चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
अ० २३ ] सूत्रस्थानम् २६५
अ० २३ ] सूत्रस्थानम् २६५
उक्तं संतर्पणोत्थानामपतर्पणमौषधम् ।
वक्ष्यन्ते सौषधाश्चोर्ध्वमपतर्पणजा गदाः ॥ २६ ॥
देहाग्नि-बल-वर्णौजः-शुक्र-मांस-बल-क्षयः ।
ज्वरः कासानुबन्धश्च पार्श्वशूलमरोचकः ॥ २७ ॥
श्रोत्रदौर्बल्यमुन्मादः प्रलापो हृदयव्यथा ।
विण्मूत्रसंग्रहः शूलं जङ्घोरुत्रिकसंश्रयम् ॥ २८ ॥
पर्वास्थिसंधिभेदश्च ये चान्ये वातजा गदाः ।
ऊर्ध्ववातादयः सर्वे जायन्ते तेऽपतर्पणात् ॥ २९ ॥
तेषां संतर्पणं तज्ज्ञैः पुनराख्यातमौषधम् ।
यत्तदात्वे समर्थं स्यादभ्यासे वा तदिष्यते ॥ ३० ॥
सद्यः क्षीणो हि सद्यो वै तर्पणेनोपचीयते ।
नर्ते सन्तर्पणाभ्यासाच्चिरक्षीणस्तु पुष्यति ॥ ३१ ॥
देहाग्नि-दोष-भैषज्य-मात्रा-कालानुवर्तिना ।
कार्यमत्वरमाणे न भेषजं चिरदुर्बले ॥ ३२ ॥
हिता मांसरसास्तस्मै पयांसि च घृतानि च ।
स्नानानि बस्तयोऽभ्यङ्गास्तर्पणास्तर्पणाश्च ये ॥ ३३ ॥
ज्वर-कास-प्रसक्तानां कृशानां मूत्रकृच्छ्रिणाम् ।
तृष्यतामूर्ध्ववातानां हितं वक्ष्यामि तर्पणम् ॥ ३४ ॥
शर्करा-पिप्पली-मूल-घृत-क्षौद्रैः समांशकैः ।
सक्तुद्विगुणितो वृष्यस्तेषां मन्थः प्रशस्यते ॥ ३५ ॥
सक्तवो मदिरा क्षौद्रं शर्करा चेति तर्पणम् ।
पिबेन्मारुतविण्मूत्रकफपित्तानुलोमनम् ॥ ३६ ॥
फाणितं सक्तवः सर्पिर्दधि-मण्डोऽम्ल-काञ्जिकम् ।
तर्पणं मूत्रकृच्छ्रघ्नमुदावर्तहरं पिबेत् ।
मन्थः खर्जूरमृद्वीका-वृक्षाम्लाम्लीक-दाडिमैः ।
परूषकैः सामलकैर्युक्तो मद्यविकारनुत् ॥ ३८ ॥
स्वादुरम्लो जलकृतः सस्नेहो रूक्ष एव वा ।
सद्यः संतर्पणो मन्थः स्थैर्यवर्णबलप्रदः ॥ ३९ ॥
सन्तर्पण से उत्पन्न रोगों की औषध कह दी, अब अपतर्पण को कहते हैं,
तथा अपतर्पण जन्य रोग और उनकी औषध भी कहते हैं—अपतर्पण से ज्वर,
कास एवं कास सम्बन्धी विकार, बल, कान्ति, ओज, शुक्र और मांस का क्षय,
कर्णेन्द्रिय की निर्बलता, उन्माद, प्रलाप, हृदय-पीड़ा, मल-मूत्र का अवरोध,
२६६ चरकसंहिता [ अ० २३
जंघा, ऊरु और त्रिक ( कटि के नीचे ) प्रदेश में दर्द, पर्व, अस्थि और
सन्धियों का टूटना, और अन्य वातजन्य रोग यथा ऊर्ध्ववात ( वायु का ऊपर
चढ़ना ) आदि रोग अपतर्पण के कारण उत्पन्न होते हैं। अपतर्पण से उत्पन्न
इन रोगों के लिये संतर्पण क्रिया औषध है। सन्तर्पण क्रिया दो प्रकार की है।
यथा—सद्यः सन्तर्पण और अभ्यास ( क्रमशः शनैः शनैः ) सन्तर्पण। जो मनुष्य
सहसा एकदम से क्षीण होता है, वह सद्यः सन्तर्पण क्रिया से पुष्ट होता है और
देर से क्षीण हुआ पुरुष बिना अभ्यास जन्य सन्तर्पण के पुष्ट नहीं होता। जो
पुरुष देर से निर्बल हो, उसमें शरीर जाठराग्नि, दोष, औषध बल, मात्रा और
समय का विचार करके शान्ति से ( जल्दी न करके ) चिकित्सा करनी चाहिये।
इस प्रकार के रोगी के लिये मांस, रस, दूध, घी, स्नान, बस्तियां, मर्दन,
सन्तर्पण करने वाले मन्थ आदि प्रयोग करने चाहिये।
ज्वर, कास के रोगियों के लिये, निर्बलों के लिये, मूत्रकृच्छ्र रोगियों के
लिये, प्यास रोगवालों के लिये, ऊर्ध्ववात रोगियों के लिये, हितकारी तर्पण
क्रिया का उपदेश करते हैं—शर्करा, पिप्पलीमूल, घी और शहद ये समान भाग
लेकर इन सब से दुगुना सत्तू लेकर मन्थ बनाये। सत्तू, मदिरा, शहद और
शर्करा इनसे मन्थ तैयार करके वायु, मल, मूत्र के अनुलोमन ( अधोमार्ग से
बाहर करने के लिये ) और कफ, पित्त को अनुकूल करने के लिये प्रयोग करना
चाहिये। फाणित ( राव ) सत्तू, घी, दधिमण्ड और धान्याम्ल कांजी, इनसे
बना मन्थ मूत्रकृच्छ्र नाशक और उदावर्त्त रोग को नष्ट करने वाला तर्पण है।
खजूर, मुनक्का, इमली, कोकम, अनारदाना, फालसा और आंवला उनसे बना
हुआ मन्थ मदिरा के विकार को नष्ट करता है। खट्टे और मीठे (अनारदाना )
पदार्थों से पानी में बना और घी युक्त या बिना घी के बना हुआ मन्थ सद्यः
सन्तर्पण है और स्थिरता, वर्ण कान्ति और बल को देता है ।। २६-३६ ॥
तत्र श्लोकः—संतर्पणोत्था ये रोगा रोगा ये चापतर्पणात् ।
संतर्पणीये तेऽध्यायं सौषधाः परिकीर्तिताः ॥ ४० ॥
सन्तर्पण और अपतर्पण से उत्पन्न जो जो रोग हैं उनको तथा उनकी
औषध को इस सन्तर्पणीय अध्याय में कह दिया ॥ ४० ॥
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते सूत्रस्थाने योजनाचतुष्के
सन्तर्पणीयो नाम त्रयोविंशतितमोऽध्यायः ॥ २३ ॥