चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
अ० १४ ] सूत्रस्थानम् १७९
अ० १४ ] सूत्रस्थानम् १७९
दल-करञ्जार्क-पत्रान्यतम-कृतया गजाग्र-हस्त-संस्थानया व्याम-दीर्घया
व्यामार्धदीर्घया वा व्यामचतुर्भागाष्टभागमूलाग्रपरिणाहस्रोतसा सर्वतो
वातहर-पत्र-संवृत-च्छिद्रया द्विस्त्रिर्वा विनामितया वातहर-सिद्ध-स्नेहा-
भ्यक्तगात्रो बाष्पमुपहरन्, बाष्पो ह्यनूर्ध्वगामी विहृत-चण्ड-वेगस्त्वच-
मविदहन् सुखं स्वेदयतीति नाडीस्वेदः ॥ ४३ ॥
( ३ ) नाड़ीस्वेद—पहिले कहे हुए स्वेदन द्रव्यों के मूल, फल, पत्र
और कोंपल और पशु, पक्षी इनका मांस, शिर, पांव आदि उष्ण स्वभावयुक्त
अथवा यथायोग्य अम्ल, लवण एवं स्नेह युक्त, आठों प्रकार के मूत्र, गौ
आदि के दूध और मस्तु को घड़े में बन्द करके इसके मुख को ढक्कन से बन्द
कर दे फिर इस को गरम करे । इस घड़े में शर, ईषीक आदि से बनी नलिका
( नली ) को लगाकर इसके द्वारा वातहर तैल से स्निग्ध पुरुष को स्वेद देना
चाहिये । नलिका का स्वरूप सरकण्डा का अगला भाग, पत्ता, बांस का पत्ता,
करंज का पत्ता, आक का पत्ता इन में से किसी की नलिका बनाले । नली
हाथी की सूंड के समान ऊपर से मोटी नीचे पतली मुख पर से गोल हो, तथा
व्याम अर्थात् पुरुष के दोनों हाथ फैला लेने पर इस लम्बाई के बराबर लम्बी,
अथवा आधे व्याम लम्बी, और जड़ से अग्र तक व्याम के चौथाई भाग घेर
में, वा व्याम का आठवां भाग होना चाहिये । और नाड़ी के चारों ओर
जितने भी छेद हों, उन सब को वातनाशक एरण्ड आदि के पत्तों से बन्द
करके दो या तीन बार टेढ़ी घूमा कर पात्र के मुख में लगी हुई नलिका से
बाष्प रोगी को देने चाहियें । दो तीन बार टेढ़ी-मेढ़ी घुमाने से बाष्प ऊपर
की ओर न जाकर, प्रबल वेग से त्वचा को न जलाता हुआ सुखपूर्वक स्वेदन
करता है ॥४३॥
वातिकोत्तरवातिकानां पुनर्मूलादीनामूत्क्वाथैः सुखोष्णैः कुम्भीर्व-
र्षणिकाः प्रनाडीर्वा पूरयित्वा यथार्हसिद्धस्नेहाभ्यक्तगात्रं वस्त्रावच्छन्नं
परिषेचयेदिति परिषेकः ॥ ४४ ॥
( ४ ) परिषेक स्वेद—वातनाशक एवं विशेष रूप से त्रिदोषनाशक द्रव्यों
के मूल, फल, पत्र, शुंग आदि को सुखदायक क्वाथ—जिसे शरीर सहन कर
सके इतने गरम क्वाथ को सच्छिद्र बर्तन के ढक्कन में छेद रखकर जिससे बाष्प
निकल सकें, अथवा बर्तन में नाली लगाकर यथायोग्य स्नेह से स्निग्ध शरीर
वाले मनुष्य को कपड़ों से सम्पूर्ण रूप में ढांप कर स्वेद देना चाहिये ॥४४॥
वातहरोत्क्वाथ-क्षीर-तैल-घृत-पिशित-रसोष्ण-सलिल-कोष्ठकावगाहस्तु
