चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
प्रकार के उत्पत्तिस्थान—स्थावर और
( ४ )
[बायाँ स्तम्भ]
त्रयोदशोऽध्यायः (पृ० १५१-१७२)
स्नेहाध्यायः—अग्निवेश का प्रश्न
पुनर्वसु का प्रतिवचन। स्नेहों के दो
प्रकार के उत्पत्तिस्थान—स्थावर और
जंगम। सब तेलों में सर्वश्रेष्ठ तिल
तैल और स्नेहों में घृत। स्नेहों के गुण
स्नेहपान गुण—उससे हानियाँ। स्नेह
की २४ प्रकार की प्रविचारणाएं। स्नेह
की तीन मात्रा प्रधान, मध्यम, ह्रस्व।
कौनसा स्नेह किसके लिये हितकारी।
स्नेह के अयोग्य व्यक्ति। स्निग्ध, अस्नि-
ग्ध, अति स्निग्ध के लक्षण। स्नेहन
कालमें हिताहित। उपसंहार।
चतुर्दशोऽध्यायः (पृ० १७२-१८४)
स्वेदाध्यायः—स्वेदविधि। स्ने-
हन, स्वेदन के गुण—उपयोगिता—
उसके परिणाम। स्वेदन की अवधि—
अतिस्वेदन के लक्षण और उपचार।
स्वेदन देने योग्य व्यक्ति। स्वेद-योग्य
व्यक्ति। स्वेदन द्रव्य। नाड़ीस्वेद।
उपनाहविधि। संकरस्वेद। प्रस्तरस्वेद।
नाड़ीस्वेद। परिषेकस्वेद। अवगाहस्वेद
जेन्ताकस्वेद। अश्मघनस्वेदविधि। कर्षू-
स्वेद। कुटीस्वेदविधि। भूस्वेदविधि।
कुम्भीस्वेदविधि। कूपस्वेद। होलाक-
स्वेद। अग्निरहित स्वेद। स्वेदके दो
प्रकार, अग्निस्वेद, निरग्नि-इनके भेद।
उपसंहार।
पञ्चदशोऽध्यायः (पृ० १८४-१९५)
उपकल्पनीयः—चिकित्सा के पूर्व
उचित साधनों के संग्रह का प्रयोजन।
आयुर्वेद के ज्ञान-अज्ञान की तुलना-
[दायाँ स्तम्भ]
अग्निवेश-आत्रेय संवाद। संशोधन के
उपयोगी नाना प्रकार के उपकरणों का
संग्रह। स्नेहन, स्वेदन की विधि।
वमन के अयोग, सम्यकयोग और
अतियोग के विशेष लक्षण। उत्तर
उपचार-उपसंहार।
षोडशोऽध्यायः (पृ० १९५-२०८)
चिकित्साप्राभृतीयः—सद् वैद्य
और असद् वैद्य के प्रयोगों में भेद।
सम्यग् विरेचन के लक्षण। विरेचने के
अतियोग के लक्षण। संशोधन योग्य
व्यक्ति। संशोधन का फल। अतियोग
होने पर क्या करना चाहिये। धातुओं
की समता और विषमता पर विचार।
उपसंहार।
सप्तदशोऽध्यायः (पृ० २०८-२२५)
कियन्तःशिरसीयः—शिरोरोग,
हृदयरोग, वात आदि दोषों के संसर्गों
से उत्पन्न रोग, क्षय-और-पिड़का और
दोषों की गति के सम्बन्ध में अग्निवेश
का प्रश्न। गुरु आत्रेय पुनर्वसु का प्रति-
वचन। शिर में उत्पन्न होने वाले पांच
प्रकार के शिरोरोग। वातजन्य शिरो-
रोग के लक्षण। पित्तजन्य, कफजन्य
और त्रिदोषजन्य शिरोरोग के लक्षण।
पांच प्रकार के हृदय रोग। वातजन्य,
पित्तजन्य, कफजन्य, और त्रिदोषजन्य
हृदयशूल के लक्षण। कृमिजन्य हृद-
यरोग के लक्षण। वात आदि दोषों के
संसर्ग से उत्पन्न विकारों के ६२ भेद।
दोषों के उपद्रव। अठारह प्रकारके क्षय।
ओज का स्वरूप। क्षय के कारण।
विद्रधि, पिड़का । विद्रधि का निदान
( ५ )
मधुमेह के कारण । सात पिडकाएं ।
विद्रधि, पिड़का । विद्रधि का निदान
स्राव के लक्षण । साध्य-असाध्य विद्रधि
के लक्षण । भेद के दोष से उत्पन्न पिड़-
काएं-शराविका, कच्छपिका, जालिनी ।
सर्षपी, अलजी, विनता आदि-इनके
उपद्रव दोषों की तीन प्रकार की गति ।
तीन प्रकार की और गति, संचय, प्रकोप
और शमन-संचय के दो भेद-प्राकृत
और वैकृत । उपसंहार ।
अष्टादशोऽध्यायः (पृ० २२१-२३१)
त्रिशोथीयः—तीन प्रकार का
शोथ ( सूजन )-उसके पुनः दो प्रकार
निज और आगन्तु । आगन्तु शोथ का
निदान-चिकित्सा । निज शोथ के कारण
और सामान्य लक्षण । वातजन्य शोथ
के लक्षण । शोथ के दो, तीन, चार,
और सात प्रकार । वात, पित्त, कफ
और सन्निपात आदि से उत्पन्न शोथों
के लक्षण । कष्टसाध्य शोथ । शोथ के
उपद्रव । उपजिह्विका, गलगुण्डिका,
गलगण्ड, गलग्रह, विसर्प, पिड़का और
शंखक के लक्षण । गुल्म, प्लीहा, उदर,
आनाह, का लक्षण । रोहिणी रोग, ।
मृदु, दारुण भेद से साध्य-असाध्य रोग
के लक्षण । पीड़ा, वर्ण, समुत्थान,
कारण, स्थान, संस्थान नाम भेद आदि
के कारण रोग के असंख्य भेद । दोषों के
प्राकृत और विकृत के लक्षण । उपसंहार ।
ऊनविंशोऽध्यायः (पृ० २३१-२३७)
अष्टादरीतः—उदर रोग आदि
४८ प्रकार के रोगों की गणना और
उनके भेदों के नाम से निर्देश । आठ
प्रकार के उदर रोग । सात प्रकार के
कुष्ठ । छः प्रकार के अतीसार ।
पांच प्रकार के गुल्म । चार प्रकार का
अपस्मार । तीन प्रकार का शोथ । दो
प्रकार का ज्वर । दो प्रकार के व्रण-दो
आयाम—दो प्रकार की गृध्रसी—दो
प्रकार का कामला—दो प्रकारका आम
दो प्रकार का वातरक्त—एक प्रकार का
ऊरुस्तम्भ—एक प्रकार का संन्यास—
एक प्रकार का महागद । तीन प्रकार की
क्रिमि जातियां-बीस प्रकार के प्रमेह-
बीस प्रकार के योनिरोग । उपसंहार ।
विंशोऽध्यायः ( पृ० २३७-२४६ )
महारोगाः—चार प्रकार के रोग,
इनकी समानता, लिंग और आयतन
भेद से असंख्य रोग—उनका भेदक
कारण। दो प्रकार के विकार—सामान्य
और नानात्मज । अस्सी प्रकार के वात-
विकार । चालीस पित्तविकार । उनके
लक्षण । बीस कफजन्य रोग । उनके
लक्षण । उपसंहार ।
एकविंशोऽध्यायः (पृ० २४६-२५५)
अष्टौनिन्दित्तीयः—आठ निन्दित
पुरुष । विशेष रूप से निन्दित दो, अति-
स्थूल और अतिकृश स्थूल पुरुष के दोष,
कारण और लक्षण । अतिकृश के दोष,
कारण और लक्षण । आदर्श पुरुष । स्थूल
को कृश बनाने के लिये उपाय । कृश
रोग की चिकित्सा । निद्रा के उचित सेवन
से लाभ । दिन में सोने के योग्य व्यक्ति,
( ६ )
[बायाँ स्तम्भ]
उनको दिन में सोने से लाभ । दिन में
सोने का उचित काल-ग्रीष्म ऋतु-अन्य
ऋतुओं में दिन में सोने से हानियाँ ।
रात्रिजागरण के दोष । निद्रोत्पादक
उपाय । अनुचित निद्रा को रोकने के
उपाय । उपसंहार ।
द्वाविंशतितमोऽध्यायः (पृ०२५६-२६१)
लंघनबृंहणीयः—वैद्य का लक्षण
लंघन, बृंहण, स्नेहन, स्तंभन के सम्ब-
न्ध में अग्निवेश का प्रश्न । आत्रेय
पुनर्वसु का प्रतिवचन । लंघन, बृंहण,
स्वेदन, स्तम्भन के लक्षण । लंघन,
