चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
अ० १ ] निदानस्थानम् ४११
अ० १ ] निदानस्थानम् ४११
सम्प्राप्ति—उपरोक्त कारणों से कुपित हुआ वायु उष्णिमा के स्थान आमा-
शय में पहुंच जाता है। वहां उष्णिमा के साथ मिलता है। फिर अन्न के
पाचन से उत्पन्न 'रस' नाम के धातु का आश्रय लेता है। इस धातु का आश्रय
लेकर वायु रसवह और स्वेदवह स्रोतों को बन्द कर देता है, जठराग्नि को मन्द
कर देता है और आमाशय से पाचकाग्नि को बाहर निकाल कर सम्पूर्ण शरीर
में फैला देता है, इस लिये ज्वर उत्पन्न होता है। इस वातज्वर के निम्न लिखित
लक्षण होते हैं ॥
तद्यथा-विषमारम्भविसर्गित्वम्, ऊष्मणो वैषम्यं, तीव्रतनुभावान-
वस्थानानि ज्वरस्य, जरणान्ते दिवसान्ते निशान्ते धर्मान्ते वा ज्वराभ्या-
गमनमभिवृद्धिर्वा ज्वरस्य। विशेषेण परुषारुणवर्णत्वं नख-नयन-वदन-
मूत्र-पुरीष-त्वचामत्यर्थं कृशीभावश्च, अनेकविधोपमाश्चलाचलाश्च वेदना-
स्तषां तेषामङ्गावयवानां, तद्यथा-पादयोः सुप्तता, पिण्डिकयोद्वेष्टनं,
जानुनोः केवलानां च सन्धीनां विश्लेषनमूर्वोः सादः, कटि-पार्श्व-पृष्ठ-स्कन्ध-
बाह्वंसोरसां च भग्न-रुग्ण-मृदित-मथित-चटितावपीडितावन्नग्नत्वमिव,
हन्वोश्चाप्रसिद्धिः, स्वनश्च कर्णयोः, शङ्खयोर्निस्तोदः, कषायास्यताऽऽस्य-
वैरस्यं वा, मुख-तालु-कण्ठ-शोषः, पिपासा, हृदयग्रहः, शुष्कच्छर्दिः,
शुष्ककासः, क्षवथूद्गारविनिग्रहोऽन्नरसखेदः, प्रसेकारोचकाविपाकाः,
विषाद-विजृम्भा-विनाम-वेपथु-श्रम-भ्रम-प्रलाप-जागरण-रोमहर्ष-दन्तह-
र्षास्तथोष्णाभिप्रायता, निदानांक्तानामनुपशयो विपरीतोपशयश्चेति वात-
ज्वरस्य लिङ्गानि स्युः ॥ १० ॥
वातज्वर के लक्षण - जैसे ज्वर के चढ़ने या उतरने के समय का नियम
न होना, शरीर में उष्णिमा का नियम न होना, ज्वर की तीव्रता या कम होने
की प्रतीति में अस्थिरता, अन्न के पचन होने के समय, सायंकाल में, अथवा
वर्षा ऋतु के प्रारम्भ में ज्वर का आना, अथवा ज्वर में वृद्धि होना; विशेषतः
नख, आंख, मूत्र, मल, और त्वचा का बहुत कठिन और काला-लाल रंग
पड़ना, मलमूत्र का अवरोध, (नख-त्वचा आदि का फटना ), भिन्न-भिन्न
अंगो में नाना प्रकार की चल और अचल ( गतिशील या स्थिर ) पीड़ाओं का
होना। जैसे-दोनों पांवों में सो जाने की सी प्रतीति, पिण्डलियों में ऐंठन,
घुटने एवं सम्पूर्ण सन्धियों में टूटने और गीले कपड़े से ढांपे होने की भांति
की दर्द जंघाओं में शिथिलता; कमर, पार्श्व-पीठ-स्कन्ध-बाहु और छाती में
टूटने के समान, फटने के समान, मर्दन करने के समान, चटकने के समान,
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अवपीडन अर्थात् दबाने के समान और सूइयां चुभने के समान वेदनायें
होती हैं। हनुग्रह (जबड़े का न खुलना), कानों में आवाज़ (कर्णनाद)
कान एवं शंख प्रदेश (कनपटी) में वेदना, मुख का कषाय स्वाद, मुख में
विरसता, मुख, तालु, कण्ठ का पुन: २ सूखना; प्यास का अधिक लगना, दिल
या छाती का जकड़ना, रुक जाना, सूखी उबकाई, वमन होने पर वमन में
किसी पदार्थ का बाहर न निकलना, सूखी खांसी, छींक और डकार का बन्द
हो जाना; सब अवसरों में अनिच्छा (अथवा अन्न रस का वमन); मुख से
पानी का बहना; अरुचि, भोजन की अनिच्छा, अविपाक (भोजन का न
पचना), विषाद, जम्भाईयां आना, अंगों का मुड़ना-तुड़ना, अंगड़ाईं आना,
कम्पन, प्रलाप, जागरण (नींद का न आना), रोमों का भर-भरा आना
(दान्तों का स्तम्भ हो जाना) गरम वस्तुओं को चाह; एवं वातज्वर के निदा-
नभूत वस्तुओं का सेवन अनुकूल न आना तथा निदान (रूक्ष लघु, शीतादि
गुणों) के विपरीत गुणों वाले पदार्थों को अनुकूल आना ये सब वातज्वर के
लक्षण हैं ॥ १० ॥
उष्णाम्ल-लवण-क्षार-कटुकाजीर्ण-भोजनेभ्योऽतिसेवितेभ्यस्तथाऽति-
तीक्ष्णातपाग्नि-सन्ताप-श्रम-क्रोध-विषमाहारेभ्यश्च पित्तं प्रकोपमापद्यते ।
पित्त प्रकोप के कारण—उष्ण, खट्टा, नमकीन, क्षार, कटु और अजीर्ण-
कारक पदार्थों के अतिसेवन से; तथा अतितीक्ष्ण, बहुत धूप, अग्निसन्ताप, श्रम,
क्रोध, विषम भोजन के सेवन से पित्त प्रकुपित होता है ।
तद्यदा प्रकुपितमामाशयादूष्माणमुपसृज्याऽऽद्यमाहारपरिणामधातुं
रसनामानमन्ववेत्य रसस्वेदवहानि स्रोतांसि पिधाय द्रवत्वादग्निमुप-
हत्य पक्तिस्थानादूष्माणं बहिर्निरस्य प्रपीडयत्केवलं शरीरमनुप्रपद्यते
तदा ज्वरमभिनिर्वर्तयति; तस्येमानि लिङ्गानि भवन्ति ।
पित्तज्वर की सम्प्राप्ति-यह प्रकुपित हुवा पित्त आमाशय में स्थित उष्णिमा
से मिलकर, अन्न के पाचन से उत्पन्न प्रसाद नामक रस से मिलकर रसवह
और स्वेदवह स्रोतों को बन्द कर देता है और पित्त द्रव होने से अग्निको
मन्द करता है, इसलिये पक्वाशय से उष्णिमा को बाहर निकाल देता है, तब
पित्त सम्पूर्ण शरीर में व्याप्त होकर शरीर को पीड़ित करता है। इस प्रकार से
ज्वर को उत्पन्न करता है। पित्त ज्वर के लक्षण ये होते हैं ॥
तद्यथा-युगपदेव केवले शरीरे ज्वरस्याभ्यागमनमभिवृद्धिश्च भुक्तस्य
विदाहकाले मध्यन्दिनेऽर्धरात्रे शरदि वा बिशेषेण, कटुकास्यता