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सर्वकोश
मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

मनुस्मृति (कुल्लूकभट्ट टीका व हिन्दी अनुवाद सहित)

Manusmriti with Kulluka Bhatta Tika & Hindi Translation

महर्षि मनु द्वारा

स्रोत: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished649 पृष्ठ

पृष्ठ 204, कुल 649 में से

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पृष्ठ 204

५४ मनुस्मृति ।
अब्राह्मणादध्ययनमापत्काले विधीयते ।
अनुव्रज्या च शुश्रूषा यावदध्ययनं गुरोः ॥ २४१ ॥
नाब्राह्मणे गुरौ शिष्यो वासमात्यन्तिकं वसेत् ।
ब्राह्मणे चाननूचाने काङ्क्षन् गतिमनुत्तमाम् ॥ २४२ ॥
यदि त्वात्यन्तिकं वासं रोचयेत गुरोः कुले ।
युक्तः परिचरेदेनमाशरीरविमोचनात् ॥ २४३ ॥
आपत्तिकाल में क्षत्रिय, वैश्य से भी अध्ययन का विधान है ।
पर ऐसे गुरु की सेवा अध्ययनकाल तक ही करनी चाहिए । जो
गुरु ब्राह्मण न हो या साङ्गवेद का ज्ञाता न हो तो मोक्षार्थी ब्रह्म-
चारी जीवनभर गुरुकुलवास न करे । यदि नैष्ठिक-ब्रह्मचारी जीवन
भर गुरुकुलवास चाहे तो देहान्त तक सावधानी से गुरुसेवा में
लगा रहे ॥ २४१—२४३ ॥
आसमाप्तेः शरीरस्य यस्तु शुश्रूषते गुरुम् ।
स गच्छत्यञ्जसा विप्रो ब्रह्मणः सद्म शाश्वतम् ॥ २४४ ॥
न पूर्वं गुरवे किञ्चिदुपकुर्वीत धर्मवित् ।
स्नास्यंस्तु गुरुणाज्ञप्तः शक्त्या गुर्वर्थमाहरेत् ॥ २४५ ॥
क्षेत्रं हिरण्यं गामश्वं छत्रोपानहमासनम् ।
धान्यं शाकं च वासांसि गुरवे प्रीतिमावहेत् ॥ २४६ ॥
जो ब्राह्मण देहान्त तक गुरु की शुश्रूषा करता है वह मोक्ष को
पाता है । धर्मज्ञ ब्रह्मचारी, अध्ययन के पहले दक्षिणा आदि से गुरु
का कुछ भी उपकार न करे । किन्तु समावर्तन के बाद, गुरु की
आज्ञा से शक्ति के अनुसार गुरुदक्षिणा देनी चाहिए । खेत, सोना,
गौ, घोड़ा, छतरी, जूता, आसन, अन्न, शाक और वस्त्र अर्पण
करके गुरुको प्रसन्न करे ॥ २४४—२४६ ॥