बृंहण आदि कारक द्रव्यों के कारण ।
लंघन के योग्य व्यक्ति । बृंहण के योग्य
द्रव्य और व्यक्ति । विरूक्षण करने योग्य
व्यक्ति और द्रव्य । स्तम्भन द्रव्य और
स्तंभन योग्य व्यक्ति । सम्यक् लंघन
और लंघन के अतियोग के लक्षण ।
सम्यक् बृंहण और बृंहण के अतियोग के
लक्षण । रूक्षण के सम्यकयोग और
अतियोग । स्तम्भन के सम्यकयोग
और अतियोग के लक्षण । लंघन आदि
छः क्रियाओं के अयोग, हीनयोग के
दुष्परिणाम ।
त्रयोविंशतितमोऽध्यायः पृ० २६१-२६६
सन्तर्पणीयः—सन्तर्पणजन्य रोग
के कारण । रोगों के लक्षण—उनकी
चिकित्सा । अपतर्पण और तज्जन्य रोग—
उनका उपशमन ।
चतुर्विंशतितमोऽध्यायः पृ० २६७-२७४
विधिशोणितीयः—विशुद्ध रक्त
का लाभ । रक्त दूषित होने के कारण
[दायाँ स्तम्भ]
और लक्षण । चिकित्सा । विशुद्ध रक्त
का लक्षण । विशुद्ध रक्त वाले पुरुष का
लक्षण । मद के लक्षण । मूर्च्छा के
लक्षण । अपस्मार और संन्यास के
लक्षण । इन के उपाय । उपसंहार ।
पञ्चविंशतितमोऽध्यायः पृ०२७५-२८१
यज्जःपुरुषीयः—पुरुष और रोग
की उत्पत्ति पर ऋषियों का संवाद ।
पारीक्षि मौद्गल्य का मत पुरुष और
रोगों का उपादान कारण 'आत्मा' है ।
शरलोमा का मत पुरुष और रोगों का
उत्पादन 'सत्त्व' है । वार्योविद का मत
प्राणियों और रोगों का उत्पत्ति मूल
'रस' है । कुशिक हिरण्याक्ष का मत
पुरुष और रोग ६ धातुओं से उत्पन्न
होते हैं । शौनक का मन रोगों और
पुरुष की उत्पत्ति माता पिता से हुई ।
भद्रकाप्य का मत कर्म से पुरुष और
रोग उत्पन्न होते हैं । भरद्वाज का मत
कर्त्ता से स्वभावतः पुरुष और रोग
उत्पन्न होते हैं । कांकायन का मत सुख
दुःख, चेतन अचेतन का कर्त्ता प्रजापति
हैं । आत्रेय भिक्षु का मत पुरुष और
रोगादि काल से उत्पन्न होते हैं पुनर्वसु
आत्रेय का सिद्धान्त पञ्च महाभूतों से
पुरुष और उनसे ही रोग उत्पन्न हुए ।
इस पर पुरुषों और रोगों की वृद्धि के
कारण के विषय में काशिपतिवामक
का प्रश्न । भगवान् आत्रेय का प्रति-
वचन हिताहित सेवन । अग्निवेश
आत्रेय संवाद हित अहित का लक्षण ।
आहार द्रव्य पर विचार । हित आहार ।
लक्षण। द्रव्यों के नौ उत्पत्ति स्थान।
( ७ )
[बायाँ स्तम्भ]
अहित आहार। हित और अहित उप-
योगी द्रव्य। श्रेष्ठ द्रव्य। श्रेष्ठ का
लक्षण। द्रव्यों के नौ उत्पत्ति स्थान।
उपसंहार !
षड्विंशोऽध्यायः (पृ० २६१-३२२)
आत्रेयभद्रकाप्यीयः—ऋषि
संवाद ! रस के विषय में भद्रकाप्य का
मत रस एक है ब्राह्मण शाकुन्तेय का
मत रस दो हैं पूर्णाक्ष मौद्गल्य का मत
रस तीन हैं हिरण्याक्ष कौशिक का मत
रस चार होते हैं कुमारशिरा भरद्वाज
का मत रस पांच हैं। वार्योविद का
मत रस छः हैं वैदेह निमि का मत
रस सात हैं धामागंव वडिश का मत
रस आठ हैं बाल्हीक भिषक् कांकायन
का मत रस अगणित हैं। पुनर्वसु
आत्रेय का मत रस छः हैं रसों की
उत्पत्ति, कर्म, रुचि और प्रभाव। रस
विवेचन। द्रव्यों के भेद उनके कर्म।
कर्म, वीर्य, काल, अधिकरण, उपाय,
तथा फल के लक्षण। द्रव्य, देश,
काल, प्रभाव से द्रव्यों के ६३ भेद।
रसों के भेद, दो दो रस के १५ भेद।
तीन २ रसों के बीस भेद। चार चार
रसों के १५ भेद। पांच २ रसों के छः
भेद। एक २ रस के छः भेद, सर्वयोग
६३ रस। वैद्यप्रशंसा। अनुरस।
अतिरिक्त दश गुण। इनके लक्षण।
रसों की उत्पत्ति। रसों के अनुसार
द्रव्यों के गुण कर्म। मधुर रस। अम्ल
रस। लवण रस। बहुत उपयोग से
हानियां। कटु रस के गुण अति सेवन
[दायाँ स्तम्भ]
से हानियां। तिक्त रस के गुण उसके
अति सेवन से हानियां। कषाय रस के
गुण और उसके अति सेवन से हानियां।
रसानुसारी द्रव्यों का वीर्य। रसों में
तर-तमयोग। विपाक। पदार्थों के
वीर्य ८ प्रकार के। विपाक का लक्षण,
प्रभाव। छः रसों के लक्षण। विरोधी
आहारों के लक्षण उनके गुण दोष
हितकारी अन्न। कालविरुद्ध, देशविरुद्ध
अग्निविरोधी, परस्परविरोधी, सात्म्य-
विरोधी, दोषविरोधी, संस्कारविरुद्ध,
वीर्यविरोधी, कोष्ठविरोधी, अवस्थाविरुद्ध
क्रमविरुद्ध, परिहारविरोधी, पाकविरोधी,
संयोगविरोधी, सम्पद्विरुद्ध, और शास्त्र-
विरुद्ध आहारों का वर्णन। विरोधी
अन्न सेवन से रोगों की उत्पत्ति। विरुद्ध
अन्न सेवन से उत्पन्न रोगों का प्रति-
कार। उपसंहार।
सप्तविंशोऽध्यायः (पृ० ३२२-३७४)
अन्नपानविधिः—प्राणरूप अन्न का
स्वरूप। प्राणों का मूल जाठराग्नि अन्न
इन्धन-अन्नपान विधि का विस्तार से
वर्णन। जल, क्षार, घृत, दूध, मद्य,
सिरका, फाणित, पिण्याक, दालें, मधु
आदि के सामान्य गुण दोष। आहार
पदार्थों के १२ वर्ग शूकधान्यवर्ग।
शमीधान्यवर्ग। मांसवर्ग। बिलेशय
वारिशय जलचर जंगलीसूग बिकिर
प्रतुद प्रसह और आनूप ये मांस के
आठ उत्पत्ति स्थान। इन मांसों के
गुण। शाकवर्ग। फलवर्ग। हरितवर्ग।
मद्यवर्ग। जलबर्ग। दुग्धवर्ग। इक्षु-
वर्ग। कृतान्नवर्ग। आहारयोनिवर्ग।
[Page Header]
( ८ )
[Column 1]
वर्ग। कृतान्नवर्ग। आहारयोनिवर्ग।
प्रशस्त धान्य। त्याज्य मांस। त्याज्य
शाक। अनुपान। उनके गुण। जल
के अनुपान के अयोग्य व्यक्ति। खाद्य
पदार्थों में गुरु लघु विचार। उपसंहार।
अष्टाविंशोऽध्यायः (पृ० ३७४-३८५)
विविधाशितपीतीयः—शरीर के
सब धातुओं का अन्न से सम्बन्ध।
आहार से उत्पन्न तीन पदार्थ रस, किट्ट
और मल हिताहित आहार और रोग
एवं आरोग्यविषयक अग्निवेश का
प्रश्न आत्रेय पुनर्वसु का समाधान।
धातु गत रोग-रसजन्य रोग। रक्तजन्य,
मांसजन्य, मेदजन्य, मज्जाजन्य और
शुक्रजन्य रोग। अपथ्याहार से मलों
का प्रकोप। धातुजन्य विकारों की
चिकित्साओं का निर्देश। उपसंहार।
इयच्चान्नपानमुक्तम् ॥
एकोनत्रिंशोऽध्यायः (पृ० ३८५-३६०)
दश प्राणायतनीयः—प्राण के
दश स्थान। प्राणाभिसर वैद्य के लक्षण।
रोगाभिसर वैद्य के लक्षण। छद्मवेषी
वैद्यों का वर्णन। उपसंहार।
त्रिंशत्तमोऽध्यायः
(पृ० ३६१-४०७)
