चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
अ० १७ ] सूत्रस्थानम् २०५
अ० १७ ] सूत्रस्थानम् २०५
हुआ प्रतीत होता है, शिर की सन्धियां फटती प्रतीत होती हैं, शिराओं के अन्दर
धड़कन विशेष ( स्पन्दन ) रूप से प्रतीत होती है, गर्दन जड़ बन जाती है,
इधर-उधर नहीं हिलाई जा सकती और स्निग्ध और उष्ण क्रिया आराम देत
प्रतीत होतो है । ये वातजन्य शिरोरोग के लक्षण हैं ॥१६-२१॥
कट्वम्ल-लवण-क्षार-मद्य-क्रोधातपानलैः ॥ २२ ॥
पित्तं शिरसि संदुष्टं शिरोरोगाय कल्पते ।
दह्यते रुज्यते तेन शिरः शीतं सुपूयते ॥ २३॥
दह्येते चक्षुषी तृष्णा भ्रमः स्वेदश्च जायते ।
आस्यासुखैः स्वप्नसुखैर्गुरु-स्निग्धातिभोजनैः ॥ २४ ॥
श्लेष्मा शिरसि संदुष्टः शिरोरोगाय कल्पते ।
शिरो मन्दरुजं तेन सुप्रस्तिमितभारिकम् ॥ २५ ॥
भवत्युत्पद्यते तन्द्रा तथाऽऽलस्यमरोचकम् ।
वाताच्छूलं भ्रमः कम्पः पित्ताद्दाहो मदस्तृषा ॥ २६ ॥
कफाद् गुरुत्वं तन्द्रा च शिरोरोगे त्रिदोषजे ।
तिल-क्षीर-गुडाजीर्ण-पूति-संकीर्ण-भोजनात् ॥ २७॥
क्लेदोऽसृक्कफ-मांसानां दोषमस्योपजायते ।
ततः शिरसि संक्लेदात्क्रिमयः पापकर्मणः ॥ २८॥
जनयन्ति शिरोरोगं जाता बीभत्सलक्षणम् ।
व्यथच्छेद-रुजा-कण्डू-शोफ-दौर्गन्ध्य-दुःखितम् ॥ २६ ॥
क्रिमिरोगातुरं विद्यात्क्रिमीणां लक्षणेन च ।
पित्तजन्य शिरोरोग—कडुवे, खट्टे, नमकीन, क्षार पदार्थों के सेवन से,
शराब के पीने से, क्रोध से, धूप से, आग से, पित्त शिर में कुपित होकर
शिरोरोग को उत्पन्न करता है । इससे शिर में जलन और पीड़ा होती है, तथा
शीत उपचार अनुकूल पड़ता है । आंखें जलती हैं, प्यास होती है, चक्कर आता
है, और पसीना आता है । कफजन्य शिरोरोग में निरुद्योगी आलस्य का सुख-
मय जीवन व्यतीत करना, दिन में सोना, गुरु, भारी और स्निग्ध घी आदि
युक्त पदार्थों के अतिभोजन से; श्लेष्मा अर्थात् कफ शिर में कुपित होकर शिरो-
रोग को उत्पन्न करता है । इससे शिर में धीमी २ वेदना होती है, शिर सोया
हुआ सा प्रतीत होता है, शिर जड़ हो जाता है, भारी हो जाता है । तन्द्रा, कार्य में
अनिच्छा, आलस्य और भोजन में अरुचि उत्पन्न हो जाती है । त्रिदोषजन्य
शिरोरोग— वात के कारण चक्कर आना और कम्पन, पित्त के कारण जलन,
मूर्च्छा और प्यास, कफ के कारण भारीपन, और तन्द्रा, त्रिदोष जन्य शिरोरोग
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में होती है। कृमि जन्य शिरोरोग—तिल, दूध, गुड़ इनके अधिक सेवन से,
अजीर्ण और दुग्धयुक्त सड़ा गला भोजन करने से, संकीर्ण ( बहुत गड़बड़
चीजें मिलाकर) भोजन करने से शिर के वातादि दोष बढ़कर शिर में रक्त,
कफ और मांस को दूषित बनाकर रोग उत्पन्न करते हैं। पाप करनेवाले
पुरुष के शिर में इस क्लेद से कीड़े उत्पन्न होकर बीभत्स अर्थात् घृणाजनक
भयंकर शिरोरोग उत्पन्न करते हैं। इससे काटने, छेदने, के समान पीड़ा, खाज,
सूजन, दुर्गन्ध और बहुत अधिक कष्ट होता है। इन लक्षणों को तथा कृमियों
को देखकर कृमिरोग समझना चाहिये ॥ २२–२६॥
पांच प्रकार के हृदयरोग—
शोकोपवास-व्यायाम-शुष्क-रूक्षालप-भोजनैः ॥ ३० ॥
वायुराविश्य हृदयं जनयत्युत्तमां रुजम् ।
वेपथुर्वेष्टनं स्तम्भः प्रमोहः शून्यता दरः ॥ ३१ ॥
हृदि वातातुरे रूपं जीर्णे चात्यर्थवेदना ।
उष्णाम्ल-लवण-क्षार-कटुकाजीर्ण-भोजनैः ॥ ३२ ॥
मद्यक्रोधातपेश्चाशु हृदि पित्तं प्रकुप्यति ।
हृद्दाहस्तिक्तता वक्त्रे तिक्ताम्लोद्गिरणं क्लमः ॥ ३३ ॥
तृष्णा मूर्च्छा भ्रमः स्वेदः पित्त-हृद्रोगलक्षणम् ।
अत्यादानं गुरुस्निग्धमचिन्तनमचेष्टनम् ॥ ३४ ॥
निद्रासुखं वाप्यधिकं कफहृद्रोगकारणम् ।
हृदयं कफहृद्रोगे सुप्त-स्तिमितभारिकम् ॥ ३५ ॥
तन्द्रा-रुचि-परीतस्य भवत्यश्मावृतं यथा ।
हेतु-लक्षण-संसर्गादुच्यते सान्निपातिकः ॥ ३६ ॥
( हृद्रोगः कष्टदः कष्टसाध्य उक्तो महर्षिभिः )
त्रिदोषजे तु हृद्रोगे यो दुरात्मा निषेवते ।
तिल-क्षीर-गुडादीनि ग्रन्थिस्तस्योपजायते ॥ ३७ ॥
मर्मैकदेशे संक्लेदं रसश्चास्योपगच्छति ।
संक्लेदात्कृमयश्चास्य भवन्त्युपहतात्मनः ॥ ३८ ॥
मर्मैकदेशे संजाताः सर्पन्तो भक्षयन्ति च ।
तुद्यमानं स हृदयं सूचीभिरिव मन्यते ॥ ३९ ॥
छिद्यमानं यथा शस्त्रैर्जात-कण्डू-महारुजम् ।
हृद्रोगं क्रिमिजं त्वेतैर्लिङ्गैर्बुद्ध्वा सुदारुणम् ।
त्वरेत जेतुं तं विद्वान् विकारं शीघ्रकारिणम् ॥४०॥