यथोक्त एवावगाहः ॥ ४५ ॥
१८० चरकसंहिता [ अ० १४
( ५ ) अवगाह स्वेद—वात नाशक द्रव्यों से क्वाथ, घी, तैल, मांस रस
गरम पानी बनाकर 'कोठी' लकड़ी का बना हुआ बड़ा पात्र जिसमें मनुष्य
बैठ सके उसमें बैठकर स्नान करना अवगाहन है ॥४५॥
अथ जेन्ताकं चिकीर्षुर्भूमिं परीक्षेत—तत्र पूर्वस्यां दिश्युत्तरस्यां
वा गुणवति प्रशस्ते भूमिभागे कृष्णमृत्तिके सुवर्णमृत्तिके वा परीवाप-
पुष्कारण्यादीनां जलाशयानामन्यतमस्य कूले दक्षिणे पश्चिमे वा
सूपतीर्थे सम-सुविभक्त-भूमि-भागे सप्ताष्टौ वाऽरत्नीरुपक्रम्योदकात्प्राङ्-
मुखमुदङ्मुखं वाऽभिमुखतीर्थं कूटागारं कारयेत्, उत्सेधविस्तारतः
परमरत्नीः षोडश, समन्तात्सुवृत्तं मृत्कर्मसंपन्नमनेकवातायनम्। अस्य
कूटागारस्यान्तः समन्ततो भित्तिमरत्निविस्तारोत्सेधां पिण्डिकां कार-
येदाकपाटात्, मध्ये चास्य कूटागारस्य चतुष्किष्कुमात्र-पुरुषप्रमाणं
मृन्मयं कुन्दसंस्थानं बहु-सूक्ष्म-च्छिद्रमङ्गार-कोष्ठक-स्तम्भं सपिधानं
कारयेत्, तं च खादिराणामाश्र्वकर्णादीनां वा काष्ठानां पूरयित्वा
प्रदीपयेत्, स यदा जानीयात्साधुदग्धानि काष्ठानि, विगतधूमान्यवतप्तं
च केवलमग्निना तदग्निगृहं स्वेदयोग्येन चोष्मणा युक्तमिति, तत्रैनं
पुरुषं वातहराभ्यक्तगात्रं वस्त्रावच्छन्नं प्रवेशयेत्, प्रवेशयंश्चैनमनु-
शिष्यात्—“सौम्य ! प्रविश कल्याणायऽऽरोग्याय चेति, प्रविश्य चैनां
पिण्डिकामधिरुह्य पार्श्वपरपार्श्वाभ्यां यथासुखं शयीथाः, न च त्वया
स्वेद-मूर्च्छा-परीतेनापि सता पिण्डकैषा विमोक्तव्याऽऽप्राणोच्छ्वासात्,
भ्रश्यमानो ह्यतः पिण्डिकावकाशाद् द्वारमनाधिगच्छन् स्वेद-मूर्च्छा-
परीततया सद्यः प्राणान् जह्याः, तस्मात्पिण्डिकामेनां न कथंचन मुञ्चेथाः,
त्वं यदा जानीया विगताभिष्यन्दमात्मानं सम्यक् प्रस्रुत-स्वेद-पिच्छं
सर्व-स्रोतो-विमुक्तं लघुभूतम्पगत-विबन्ध-स्तम्भ-सुप्ति-वेदना-गौरव-
मिति, ततस्तां पिण्डिकामनुसरन् द्वारं प्रपद्येथाः, निष्क्रम्य च न सहसा
चक्षुषोः परिपालनार्थं शीतोदकमुपस्पृशेथाः, अपगत-सन्ताप-क्लमस्तु
मुहूर्तात्सुखोषोणेन वारिणा यथान्यायं परिषिक्तोऽश्नीयाः—इति जेन्ताक-
स्वेदः ॥ ४६ ॥
( ६ ) जेन्ताक स्वेद—जेन्ताक स्वेद करने की इच्छा करने वाला वैद्य
सब से प्रथम भूमि की परीक्षा करे । इसके लिये मनुष्य के निवास स्थान से
पूर्व अथवा उत्तर दिशा में जो भूमि-प्रदेश ( वृक्ष आदि के उत्पन्न होने से )
प्रशस्त एवं गुणवान् तथा सुन्दर हो, काली मिट्टी वाला या स्वर्ण ( पीली