अर्थे दशमहामूलीयः—हृदय में
आश्रित दस धमनियां। हृदय के पर्याय।
हृदय का महत्त्व। दस महामूल धम-
नियों का प्रतान। धमनी के पर्याय।
सेवन योग्य पदार्थ। आयुर्वेद के ज्ञाता
के लक्षण। वाक्यार्थ 'अर्थावयवशः
निरूपण'। आयुर्वेद का मूल वेद अथर्व
[Column 2]
वेद। आयु के समानार्थक पर्याय।
आयुर्वेद का लक्षण। आयु का लक्षण।
आयुर्वेद की नित्यता आयुर्वेद के आठ
अंग। आयुर्वेद के अधिकारी। वैद्य
की परीक्षा। चरक तन्त्र के आठ स्थान
उनके अध्यायों की पृथक् २ गणना
और नाम से निर्देश। तन्त्रयुक्ति।
ग्रन्थ संक्षेप। प्रतिवादी उपार्ता वैद्या-
भास को पराजय करने का प्रकार।
तन्त्रविज्ञों और गर्वीले वैद्यों के स्वरूप।
उपसंहार। इति सूत्रस्थानम् ॥
निदानस्थानम्
प्रथमोऽध्यायः (पृ० ४०८-४२१)
ज्वरनिदानम्—निदान के पर्याय।
रोग के तीन प्रकार—आग्नेय, सौम्य
और वायव्य। निदानाष्टक अर्थात्
रोग के पर्याय। पूर्वरूप लिंग उपशय,
सम्प्राप्ति के लक्षण। सम्प्राप्ति के भेद।
ज्वर निदान। ज्वर-दाह के लक्षण।
पित्तज्वर सम्प्राप्ति भेद लक्षण। कफ-
ज्वर सम्प्राप्ति और लक्षण। समंसर्ग
व सांनिपातिक ज्वर। आगन्तुकज्वर
सम्प्राप्ति-लक्षण। ज्वर-ज्वर के भेद
ज्वर के पूर्वरूप ज्वर की उत्पत्ति ज्वर
का परिणाम। ज्वर के चिकित्सासूत्र।
जीर्ण ज्वर में घृतपान। संस्कार सिद्ध
घृत-घृत की श्रेष्ठता। उपसंहार।
द्वितीयोऽध्यायः
(पृ० ४२१-४२८)
रक्तपित्तनिदानम्—रक्तपित्त का
लक्षण। पित्त प्रकोप से रक्त का दोष।
लोहित पित्त वा रक्तपित्त नाम पड़ने
( ६ )
[बायाँ स्तम्भ]
का हेतु । रक्तपित्त के पूर्वरूप । रक्तपित्त
के उपद्रव । रक्तपित्त के दो मार्ग साध्य
असाध्य के विचार । रक्तपित्त का इति-
हास । ऊर्ध्वगामी रक्तपित्त साध्य ।
अधोगामी रक्तपित्त याप्य । उभयमार्ग-
गामी रक्तपित्त असाध्य । द्विदोषज या
त्रिदोषज रक्तपित्त की चिकित्सा ।
साध्य रोग के असाध्य हो जाने के
कारण । असाध्य रक्तपित्त के लक्षण ।
उपसंहार ।
तृतीयोऽध्यायः
(पृ० ४२८-४३६)
गुल्मनिदानम्—गुल्म के पांच
भेद—वातगुल्म, पित्तगुल्म, कफगुल्म,
निचयगुल्म, रक्तगुल्म । इनके सम्बन्ध
में अग्निवेश का प्रश्न । वातगुल्म ।
सम्प्राप्ति और लक्षण । वात के साथ
पित्त प्रकोप के कारण । पित्तगुल्म की
सम्प्राप्ति । वात के साथ कफ प्रकोप
के कारण । कफगुल्म की सम्प्राप्ति ।
सान्निपातिक गुल्म । रक्तगुल्म । रक्त-
गुल्म की सम्प्राप्ति । गुल्म का पूर्वरूप
उपसंहार ।
चतुर्थोऽध्यायः
(पृ० ४३६-४५०)
प्रमेहनिदानम्—प्रमेहों की
संख्या । रोगों के विधान भेद-अध्याय ।
कफप्रमेह के कारण । कफप्रमेह के
दूष्य । कफप्रमेह की सम्प्राप्ति । विकृत
कफ के दश गुण । कफजन्य दश
प्रमेह । जैसे उदकमेह, इक्षुवालिकामेह,
सान्द्रमेह, सान्द्रप्रसादमेह, शुक्रमेह,
[दायाँ स्तम्भ]
शुकमेह, शीतमेह, सिकतामेह, शनैर्मेह,
आलालमेह । पित्तप्रमेहों के कारण
और सम्प्राप्ति । पित्तजन्य छः प्रमेह ।
क्षारमेह, कालमेह, नीलमेह, लोहितमेह
मञ्जिष्ठामेह और हारिद्रमेह । पित्त-
प्रमेहों का विशेष विज्ञान । वातजमेह
के कारण । उनके प्रकार वसाप्रमेह,
मज्जमेह, हस्तिमेह, मधुमेह । सब वातज
मेह असाध्य । वातप्रमेहों का विशेष
विज्ञान । प्रमेहों के पूर्वरूप । प्रमेह के
उपद्रव । चिकित्सा । प्रमेह किन को
होता है । उपसंहार ।
पञ्चमोऽध्यायः
(पृ० ४५०-४५४)
कुष्ठनिदानम्—कुष्ठ रोग की
उत्पत्ति । कुष्ठ के सात भेद । तर-तम
भेद से कुष्ठों के असंख्य भेद । कुष्ठ
रोग के कारण । कुष्ठ रोग के पूर्वरूप ।
कपाल कुष्ठ । उदुम्बर कुष्ठ । मण्डल
कुष्ठ । ऋष्यजिह्व कुष्ठ। पुण्डरीक कुष्ठ।
सिध्म । काकणक कुष्ठ । साध्य असा-
ध्य भेद । उपद्रव । उपसंहार ।
षष्ठोऽध्यायः
(पृ० ४५४-४६३)
शोषनिदानम्—शोष के चार
कारण । शोष का कारण साहस, ।
शोष रोग का कारण वेग-संधान्धारण, ।
क्षय का विवरण । शुक्रक्षय । शोष का
कारण विषमाशन । राजयक्ष्मा शब्द की
निरुक्ति । शोष के पूर्वरूप । राजयक्ष्मा
के ११ रूप । राजयक्ष्मा के साध्य और
असाध्य रूप । उपसंहार ।
उन्मादनिदानम्—पांच प्रकार
( १० )
सप्तमोऽध्यायः
( पृ० ४६३–४७२ )
उन्मादनिदानम्—पांच प्रकार
के उन्माद। उन्माद का लक्षण।
उन्माद के पूर्वरूप वातोन्माद के लक्षण।
पित्तजन्य उन्माद के लक्षण। सान्नि-
पातिक उन्माद। उन्माद की चिकित्सा।
आगन्तुज उन्माद। उन्माद का प्रारम्भ।
आगन्तुज के लक्षण। आघात काल।
उन्माद उत्पन्न करने का प्रयोजन।
उन्माद के भेद। उपसंहार।
अष्टमोऽध्यायः
( पृ० ४७२–४८० )
अपस्मारनिदानम्—चार प्रकार
का अपस्मार। निदान और सम्प्राप्ति।
अपस्मार का लक्षण। अपस्मार के पूर्व-
रूप वातजन्य अपस्मार के लक्षण।
पित्तजन्य अपस्मार। कफजन्य अपस्मार।
सान्निपातिक अपस्मार। चिकित्सा सूत्र।
भिन्न २ रोगों की उत्पत्ति। साध्य और
असाध्य। रोग ज्ञान का फल। एक
रोग के कारण दूसरा रोग। शुद्ध प्रयोग
का लक्षण। कारण भेद। लक्षण भेद।
चिकित्सा विधान। सुखसाध्य और
कृच्छ्रसाध्य। साध्य और असाध्य।
उपसंहार। इति निदानस्थानम् ॥
विमानस्थानम्
प्रथमोऽध्यायः
( पृ० ४८१–४६४ )
रसविमानम्—विमानस्थान का
प्रयोजन। छः रस तीन दोष। रसों के
प्रभाव। द्रव्य के प्रभाव। सात्म्य।
सात्म्य के भेद। प्रवर मध्यम और अवर।
आहार विधि उसके आठ अंग।
करण। संयोग। राशि। देश। काल।
उपयोग संस्था। उपयोक्ता। आहार
विधि। आहार के सद्गुणों का उपदेश।
उपसंहार।
द्वितीयोऽध्यायः
( पृ० ४६४–५०१ )
त्रिविधकुक्षीयं विमानम्—पेट
में तीन भाग। आहार की अमात्रा,
हीन मात्रा, अधिक मात्रा। उनके दोष
आहार की अति मात्रा से हानियां।
आमप्रदोष के दो प्रकार-विषूचिका और
अलसक। अलसक का स्वरूप। असाध्य
अलसक। साध्य अलसक की चिकित्सा।
विषूचिका का उपाय। आम प्रदोष में
औषध का प्रयोग। अपतर्पण का प्रयोग।
