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सर्वकोश
चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

पृष्ठ 26, कुल 639 में से

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पृष्ठ 26

८ चरकसंहिता [ अ० १
हित, अहित, सुख और दुःख यह चार प्रकार की 'आयु' है। इस आयु
का हित-अहित, पथ्यापथ्य, और इस आयु का मान-परिमाण यह सब जिस
शास्त्र में कहा हो, तथा आयु का लक्षण जिसमें हो, उसे 'आयुर्वेद'१ कहते हैं।
हित आयु, अहित आयु, सुखी आयु, दुःखी आयु, चार प्रकारकी आयु है ॥४१॥
आयु का लक्षण—
शरीरेन्द्रियसत्त्वात्मसंयोगो, धारि जीवितम् ।
नित्यगश्चानुबन्धश्च पर्यायैरायुरुच्यते ॥ ४२ ॥
(शरीर) पंच महाभूतों से बना, आत्मा का अधिष्ठान, (इन्द्रिय) भौतिक
इन्द्रियां, (सत्त्व) मन, (आत्मा) द्रष्टा, भोक्ता, जीव और ईश्वर, इनके
संयोग का नाम 'आयु' है। आयु निरन्तर चलने वाला होने से 'आयु' कहाता
है [ एति गच्छतोति आयुः । ]
आयु अर्थात् जीवन के पर्यायवाची शब्द—(धारि) शरीर को धारण
करता है, (जीवित) प्राणों को धारण करता है, (नित्यग) निरन्तर चलता
है, (अनुबन्ध) प्राणों के साथ सम्बन्धित है, और 'चेतनानुवृत्ति' इन पर्यायों
से बतलाया जाता है२ ॥ ४२ ॥
तस्याऽऽयुषः पुण्यतमो वेदो वेदविदां मतः ।
वक्ष्यते यन्मनुष्याणां लोकयोरुभयोर्हितम् ॥ ४३ ॥
यह आयुर्वेद सब से अधिक श्रेष्ठ पुण्यजनक है [ क्योंकि अन्य ज्ञान पार-
लौकिक हित को ही बतलाते हैं ] यह आयुर्वेद इहलोक और परलोक दोनों के
हितों को कहता है, ऐसा ज्ञानियों का मत है३ ॥ ४३ ॥
सामान्य और विशेष—
सर्वदा सर्वभावानां सामान्यं वृद्धिकारणम् ।
ह्रासहेतुर्विशेषश्च प्रवृत्तिरुभयस्य तु ॥ ४४ ॥
सामान्यमेकत्वकरं विशेषस्तु पृथक्त्वकृत् ।
तुल्यार्थता हि सामान्यं विशेषस्तु विपर्ययः ॥ ४५ ॥
सब पदार्थों का सब कालों में 'सामान्य'—समान [ गुण आदि ] धर्म ही
वृद्धिका कारण होता है, और 'विशेष'—अर्थात् विभेद या विपरीत होना ही
ह्रास का कारण होता है। दोनों का शरीर के साथ सम्बन्ध सब पदार्थों की
१—“आयुरस्मिन्विन्दति वेत्ति वा आयुर्वेदः ।” सुश्रुत ॥
२—तत्रायुश्चेतनानुवृत्तिः जीवितमनुबन्धो धारि चेत्येकार्थः ॥ सु० ॥
३—अत्राऽऽयत्तमैहिकमामुष्मिकं च श्रेयः ॥ सुश्रुत० ॥