादानं दैवं धर्मं प्रचक्षते ॥ २८ ॥
एकं गोमिथुनं द्वे वा वरादादाय धर्मतः ।
कन्याप्रदानं विधिवदार्षो धर्मः स उच्यते ॥ २९ ॥
वेदज्ञ और सुशील वर को बुलाकर उसका पूजन सत्कार करके
कन्यादान को ब्राह्म विवाह कहते हैं। बड़े यज्ञ में ऋत्विक् ब्राह्मण
को, वस्त्र-आभूषण से सुशोभित कन्या का दान 'दैव विवाह'
कहाजाता है। एक एक या दो दो गौ, बैल यज्ञ के लिए, वर से
लेकर, जो कन्यादान होता है उसको आर्षविवाह कहते हैं ॥२७-२९॥
सहैव चरतां धर्ममिति वाचाऽनुभाष्य च ।
कन्याप्रदानमभ्यर्च्य प्राजापत्यो विधिः स्मृतः ॥३०॥