अन्न पाचन के सम्बन्ध में अग्निवेश का
प्रश्न और आत्रेय पुनर्वसु का उत्तर।
उपसंहार।
तृतीयोऽध्यायः
( पृ० ५०१–५१६ )
जनपदोद्ध्वंसनीयं विमानम्—
जनपदनाशक रोग के प्रतीकार का उप-
देश। जनपदनाशक रोग के फैलने के
कारण प्रश्न और उत्तर। आरोग्यनाशक
वायु के लक्षण। रोगकारी जल के
लक्षण। नाशकारी रोगों के पूर्व, देश में
उपस्थित लक्षण। विपरीत ऋतु के
लक्षणों वाला काल। आयु-रक्षक उपाय।
वायु आदि में विगुणता उत्पन्न होने का
( ११ )
कारण, अधर्म। अधर्म की युगों के के प्रकोप के कारण। स्रोतों के दोष का
अनुसार उत्पत्ति और उसके दुष्परि- लक्षण। स्रोतों के प्रकृतिसिद्ध रूप।
णाम। आयु के समय और परिणाम उपसंहार।
विषयक अग्निवेश का प्रश्न तथा आत्रेय षष्ठोऽध्यायः (पृ० ५३०-५४१)
ऋषि का प्रतिवचन। दैव और पुरुषकार रोगानीकं विमानम्—प्रभाव
का लक्षण तीन प्रकार की आयु। आयु भेद से रोगों के प्रकार भेद। दश
का काल। अकाल-मरण पर विचार। प्रकार के रोग। दो मानस दोष रजस्
काल मृत्यु और अकाल मृत्यु पर विचार। और तमस्। इनके कुपित होने के तीन
ज्वर में उष्ण जल देने विषयक प्रश्न। कारण अनुबन्ध्य-अनुबन्ध भेद से रोगों
आत्रेय का उत्तर। ज्वर में उष्ण जल में भेद। बल के भेदों से शरीरस्थ अग्नि
के गुण। निदान से विपरीत चिकित्सा। के चार प्रकार। अग्नि भेद से मनुष्यों
अपतर्पण तीन प्रकार के उनके उपयोग के चार प्रकार वात, पित्त, कफ प्रकृति
के अवसर। त्याज्य रोगी। उपसंहार। के पुरुषों का विवेचन। आरोग्य प्रकृति।
चतुर्थोऽध्यायः सम प्रकृति। वातल, पित्तल और
(पृ० ५१६-५२४) श्लेष्मल तीन प्रकार के रोगी। वात,
त्रिविधरोगविशेषविज्ञानीयम्— पित्त और श्लेष्म प्रकृति के पुरुषों के
तीन प्रकार के रोग विशेषों का विज्ञान लक्षण इनके अनुकूल आहार विहार।
आप्तोपदेश, अनुमान और प्रत्यक्ष। उपसंहार।
आप्तोपदेश का निरूपण। प्रत्यक्ष और सप्तमोऽध्यायः
अनुमान के लक्षण। आप्तोपदेश से (पृ० ५४१-५५ )
क्या जानें। प्रत्यक्ष से क्या जानें। व्याधितरूपीयं विमानम्—
अनुमान से क्या जानें उपसंहार। व्याधि के ज्ञान में भ्रम। चार प्रकार
पञ्चमोऽध्यायः के कृमि। दो प्रकार का मल। उन में
(पृ० ५२४-५३१) उत्पन्न कृमि। उनका प्रभाव और
स्रोतोविमानम्—शरीर गत चिकित्सा। रक्तजन्य कृमि। पुरीषजन्य
अनेक धातुवाही स्रोतों का वर्णन। कृमि। उनका उपाय अपकर्ष विधि,
प्राणवह स्रोतों के दुष्ट होने पर लक्षण। प्रकृति विघात। कृमि-कोष्ठ के रोगी का
जलवह स्रोत अन्नवह स्रोत। रसवह उपचार। आस्थापन बस्तिक्रिया की विधि।
स्रोत। रक्तवह स्रोत। मांसवह स्रोत। विरेचन। अनुवासन। शिरो विरेचन।
मूत्रवह स्रोत। पुरीषवह स्रोत। स्वेद- कृमियों के प्रकृतिविघात की रीति।
वह स्रोत। स्रोतों के पर्याय। स्रोतों शिरोरोग पर चिकित्सा। उपसंहार।
( १२ )
अष्टमोऽध्यायः
( पृ० ५१५-६१८ )
रोगभिषग्जितीयम्—शास्त्रप-
रीक्षा। शास्त्र के गुण। आचार्य का
लक्षण। शास्त्र को दृढ़ करने के उपाय
शास्त्र के अध्ययन की विधि ! अध्या-
पन-विधि। गुरु शिष्य के परस्पर
कर्त्तव्य। दीक्षा। आचार्य का शिष्य
को उपदेश। संभाषा-विधि। तद्विद्य-
संभाषा। (संधाय) अनुलोम संभाषण
विगृह्य संभाषा। प्रतिवादी के तीन
प्रकार। तीन प्रकार की परिषद्।
प्रतिवादी को निग्रह करने के उपाय :
प्रतिलोम संभाषण का प्रकार। वाद
की मर्यादा। ४४ आवश्यकीय ज्ञातव्य-
वाद का लक्षण। जल्प वितण्डा।
प्रतिज्ञास्थापना, प्रतिष्ठापन, हेतु,
उत्तर, दृष्टान्त। सिद्धान्त ४ प्रकार के।
शब्द प्रत्यक्ष अनुमान ऐतिह्य औपम्य
संशय प्रयोजन सव्यभिचार। जिज्ञासा
व्यवसाय। अर्थप्राप्ति, अनुयोज्य।
अननुयोज्य अनुयोग प्रत्यनुयोग वाक्य-
दोष न्यून अधिक अनर्थक अपार्थक
विरुद्ध। वाक्यप्रशंसा। छल सामान्य-
छल वाक् छल अहेतु तीन प्रकार के
प्रकरणसम संशयसम वर्ण्यसम। अतीत
काल उपालम्भ परिहार। प्रतिज्ञाहानि
अभ्यनुज्ञा हेत्वन्तर अर्थान्तर। निग्रह-
स्थान। कारण करण कार्ययोनि-कार्य-
कार्यफल। अनुबन्ध, देश, काल, उपाय
प्रवृत्ति आदि के सम्बन्ध में विशेष
विज्ञान। इनकी परीक्षा। दश विध
परीक्षा। कारण-परीक्षा। करण-परीक्षा
कार्ययोनि-परीक्षा-कार्य-कार्यफल-परीक्षा।
अनुबन्ध-देश कार्य-देश आदि की व्या-
ख्या। आतुर परीक्षा। प्रकृति आदि
भाव। श्लेष्मप्रकृति। पित्तप्रकृति।
वातप्रकृति। समधातुप्रकृति। विकृतियों
से परीक्षा। सार से परीक्षा शरीर रचना
से परीक्षा। प्रमाण से परीक्षा। तीन
प्रकार के प्रमाण। सात्म्य से परीक्षा।
बल से परीक्षा। आहार से व्यायाम-
शक्ति से परीक्षा। वयस् से परीक्षा।
काल का विवेचन संवत्सर। रोगी की
दशा के अर्थ में काल की अपेक्षा से
काल, अकाल। प्रवृत्ति। उपाय। परीक्षा
का प्रयोजन। वमनोपयोगी द्रव्य।
विरेचन द्रव्य। रसों की अपेक्षा से
द्रव्यों का वर्गीकरण। मधुरस्कन्ध।
अम्लस्कन्ध। लवणस्कन्ध। कटुक-
स्कन्ध। तिक्तस्कन्ध। कषायस्कन्ध।
६ हों वर्गों के उपयोग में वैद्य का
कर्त्तव्य। अनुवासना द्रव्य शिरोविरेचन-
द्रव्य। उपसंहार। इति विमानस्थानम्॥
ओ३म्
चरकसंहिता
सूत्रस्थानम्
प्रथमोऽध्यायः
अथातो दीर्घञ्जीवितीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
अब यहां से 'दीर्घ-जीवतीय' नामक अध्याय का व्याख्यान करते हैं ॥ १ ॥
इति ह स्माह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
ऐसा ही भगवान् आत्रेय ने कहा था १ ॥ २ ॥
ऋषि भरद्वाज का इन्द्र के पास गमन
दीर्घं जीवितमन्विच्छन् भरद्वाज उपागमत् ।
इन्द्रमुग्रतपा बुद्ध्वा शरण्यममरेश्वरम् ॥३॥
दीर्घ काल तक जीवन की इच्छा से उग्रतपस्वी भरद्वाज मुनि देवों के राजा
इन्द्र को शरण योग्य जानकर उनके पास गये ॥ ३ ॥
१. निष्प्रयोजन और अभिधेयरहित अर्थ में बुद्धिमानों की प्रवृत्ति नहीं होती !
