चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
अ० २ ] ३२ विमानस्थानम् ४३७
अ० २ ] ३२ विमानस्थानम् ४३७
राशि के साथ मिलकर इस आहार राशि को उदर के एक भाग में रोक देते हैं
अथवा सहसा ऊपर या नीचे के ( ऊर्ध्व या अधः ) मार्गों से बाहर निकालने
लगते हैं। अधिक खानेवाले, पुरुष में भिन्न २ नाना रोग पृथक् २ रूप से
उत्पन्न करते हैं ॥ ६-१० ॥
तत्र वातः शूलानाहाङ्गमर्द-मुखशोष-मूर्च्छा-भ्रमाग्निवैषम्य-सिरासं-
कोचन-संस्तम्भनानि करोति । पित्तं पुनर्ज्वरातीसारमन्तर्दाहं तृष्णा-
मदभ्रमप्रलपनानि । श्लेष्मा तु छर्द्यरोचकाविपाकशीतज्वरालस्यगात्रगौ-
रवाभिनिर्वृत्तिकरः संपद्यते ॥ ११ ॥
वायु, शूल, अफारा, अंगमर्द (अंगों का टूटना), मुख का शुष्क
होना, मूर्च्छा, भ्रम, अग्नि की विषमता, पार्श्वग्रह, पृष्ठग्रह, कटिग्रह, शिराओं का
आकुञ्चन (संकोच) और स्तम्भन (जड़ता), इन विकारों को उत्पन्न करता है।
पित्तज्वर, अतिसार, अन्तर्दाह (शरीर में जलन), तृष्णा, मद, भ्रम और
प्रलाप को उत्पन्न करता है और कफ छर्दि (वमन), अरुचि, अविपाक,
शीतज्वर, आलस्य और शरीर में भारीपन पैदा करता है ॥ ११ ॥
न खलु केवलमतिमात्रमेवाऽऽहारराशिमामप्रदोषकरमिच्छन्ति, अपि
तु खलु गुरु-रूक्ष-शीत-शुष्क-द्विष्ट विष्टम्भि-विदाह्यशुचि-विरुद्धनामकाले
चान्नपानानामुपसेवनं, काम-क्रोध-लोभ-मोहेर्ष्या-ह्री-शोक-मानोद्वेग-भयो-
पतप्तेन मनसा वा यदन्नपानमुपयुज्यते तदप्या ममेव प्रदूषयति ॥१२॥
कुशल वैद्य केवल आहार राशि की अतिमात्रा को ही आमदोष का कारण
नहीं मानते। किन्तु प्रकृति से भारी, रूक्ष, शीत, शुष्क, द्वेषयुक्त (मन के प्रति-
कूल), विष्टम्भी (वायु, दर्द के होने पर भी मल का न आना), दाह (जलन)
करने वाले, अपवित्र, प्रकृति, संस्कार, राशि में विरोधी खान-पान का सेवन
अथवा हितकारी अन्न को भी अनुचित काल में वा वमन, क्रोध, लोभ, मोह,
ईर्ष्या, लज्जा, शोक, मन के उद्वेग, भय आदि अवस्था में किया हुआ अन्न-पान
भी आम को ही दूषित करता है ॥ १२ ॥
भवति चात्र—मात्रयाऽप्यभ्यवहृतं पथ्यं चान्नं न जीर्यति ।
चिन्ता-शोक-भय-क्रोध-दुःख-शय्या-प्रजागरैः ॥ १३ ॥
तं द्विविधमामप्रदोषमाचक्षते भिषजो विसूचिकामलसकं च ।
तत्र विसूचिकामूर्ध्वं चाधश्च प्रवृत्तामदोषां यथोक्तरूपां विद्यात् ॥१४॥
हितकारी, पथ्य अन्न मात्रा से खाने पर भी चिन्ता, शोक, भय, क्रोध,
दुःख, शय्या में सोने, रात्रि में जागने से जीर्ण नहीं होता है। इस आम-
४६८ चरकसंहिता [ अ० २
प्रदोष ( भोजन के इस प्रकार न पचने ) को वैद्य दो प्रकार का मानते हैं ।
( १ ) विसूचिका और ( २ ) अलसक । इन में विसूचिका के अन्दर आम
दोष ( भोजन का न पचा अंश ) ऊपर और नीचे दोनों मार्गों से बाहर
निकलता है ॥ १३-१४ ॥
अलसकमुपदेक्ष्यामः—दुर्बलस्याल्पाग्नेर्बहुश्लेष्मणो वात-मूत्र-पुरीष-
वेग-विधारिणः स्थिर-गुरु-बहु-रूक्ष-शीत-शुष्कान्नसेविनस्तदन्नपानमनि-
लप्रपीडितं श्लेष्मणा च विबद्धमार्गमतिमात्रलीनमलसत्वान्न बहिर्मुखी
भवति, ततश्छर्द्यतीसारवर्ज्यान्यामप्रदोषलिङ्गानि यथोक्तान्यभिदर्शय-
त्यतिमात्राणि । अतिमात्रप्रदुष्टाश्च दोषाः प्रदुष्टामबद्धमार्गास्तिर्यग्गच्छ-
न्तः कदाचित्केवलमेवास्य शरीरं दण्डवत्स्तम्भयन्ति, ततस्तमलसकम-
साध्यं ब्रुवते ॥ १५ ॥
अलसक का उपदेश करते हैं--दुर्बल, अल्पाग्नि, बहुत कफयुक्त, वात
आदि के वे के स्वभाव के, स्थिर, गुरु, बहुत, रूक्ष, शीत, शुष्क
इस प्रकार के अन्न को सेवन करने वाले पुरुष में वायु खान-पान को पीड़ित
करता है और कफ से मार्ग रुके होने से वह बाहर नहीं निकलता । यही
आमाशय में बहुत अधिक मात्रा में व्याप्त हो जाता है । और आलस्य
( मन्दता ) के कारण बाहर भी नहीं आता । इसलिये इस को 'अलसक' कहते
हैं । बाहर न होने से वमन और अतिसार को छोड़कर शेष अन्य आमदोष के
लक्षण बहुत अधिक मात्रा में स्पष्ट होते हैं ।
असाध्य अलसक—बहुत अधिकमात्रा में दूषित हुए वात आदि दोष
दुष्ट आम-द्वारा मार्गों के रुक जाने पर तिरछे गति करते हुए कभी अकस्मात्
इस बहुत खाने वाले पुरुष के सम्पूर्ण शरीर को दण्डे की भांति स्तब्ध कर
( जकड़ ) देते हैं । इसलिये इस अलसक को असाध्य कहते हैं ॥ १५ ॥
विरुद्धमध्यशनाजीर्णाशनशीलिनः पुनरामदोषमामविषमित्याचक्षते
भिषजो विषसदृशलिङ्गत्वात् । तत्परमसाध्यमाशुकारित्वाद्विरुद्धोप-
क्रमत्वाच्चेति ॥ १६ ॥
विरुद्ध भोजी, अध्यशन ( खाने के ऊपर खाना खाने ) और अजीर्णाव-
स्था में भोजन करने वाले पुरुष के दोष को वैद्य 'आमविष' कहते हैं, क्योंकि
इसके लक्षण विष के समान होते हैं । ( आम दोष में भी विष के खाने के
समान मुख से लालास्राव होता है ) । यह भी बहुत असाध्य है ।
विषरूप होने से शीघ्र मारने वाला है और इसमें जो उपचार !