चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
अ० २७] सूत्रस्थानम् ३६७
अ० २७] सूत्रस्थानम् ३६७
कारक, अग्निवर्धक, हृद्य, आँखों के लिये हितकारी, अविदाही, त्रिदोषनाशक,
कुछ मधुर और सब नमकों में श्रेष्ठ है।
सौवर्चल नमक (संचल नमक)—सूक्ष्म, उष्ण, कटु होने से तथा सुगन्धि
होने से रुचिदायक, विबन्धनाशक, हृद्य, उद्गार (डकार) को शोधन करने
वाला है। विड (काला नमक)—तीक्ष्ण, उष्ण और व्यवायी (शरीर में फैलने
वाला होने से) अग्निदीपक, शूलनाशक, एवं वायु को ऊपर या नीचे, अधोमार्ग
दोनों से अनुलोमन करने वाला है। उद्भिद् नमक-तिक्त, कटु, क्षारयुक्त,
तीक्ष्ण उत्क्लेदि अर्थात् वमन की रुचि करने वाला है। काले लवण के गुण
संचल नमक के समान हैं, परन्तु इस में संचल के समान गन्ध नहीं होती।
समुद्र के पानी से तैयार किया नमक मधुर है। पांशुज (सज्जी) जिससे धोबी
कपड़ा धोते हैं, ऐसी मिट्टी से तैयार किया नमक कटु और तिक्त होता है। सब
प्रकार के नमक रुचिकारक, अन्न या व्रण को पकाने वाले; संस्री और वात-
नाशक हैं।
जौ-क्षार—हृदय, पाण्डु, ग्रहणी रोग, प्लीहा, आनाह, गलरोग, कफजन्य
कास और अर्शरोग को नष्ट करते हैं। सब प्रकार के क्षार (टंकण, सज्जी,
पापड़ खार आदि) तीक्ष्ण, उष्ण, लघु, रूक्ष, क्लेदि, अन्न और व्रण को पकाने
वाले, पके हुए व्रण को फाड़ने वाले, जलाने वाले, अग्निवर्द्धक, कफ आदि का
छेदन करने वाले अग्नि के समान गुण वाले (उष्ण) होते हैं। कारवी (काला
जीरा,) कुंचीका (मोटा जीरा) ये रुचिकर अग्नि-दीपक, वात, कफ, दुर्गन्ध
को नाश करने वाले हैं। खान पान में किन किन द्रव्यों का व्यवहार होता है या
होना चाहिये इसका निश्चय करना कठिन है, कोई एक नियम नहीं बन सकता,
क्योंकि प्रत्येक मनुष्य की रुचि भिन्न भिन्न है। यह बारहवां आहारयोगी द्रव्यों
का वर्ग भी समाप्त हुआ ॥ २४४-३०६ ॥
इत्याहारयोगिवर्गः ।
शूकधान्यं शमीधान्यं समातीतं प्रशस्यते ।
पुराणं प्रायशो रूक्षं प्रायेणाभिनवं गुरु ॥ ३०७ ॥
यद्यदागच्छति क्षिप्रं तत्तल्लघुतरं स्मृतम् ।
निस्तुषं युक्तिसृष्टं तु सुप्यं लघु विपच्यते ॥ ३०८ ॥
शूकधान्य (चावल, गेहूँ आदि), शमीधान्य (मूंग, मसूर, उड़द
आदि) ये एक साल पुराने प्रशस्त हैं। प्रायः करके पुराने धान्य रूक्ष होते हैं।
जो धान्य बोने पर जल्दी उग आता है (जैसे ग्रीष्म ऋतु के साठी चावल )
वह हल्का होता है और मूंग आदि दाल की वस्तुओं को सुस्वेदित करके
छिलका उतारकर थोड़ा भून लिया जावे तो ये लघु हो जाते हैं ॥ ३०७-३०८ ॥
मृतं कृशातिमेद्यं च वृद्धं बालं विषैर्हतम् ।
अगोचरमृतं व्याडसूदितं मांसमुत्सृजेत् ॥ ३०९ ॥
अतोऽन्यथा हितं मांसं बृंहणं बलवर्धनम् ।
प्रीणनः सर्वधातूनां हृद्यो मांसरसः परम् ॥ ३१० ॥
शुष्यतां व्याधिमुक्तानां कृशानां क्षीणरेतसाम् ।
बलवर्णार्थिनां चैव रसं विद्याद्यथाऽमृतम् ॥ ३११ ॥
सर्वरोगप्रशमनं यथास्वं विहितं रसम् ।
विद्यात्स्वयं बलकरं वयोबुद्धीन्द्रियायुषाम् ॥ ३१२ ॥
व्यायामनित्याः स्स्रीनित्या मद्यनित्याश्च ये नराः ।
नित्यं मांसरसाहारा नाऽऽतुराः स्युन दुर्बलाः ॥ ३१३ ॥
त्याज्य मांस— मरा हुआ, कृश दुर्बल प्राणी का, बहुत चर्बी वाला, बूढ़े
पशु का, बालक का, विष द्वारा मारा, अगोचरमृत अर्थात् अपने स्वाभाविक
स्थान को छोड़कर दूसरे प्रदेश में पले ( जलीय देश के प्राणी को मरुस्थल में
पोषण करने पर ), व्याड अर्थात् व्याघ्र या सांप आदि हिंसक पशुओं से मारे
हुए पशु का मांस त्याज्य है। इससे विपरीत प्रकार का मांस हितकारी, शरीर
का पोषक, बलकारक है। मांस रस, पुष्टिदायक, सब प्राणियों के लिये हितकारी,
हृदय को प्रिय होता है। सूखते हुए, कृश होते हुए, रोग से उठे हुए, निर्बल,
शुक्र जिनका क्षीण हो गया है, बल या कान्ति को चाहने वाले पुरुषों के लिये
मांस रस अमृत के समान है। मांस रस सब रोगों को शान्त करने वाला है,
स्वर के लिये उत्तम, आयुवर्धन, बुद्धि और इन्द्रियों के लिये हितकारी एवं
बलकारक है। जो पुरुष नित्य प्रति व्यायाम करते, स्त्री संग करते, शराब
पीते हैं और नित्य प्रति मांस रस का सेवन करते हैं, वे न रोगी होते और न
निर्बल होते हैं ॥ ३०९-३१३ ॥
कृमिवातातपहृतं शुष्कं जीर्णमनातर्वम् ।
शाकं निःस्नेहसिद्धं च वर्ज्यं यच्चापरिस्रुतम् ॥ ३१४ ॥
पुराणमामं संक्लिष्टं कृमिव्याडहिमातपैः ।
अदेशकालजं क्लिन्नं यत्स्यात्तच्छमसाधु तत् ॥ ३१५ ॥
- उन्माद रोग में मांस का निषेध है—यथा 'उन्मादे पिशुतामिक्षाशी चा'