इसलिये सब से प्रथम शास्त्र का प्रयोजन अभिधेय और सम्बन्ध बतलाना चाहिये ।
कहा भी है—
अभिधेयफलज्ञानविरहस्तिमितोद्यमाः ।
श्रोतुमल्पमपि ग्रन्थं नाद्रियन्ते हि साधवः ॥
सिद्धार्थे सिद्धसम्बन्धं श्रोतुं श्रोता प्रवर्तते ।
शास्त्रादौ तेन वक्तव्यः सम्बन्धः सप्रयोजनः ॥
इस शास्त्र का प्रयोजन 'धातुसाम्य' है । कहा भी है—'धातुसाम्यक्रिया चोक्ता
तन्त्रस्यास्यप्रयोजनम्' 'धातुसाम्य' का अर्थ विषम हुए धातुओं को समान करना और
समान धातुओं का रक्षण करना है। अथवा रोगी के रोग का निवारण करना और स्वस्थ
२ चरकसंहिता [ अ० १
ब्रह्मणा हि यथा प्रोक्तमायुर्वेदं प्रजापतिः ।
जग्राह निखिलेनाऽऽदावश्विनौ तु पुनस्ततः ॥ ४ ॥
अश्विभ्यां भगवान्छक्रः प्रतिपेदे ह केवलम् १ ।
ऋषिप्रोक्तो भरद्वाजस्तस्माच्छक्रमुपागमत् ॥ ५ ॥
आरम्भ में ब्रह्मा ने यथावत् आयुर्वेद का उपदेश किया उसको प्रजापति
[दक्ष] ने पूर्ण रूप से ग्रहण किया । दक्ष से दोनों अश्विनीकुमारोंने, अश्विनी-
कुमारों से इन्द्र ने ग्रहण किया । इसी कारण ऋषियों से प्रेरित होकर भरद्वाज
मुनि इन्द्र के पास आये २ ॥ ४-५ ॥
विघ्नभूता यदा रोगाः प्रादुर्भूताः शरीरिणाम् ।
तपोपवासाध्ययनब्रह्मचर्यव्रतायुषाम् ॥ ६ ॥
तदा भूतेष्वनुक्रोशं पुरस्कृत्य महर्षयः ।
समेताः पुण्यकर्माणः पार्श्वे हिमवतः शुभे ॥ ७ ॥
जब तप, उपवास, ब्रह्मचर्य, अध्ययन, व्रत और आयु, इन में विघ्न
करनेवाले रोग उत्पन्न हो गये; तब प्राणियों पर दया कर के पुण्यात्मा महर्षिगण
पवित्र हिमालय के पार्श्व में एकत्र हुए ॥ ६-७ ॥
अङ्गिरा जमदग्निश्च वसिष्ठः कश्यपो भृगुः ।
आत्रेयो गौतमः सांख्यः पुलस्त्यो नारदोऽसितः ॥ ८ ॥
अगस्त्यो वामदेवश्च मार्कण्डेयाश्वलायनौ ।
पारीक्षिर्भिक्षुरात्रेयो भरद्वाजः कपिञ्जलः ॥ ९ ॥
पुरुष के स्वास्थ्य की रक्षा करना है। जैसा कि सुश्रुत ने कहा है:—
“व्याध्युपसृष्टानां व्याधिपरिमोक्षः स्वस्थस्य परिरक्षणञ्च” ।
अभिधेय-सम्बन्ध—हेतु, दोष और द्रव्य ये स्कन्धत्रय और रोगों के उत्पन्न
न होने की विधि का बतलाना ।
शास्त्र और प्रयोजन का उपेय-उपाय सम्बन्ध है ।
भगवान् का लक्षण—“उत्पत्तिं प्रलयं चैव भूतानामागतिं गतिम् ।
वेत्ति विद्यामविद्यां च स वाच्यो भगवानिति ॥”
१—अश्विनीकुमारों से इन्द्र ने पढ़ा ही था, पढ़ाया नहीं था, इन्द्र को
शिष्य की चाह थी, क्योंकि बिना पढ़ाये विद्या संशय रहित नहीं बनती ।
२. सुश्रुत में—“ब्रह्मा प्रोवाच, ततः प्रजापतिरधिजगे, तस्मादश्विनौ,
अश्विभ्यामिन्द्रः ।”
विश्वामित्राश्वत्थ्यौ च भार्गवश्च्यवनोऽभिजित्।
गार्ग्यः शाण्डिल्यकौण्डिन्यौ वार्क्षिर्देवलगालवौ ॥ १० ॥
सांकृत्यो वैजवापिश्च कुशिका बादरायणः।
बडिशः शरलोमा च काप्यकात्यायनावुभौ ॥ ११ ॥
काङ्कायनः कैकशेशो धौम्यो मारीचिकाश्यपौ।
शर्कराक्षो हिरण्याक्षो लोकाक्षः पैङ्गिरेव च ॥ १२ ॥
शौनकः शाकुनेयश्च मैत्रेयो मैमतायनिः।
वैखानसा वालखिल्यास्तथा चान्ये महर्षयः ॥ १३ ॥
ब्रह्मज्ञानस्य निधयो यमस्य नियमस्य च।
तपसस्तेजसा दीप्ता हूयमाना इवाग्नयः ॥ १४ ॥
सुखोपविष्टास्ते तत्र पुण्यां चक्रुः कथामिमाम्।
अंगिरा, जमदग्नि, वसिष्ठ, कश्यप, भृगु, आत्रेय, गौतम, सांख्य, पुलस्त्य
नारद, असित, अगस्त्य, वामदेव, मार्कण्डेय, आश्वलायन, पारीक्षि, भिक्षु,
आत्रेय, भरद्वाज, कपिञ्जल, विश्वामित्र, आश्वत्थ्य, भार्गव, च्यवन, अभिजित्,
गार्ग्य, शाण्डिल्य, कौण्डिन्य, वार्क्षि, देवल, गालव, साङ्कृत्य, वैजवापि, कुशिक,
बादरायण, बडिश, शरलोमा, काप्य, कात्यायन, काङ्कायन, कैकशेश, धौम्य,
मारीचि, काश्यप, शर्कराक्ष, हिरण्याक्ष, लोकाक्ष, पैङ्गि, शौनक, शाकुनेय, मैत्रेय,
मैमतायनि, वैखानस, वालखिल्य और अन्य ब्रह्मज्ञान, यम, १ नियम और तप
के तेज से चमकते हुए, आहुति से उज्ज्वल अग्नि के समान तेजस्वी
महर्षि लोग वहां सुख से विराज कर, इस पुण्यशाली कथा को इस प्रकार
कहने लगे ॥ ८-१५ ॥
धर्मार्थकाममोक्षाणामारोग्यं मूलमुत्तमम् ॥ १५ ॥
रोगास्तस्यापहर्तारः श्रेयसो जीवितस्य च।
प्रादुर्भूतो मनुष्याणामन्तरायो महानयम् ॥ १६ ॥
कः स्यात्तेषां शमोपाय इत्युक्त्वा ध्यानमास्थिताः।
अथ ते शरणं शक्रं ददृशुर्ज्ञानचक्षुषा ॥ १७ ॥
स वक्ष्यति शमोपायं यथावदमरप्रभुः।
धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चारों पुरुषार्थों का मूल कारण आरोग्य
१. यम—अहिंसा सत्यास्तेयब्रह्मचर्यापरिग्रहा यमाः ॥ यो० सू० ॥
नियम—शौचसन्तोषतपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि नियमाः ॥यो०सू० ॥
ही है। १ रोग इस आरोग्य, अभ्युदय तथा जीवन (आयु) को नाश करने वाले
हैं। मनुष्यों के लिए ये रोग बड़े विघ्नरूप हो गये हैं। इसलिए इन रोगों की
शान्ति का उपाय क्या होना चाहिए ? ऐसा कहकर वे सब ऋषि ध्यान मग्न
हो गये। उन्होंने अन्तश्चक्षु से इन्द्र को अपनेको शरण देने वाले के रूप से देखा
और जान लिया कि देवों का राजा इन्द्र ही शान्ति का उपाय कहेगा ॥१६-१७॥
कः सहस्राक्षभवनं गच्छेत्प्रष्टुं शचीपतिम् ॥ १८ ॥
अहमर्थे नियुज्येयमत्रेति प्रथमं वचः ।
भरद्वाजोऽब्रवीत्तस्मादृषिभिः स नियोजितः ॥ १६ ॥
प्रश्न उपस्थित हुआ कि शचीपति इन्द्र से पूछने के लिये इन्द्र के भवन
तक कौन जाय ? ऋषि भरद्वाज ने सबसे प्रथम कहा कि—इस कार्य में मुझको
नियुक्त किया जाये। इसलिए आंगरा आदि ऋषियों ने भरद्वाज ऋषि को ही
इस कार्य में नियुक्त कर दिया ॥ १८-१६ ॥
स शक्रभवनं गत्वा सुरर्षिगणमध्यगम् ।
ददर्श बलहन्तारं दीप्यमानमिवानलम् ॥ २० ॥
इन्द्र के भवन में जाकर, उन्होंने देवर्षियों के मध्य में प्रदीप्त अग्नि के
समान तेजस्वी, बल नाम असुर को मारने वाले इन्द्र को देखा ॥ २० ॥
सोऽभिगम्य जयाशीर्भिरभिनन्द्य सुरेश्वरम् ।
प्रोवाच भगवान्धीमानृषीणां वाक्यमुत्तमम् ॥ २१ ॥
बुद्धिमान भरद्वाज ने इन्द्र के सम्मुख जाकर जयसूचक आशीर्वादों से इन्द्र
का अभिनन्दन करके, ऋषियों का उत्तम वचन प्रस्तुत किया ॥ २१ ॥
व्याधयो हि समुत्पन्नाः सर्वप्राणिभयंकराः ।
तद् ब्रूहि मे शमोपायं यथावदमरप्रभो ॥ २२ ॥
हे अमरप्रभो ! सब प्राणियों को भय देने वाली व्याधियां उत्पन्न हो गई हैं
इसलिये आप इनकी शान्ति का उपाय उपदेश करें ॥ २२ ॥
तस्मै प्रोवाच भगवान्नायुर्वेदं शतक्रतुः ।
पदैरल्पैर्मतिं बुद्ध्वा विपुलां परमर्षये ॥ २३ ॥
१ कहा भी है— "आयतनं विद्यानां मूलं धर्मार्थकाममोक्षाणाम् ।
श्रेयः परं किमन्यत् शरीरमजरामरं विधायैकम् ॥” रसहृदयतंत्र ॥
२ योग्य शिष्य ही विनयपूर्वक गुरु से शास्त्रों को सुनने का अधिकारी है।
यथा:—तद् विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया ।
उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः ॥ गीता ॥
अ० १ ] सूत्रस्थानम् ५
अ० १ ] सूत्रस्थानम् ५
भगवान् इन्द्रने महर्षि भरद्वाज को महामति जान कर थोड़े ही शब्दों में
संक्षेप से आयुर्वेद का उपदेश किया ॥ २३ ॥
हेतुलिङ्गौषधज्ञानं स्वस्थातुरपरायणम् ।
त्रिसूत्रं शाश्वतं पुण्यं बुबुधे यं पितामहः ॥ २४ ॥
सोऽनन्तपारं त्रिस्कन्धमायुर्वेदं महामतिः ।
यथावदचिरात् सर्वं बुबुधे तन्मना मुनिः ॥ २५ ॥
तेनाऽऽयुरमितं लेभे भरद्वाजः सुखान्वितम् ।
ऋषिभ्योऽनधिकं तच्च शशंसानवशेषयन् ॥२६॥
ऋषयश्च भरद्वाजाज्जगृहुस्तं प्रजाहितम् ।
दीर्घमायुश्चिकीर्षन्तो वेदं वर्धनमायुषः ॥ २७ ॥
हेतु ( रोगों का कारण ), लिंग ( रोगों के चिन्ह ), औषध, (संशोधन और
संशमन रूप चिकित्सा ), स्वस्थ एवं रोगी दोनों के लिए परम गति और जिस
का पितामह ( ब्रह्मा ) ने प्रथम ज्ञान किया था, उस तीन सूत्र १ वाले पुण्य,
श्रेष्ठ और नित्य, सनातन २ आयुर्वेद का इन्द्र ने उपदेश किया । महामति भर-
द्वाज मुनि ने एकाग्रचित्त होकर इस अनन्त और अपार ३ और तीन स्कन्धों
वाले आयुर्वेद को यथावत् शीघ्र ही सम्पूर्ण जान लिया । भरद्वाज मुनि ने इस
१ त्रिःसूत्र—हेतु, दोष और द्रव्य संग्रह रूप:
हेतुसंग्रह—कालबुद्धीन्द्रियार्थानां योगो मिथ्या न चाति च ।
द्वयाश्रयाणां व्याधीनां त्रिविधो हेतुसंग्रहः ॥
दोषसंग्रह—वातः पित्तं कफश्चोक्तः शारीरो दोषसंग्रहः ।
मानसः पुनरुद्दिष्टो रजश्च तम एव च ॥
द्रव्यसंग्रह—किंचिद्दोषप्रशमनं किंचिद् धातु-प्रदूषणम् ।
स्वस्थवृत्तौ मतं किंचित् त्रिविधं द्रव्यमुच्यते ॥
अथवा 'त्रिसूत्र' शब्द से वात, पित्त और कफ का ग्रहण करना चाहिये ।
क्योंकि सम्पूर्ण आयुर्वेद शास्त्र इन्हीं में ओत-प्रोत है । जैसा कि सुश्रुत में—
“वातपित्तश्लेष्माण एव देहसंभवहेतवः । तैरेवाव्यापन्नैरधो मध्योर्ध्वसंनिविष्टैः
शरीरारमदं धार्यत-आगारमिव स्थूणाभिः । अतः त्रिस्थूणाभिरित्येके ।”
२—सोऽयमायुर्वेदः शाश्वतो निर्दिश्यते, अनादित्वात् । चरक ॥
३- नास्ति आयुर्वेदस्य पारम्, तस्मादप्रमत्तः शश्वदभियोगमस्मिन् गच्छेत् ।
॥ चरक ॥
६ चरकसंहिता [ अ० १
आयुर्वेद के द्वारा ही सुख से युक्त दीर्घ आयु प्राप्त की। और उसने ऋषियों
को न अधिक और न कुछ कम, ज्यों का त्यों ही सम्पूर्ण शास्त्र का उपदेश
किया। दीर्घ आयु करने की इच्छा वाले ऋषियों ने भी लोक की हितकामना
से इस आयुर्वधक आयुर्वेद को भरद्वाज से ग्रहण किया ॥ २४-२७ ॥
महर्षयस्ते ददृशुर्यथावज्ज्ञानचक्षुषा।
सामान्यं च विशेषं च गुणान् द्रव्याणि कर्म च ॥ २८ ॥
समवायं च, तज्ज्ञात्वा तन्त्रोक्तं विधिमास्थिताः।
लेभिरे परमं शर्म जीवितं चाप्यनश्वरम् ॥ २६ ॥
ज्ञान की चक्षु से ऋषियों ने सामान्य, विशेष, गुण, द्रव्य, कर्म, समवाय
का यथावत् पूर्णरूप से दर्शन किया। इन को यथावत् जानकर आयुवद विधि
से हितकारक पदार्थों का सेवन और अहितकारी पदार्थों का त्याग कर परम
सुख, आरोग्य और दीर्घ जीवन प्राप्त किया १ ॥ २८-२६ ॥
अथ मैत्रीपरः पुण्यमायुर्वेदं पुनर्वसुः।
शिष्येभ्यो दत्तवान् षड्भ्यः सर्वभूतानुकम्पया ॥ ३० ॥
अग्निवेशश्च भेडश्च जतूकर्णः पराशरः।
हारीतः क्षारपाणिश्च जगृहुस्तन्मुनेर्वचः ॥ ३१ ॥
तत्पश्चात् सब प्राणियों में मैत्री बुद्धि रखने वाले पुनर्वसु आत्रेय ने सब प्राणियों
पर दया का अनुभव करके इस पवित्र आयुर्वेद का छः शिष्यो को उपदेश किया।
अग्निवेश, भेड, जतूकर्ण, पराशर, हारीत और क्षारपाणि इन छः शिष्यों
ने मुनि के उस उपदेशवचन को ग्रहण किया ॥। ३०-३१ ॥
बुद्धेर्विशेषस्तत्रासीन्नोपदेशान्तरं मुनेः।
तन्त्रस्य कर्ता प्रथममग्निवेशो यतोऽभवत् ॥ ३२ ॥
अथ भेडादयश्चक्रुः स्वं स्वं तन्त्रं कृतानि च।
श्रावयामासुरात्रेयं सर्षिसंघं सुमेधसः ॥ ३३ ॥
श्रुत्वा सूत्रणमर्थानाम्मृषयः पुण्यकर्मणाम्।
यथावत्सूत्रितमिति प्रहृष्टास्तेऽनुमेनिरे ॥ ३४ ॥
सर्व एवास्तुवंस्तांश्च सर्वभूतहितैषिणः।
साधु भूतेष्वनुक्रोश इत्युच्चैरब्रुवन् समम् ॥ ३५ ॥
तं पुण्यं शुश्रुवुः शब्दं दिवि देवर्षयः स्थिताः।
सामराः परमर्षीणां श्रुत्वा मुमुदिरे परम् ॥ ३६ ॥
१—धर्मविशेषप्रसूताद् द्रव्यगुणकर्मसामान्यविशेषसमवायानां पदार्थानां
साधर्म्यवैधर्म्याभ्यां तत्त्वज्ञानान्निःश्रेयसम् । वैशेषिक०
अ० १ ] सूत्रस्थानम् ७
अ० १ ] सूत्रस्थानम् ७
अहो साध्विति घोषश्च लोकाँस्त्रीनन्वनादयत् ।
नभसि स्निग्धगम्भीरो हर्षाद् भूतैरुदीरितः ॥ ३७ ॥
शिवो वायुर्ववौ सर्वा भाभिरुन्मीलिता दिशः ।
निपेतुः सजलाश्चैव दिव्याः कुसुमवृष्टयः ॥ ३८ ॥
अथाग्निवेशप्रमुखान् विविशुर्ज्ञानदेवताः ।
बुद्धिः सिद्धिः स्मृतिर्मेधा धृतिः कीर्तिः क्षमा दया ॥ ३९ ॥
तानि चानुमतान्येषां तन्त्राणि परमर्षिभिः ।
भवाय भूतसंघानां प्रतिष्ठां भुवि लेभिरे ॥ ४० ॥
अग्निवेश की बुद्धि विशेष थी, मुनि आत्रेय के उपदेशमें कोई अन्तर नहीं
था । अग्निवेश ही सब से प्रथम आयुर्वेद-तंत्र का कर्त्ता हुआ । इसके पीछे
भेड आदि बुद्धिमान् शिष्यों ने भी अपने अपने तंत्र बना कर बहुत से ऋषियों
के साथ विराजमान आत्रेय मुनि को सुनाये । पुण्यकर्मा अग्निवेश आदि ऋषियों
द्वारा भली प्रकार से सूत्र रूप से गुंथे हुए आयुर्वेद शास्त्र को सुनकर वे बहुत
प्रसन्न हुए और उन्होंने उसका प्रसन्नता से अनुमोदन भी किया कि ठीक
प्रकार से ग्रथित ( गुंथा ) हुआ है । सब प्राणियों पर दयालु उन ऋषियों की
सब ने ही प्रशंसा की । सब ने एक साथ उच्चस्वर से कहा कि आपने प्राणियों
पर बहुत उत्तम रूप से दया की है । स्वर्ग में स्थित देवों के सहित नारद
आदि देव-ऋषियों ने भी उन परम ऋषियों के पुण्य शब्द को सुना । इस को
सुनकर वे भी बहुत प्रसन्न हुए । समस्त प्राणियों ने हर्ष से अति स्नेह युक्त
एवं गम्भीर शब्द से साधुवाद दिया । इस साधुवाद की ध्वनि आकाश में फैल
कर तीनों लोकों को गुंजा दिया । सुखदायक वायु बहने लगा, सब दिशायें प्रकाश
से चमकने लगीं, जल से भी दिव्य कुसुम बरसने लगे ।
( बुद्धि ) उपलब्धि, ( सिद्धि ) साध्य-साधन, ( स्मृति ) पूर्व अनुभूत
अर्थ का स्मरण, ( मेधा ) धारण करने की शक्ति, ( धृति ) मन की संतुष्टि,
( कीर्ति ) यश, ( क्षमा ) अपकारी के प्रति अनपकार की इच्छा, ( दया )
प्राणियों के दुःख हटाने की इच्छा, ये ज्ञानमय देवता अग्निवेश आदि ऋषियों
में प्रविष्ट हुए अर्थात् ये शुभ गुण इन में आये ।
महर्षियों द्वारा अनुमोदित उक्त ऋषियों के शास्त्र लोगों के परम कल्याण
के लिये पृथिवी पर प्रतिष्ठा को प्राप्त हुए ॥ ३२-४० ॥
आयुर्वेद का लक्षण—
हिताहितं सुखं दुःखमायुस्तस्य हिताहितम् ।
मानं च तच्च यत्रोक्तमायुर्वेदः स उच्यते ॥ ४१ ॥
८ चरकसंहिता [ अ० १
हित, अहित, सुख और दुःख यह चार प्रकार की 'आयु' है। इस आयु
का हित-अहित, पथ्यापथ्य, और इस आयु का मान-परिमाण यह सब जिस
शास्त्र में कहा हो, तथा आयु का लक्षण जिसमें हो, उसे 'आयुर्वेद'१ कहते हैं।
हित आयु, अहित आयु, सुखी आयु, दुःखी आयु, चार प्रकारकी आयु है ॥४१॥
आयु का लक्षण—
शरीरेन्द्रियसत्त्वात्मसंयोगो, धारि जीवितम् ।
नित्यगश्चानुबन्धश्च पर्यायैरायुरुच्यते ॥ ४२ ॥
(शरीर) पंच महाभूतों से बना, आत्मा का अधिष्ठान, (इन्द्रिय) भौतिक
इन्द्रियां, (सत्त्व) मन, (आत्मा) द्रष्टा, भोक्ता, जीव और ईश्वर, इनके
संयोग का नाम 'आयु' है। आयु निरन्तर चलने वाला होने से 'आयु' कहाता
है [ एति गच्छतोति आयुः । ]
आयु अर्थात् जीवन के पर्यायवाची शब्द—(धारि) शरीर को धारण
करता है, (जीवित) प्राणों को धारण करता है, (नित्यग) निरन्तर चलता
है, (अनुबन्ध) प्राणों के साथ सम्बन्धित है, और 'चेतनानुवृत्ति' इन पर्यायों
से बतलाया जाता है२ ॥ ४२ ॥
तस्याऽऽयुषः पुण्यतमो वेदो वेदविदां मतः ।
वक्ष्यते यन्मनुष्याणां लोकयोरुभयोर्हितम् ॥ ४३ ॥
यह आयुर्वेद सब से अधिक श्रेष्ठ पुण्यजनक है [ क्योंकि अन्य ज्ञान पार-
लौकिक हित को ही बतलाते हैं ] यह आयुर्वेद इहलोक और परलोक दोनों के
हितों को कहता है, ऐसा ज्ञानियों का मत है३ ॥ ४३ ॥
सामान्य और विशेष—
सर्वदा सर्वभावानां सामान्यं वृद्धिकारणम् ।
ह्रासहेतुर्विशेषश्च प्रवृत्तिरुभयस्य तु ॥ ४४ ॥
सामान्यमेकत्वकरं विशेषस्तु पृथक्त्वकृत् ।
तुल्यार्थता हि सामान्यं विशेषस्तु विपर्ययः ॥ ४५ ॥
सब पदार्थों का सब कालों में 'सामान्य'—समान [ गुण आदि ] धर्म ही
वृद्धिका कारण होता है, और 'विशेष'—अर्थात् विभेद या विपरीत होना ही
ह्रास का कारण होता है। दोनों का शरीर के साथ सम्बन्ध सब पदार्थों की
१—“आयुरस्मिन्विन्दति वेत्ति वा आयुर्वेदः ।” सुश्रुत ॥
२—तत्रायुश्चेतनानुवृत्तिः जीवितमनुबन्धो धारि चेत्येकार्थः ॥ सु० ॥
३—अत्राऽऽयत्तमैहिकमामुष्मिकं च श्रेयः ॥ सुश्रुत० ॥
अ० १ ] सूत्रस्थानम् ६
अ० १ ] सूत्रस्थानम् ६
वृद्धि और ह्रास का कारण है। सब कालों में शरीर के अन्दर दोनों ही धर्म रह
सकते हैं। इसलिये शरीरमें वृद्धि और क्षय शरीरका बनना (Metabolism) और
शरीर का टूटना ( Ketabolism ) दोनों क्रियायें हर समय होती रहती हैं।
एकत्व बतलाने वाला धर्म 'सामान्य' है। और 'पृथग्-भाव' बतलाने वाला
धर्म 'विशेष' है।¹ क्योंकि समान धर्म का होना यह सामान्य है, और इससे
विपरीत होना विशेष है ॥ ४४-४५ ॥
सत्त्वमात्मा शरीरं च त्रयमेतत्त्रिदण्डवत् ।
लोकस्तिष्ठति संयोगात्तत्र सर्वं प्रतिष्ठितम् ॥ ४६ ॥
स पुमांश्चेतनं तच्च तच्चाधिकरणं स्मृतम् ।
वेदस्यास्य तदर्थं हि वेदोऽयं संप्रकाशितः ॥ ४७ ॥
(सत्त्व) मन, (आत्मा) चेतना और 'शरीर' इन तीनों से बने हुए को
"लोक"² कहते हैं। यह तीनों मिलकर तिकन्टी, या तिपाई की तरह 'लोक'
को धारण किये हुए हैं। इस संयोग से बने हुए पुरुष में जन्म-मरण आदि
१ समान गुण वाले—इसका अर्थ यह है कि द्रव्य, गुण, कर्म, इनमें
सम्पूर्ण रूप मे समान गुण वाले पदार्थ ही ग्रहण करने चाहिये।
जिस प्रकार खट्टा आंवला भी खट्टे पित्त को नहीं बढ़ाता, अपितु शीतवीर्य
होने से पित्त का शमन करता है, क्योंकि पित्त उष्ण है।
द्रव्यसमान से विपरीत प्रभाव—तैजस क्षार से श्लेष्मा का क्षय
गुण ” ” ” ”—द्रव कांजी से श्लेष्मा का लघु-रूक्ष गुण के
कारण क्षय,
कर्म ” ” ” ”—नींद से वायु का नाश, भागने से कफ का
क्षय होना,
सामान्य और विशेष का स्वरूप—तुल्यार्थता अर्थात् समानार्थक होने का
नाम सामान्य और विपर्यय का अर्थ 'विशेष' है।
"सामान्यं विशेष इति बुद्धयपेक्षम्" । वैशेषिक द० ॥
कहा भी है—
सर्वेषां सर्वदा वृद्धिः तुल्यद्रव्यगुणक्रियैः।
भावैर्भवति भावानां विपरीतेर्विपर्ययः ॥
२. "षड्धातुसमुदिता लोक इति शब्दं लभन्ते ।"
तिकन्टी—में एक बल्ली या स्तम्भ के निकाल लेने से वह खड़ी नहीं रह
सकती, इसी प्रकार इन तीनोंमें से एकके न होनेसे 'पुरुष' स्थिर नहीं रह सकता।
१० चरकसंहिता [ अ० १
सब स्थित हैं । यह सत्त्वादि समुदाय पुरुष कहलाता है, और वह चेतन द्रव्य
है, यही आयुर्वेद का अधिकरण है और इसी के लिये यह आयुर्वेद
प्रकाशित किया गया है ॥ ४६-४७ ॥
खादीन्यात्मा मनः कालो दिशश्च द्रव्यसंग्रहः ।
सेन्द्रियं चेतनं द्रव्यं निरिन्द्रियमचेतनम् ॥ ४८ ॥
आकाश आदि (आकाश, वायु, अग्नि, जल, पृथिवी—ये पांच महाभूत),
आत्मा, मन, काल, और दिशा ये द्रव्यों का संग्रह है । इन्द्रियों सहित द्रव्य
चेतन हैं और इन्द्रियों से रहित द्रव्य अचेतन हैं १ ॥ ४८ ॥
अत्र कर्म्मफलं चात्र ज्ञानं चात्र प्रतिष्ठितम् ।
अत्र मोदः सुखं दुःखं जीवितं मरणं स्वता ॥
पञ्चमहाभूतशरीरिसमवायः 'पुरुष' उच्यते । तस्मिन् क्रियाः । सोऽधिष्ठानम् ।
१. “पृथ्व्यापस्तेजोवायुराकाशं कालो दिगात्मा मन इति द्रव्याणि।” वैशे०
शरीरं हि गते तस्मिन् शून्यागारमचेतनम् ।
पञ्चभूतावशेषत्वात् पञ्चत्वं गतमुच्यते ॥ चरक ॥
“तत्र आकाशं शब्दगुणम्, शब्दस्पर्शगुणो वायुः शब्दस्पर्शरूपगुणोऽग्निः ।
शब्दस्पर्शरूपरसगुणा आपः, शब्दस्पर्शरूपरसगन्धगुणा पृथिवी ।
तेषामेकगुणः पूर्वे, गुणवृद्धिः परे परे ।
पूर्वपूर्वो गुणश्चैव क्रमश्रो गुणिषु स्मृतः ॥
आत्मा का रूप—
प्राणापानौ निमेषाद्या जीवनं मनसो गतिः ।
इन्द्रियान्तरसंचारः प्रेरणं धारणं च यत् ।
देशान्तरगतिः स्वप्ने पञ्चत्वग्रहणं तथा ।
दृष्टस्य दक्षिणेनाक्ष्णा सव्येनावगमस्तथा ॥
इच्छा द्वेषः सुखं दुःखं प्रयत्नश्चेतना धृतिः ।
बुद्धिः स्मृतिरहंकारो लिङ्गानि परमात्मनः ॥
मन का लक्षण—
आत्मेन्द्रियार्थसन्निकर्षे ज्ञानस्य भावोऽभावो मनसो लिङ्गमिति कणादः
लक्षणं मनसो ज्ञानस्याभावो भाव एव च ।
सति ह्यात्मेन्द्रियार्थानां सन्निकर्षेण वर्त्तते ।
वैधुत्यान्मनसो ज्ञानं सान्निध्याच्च वर्त्तते ॥ चरक ॥
अ० १ ] सूत्रस्थानम् ११
अ० १ ] सूत्रस्थानम् ११
गुण—
सार्था गुर्वादयो बुद्धिः प्रयत्नान्ताः परादयः ।
गुणाः प्रोक्ताः,
अर्थ ( इन्द्रिय और मन के ग्राह्य विषय ), गुरु आदि, बुद्धि, इच्छा से
लेकर प्रयत्न तक और पर आदि अभ्यास पर्यन्त गुण हैं ।
इन्द्रियों के अर्थ—शब्द, स्पर्श, रूप,रस और गन्ध—मन के अर्थ चिन्तन,
विचार, दुहना, ध्यान, संकल्प, गुरुत्व, लघुत्व, शीत, उष्ण, स्निग्ध रूक्ष, मन्द,
तीक्ष्ण, स्थिर, सर, मृदु, कठिन, विशद, पिच्छिल, श्लक्ष्ण, खर, स्थूल, सूक्ष्म,
सान्द्र, द्रव, ये बीस, तथा इच्छा, द्वेष, सुख दुःख और प्रयत्न, पर, अपर युक्ति,
संयोग, विभाग, पृथक्त्व, परिणाम, संस्कार और अभ्यास ये गुण हैं ।
“रूपरसगन्धस्पर्शाः संख्यापरिमाणानि पृथक्त्वं संयोगविभागौ परपरत्वे बुद्धयः
सुखदुखे इच्छा द्वेषौ प्रयत्नाश्च गुणाः ॥” वै० द०
कर्म—
प्रयत्नादि कर्म चेष्टितमुच्यते ॥ ४९ ॥
प्रयत्न जन्य चेष्टा शरीर का व्यापार कर्म कहाता है ।
उत्क्षेपणमपक्षेपणमाकुञ्चनं प्रसारणं गमनमिति कर्माणि ॥ वैशे०
भ्रमणं रेचनं स्पन्दनोर्ध्वज्वलनमेव च ।
तिर्यग् गमनमप्यत्र गमनादेव लभ्यते ॥
प्रयत्नपूर्वक अर्थात् चेष्टापूर्वक क्रिया का नाम 'कर्म' है ।
“आत्मसंयोगप्रयत्नाभ्यां हस्ते कर्म” ॥ वै० ॥ ४६ ॥
समवाय का लक्षण—
समवायोऽपृथग्भावो भूम्यादीनां गुणैर्मतः ।
स नित्यो,यत्र हि द्रव्यं न तत्रानियतो गुणः ॥ ५० ॥
पृथिवी आदि द्रव्यों का ( आत्रेय भद्रकाप्यीय २६ वें अध्याय में कहे हुए )
काल का लक्षण—सूक्ष्मामपि कलां न लीयते, संकलयति वा भूतानि इति
कालः । वैशे०
दिशा का लक्षण—अस्मादिदं पूर्वेण अस्मादिदं पश्चिमेन इत्यादयः प्रत्यया
यतो भवन्ति सा दिक् । इत इदमिति यतस्तद्दिशां लिङ्गम् । वैशे०
जिससे यह व्यवहार किया जाय कि यह इससे पूर्व या पश्चिम में है,
उसका नाम 'दिशा' है ।