चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
अ० ८] सूत्रस्थानम् १०६
अ० ८] सूत्रस्थानम् १०६
तत्र यद्यदात्मकमिन्द्रियं विशेषात्तत्तदात्मकमेवार्थमनुधावति,
तत्स्वभावाद्द्विभुत्वाच्च ॥ १५ ॥
इनमें जो जो इन्द्रियाँ, जिस जिस भूत से बनी हैं वे विशेष रूप से
उसी उसी (भूत) से बने अर्थ (विषय) को ग्रहण करती हैं। ये अपने समान
स्वभाव वाली होने से समान जातिकारी विषय को ग्रहण करने में समर्थ होने से
प्रधान भूतात्मक विषय को ही ग्रहण करती हैं। यथा आंख तैजस है, इसलिये
वह तेज की ओर दौड़ती है, कान आकाश जन्य है इसलिये शब्द की ओर
दौड़ते हैं। स्पर्श वायव्य होने से वायु की ओर, जिह्वा आप्य है इसलिये रस की
ओर और घ्राण पार्थिव होने से पृथिवी की ओर दौड़ती है ॥ १५ ॥
यदर्थाति योगायोगमिथ्यायोगात्सममनस्कमिन्द्रियं विकृतिमापद्यमानं
यथास्वं बुद्धयुपघाताय संपद्यते, समयोगान्तुनः प्रकृतिमापद्यमानं
यथास्वं बुद्धिमाप्याययति ॥ १६ ॥
इनमें मन के साथ इन्द्रिय का विषय में अतियोग, अयोग, या मिथ्यायोग
होने से 'विकृति' अर्थात् रोग उत्पन्न होकर अपने अपने ज्ञान के नाश के लिये
उद्यत हो जाता है। समयोग से इन्द्रिय स्वभाव में रहकर अपने अपने ज्ञान की
वृद्धि करती हैं। समान अर्थात् उचित योग से वृद्धि होती है ॥ १६ ॥
मनसस्तु चिन्त्यमर्थः, तत्र मनसो बुद्धेश्च त एव समानाति हीन-
मिथ्यायोगाः प्रकृति-विकृति-हेतवो भवन्ति ॥ १७ ॥
मन का विषय चिन्तन करना है (सुख, दुःख, प्रयत्न आदि चिन्तनीय
होने से मन के विषय हैं)। इसलिये मन और बुद्धि का समान योग स्वस्थता
कारण है और मन एवं बुद्धि का अतियोग वा हीनयोग अथवा मिथ्यायोग
विकृति अर्थात् 'विकार' या रोग का कारण है ॥ १७ ॥
तत्रेन्द्रियाणां समनस्कानामनुपतप्तानामनुपतापाय प्रकृतिभावे प्रय-
तितव्यमेभिर्हेतुभिः। तद्यथा—सात्म्येन्द्रियार्थसंयोगेन, बुद्ध्या सम्यग-
वेक्ष्यावेक्ष्य कर्मणां सम्यक्प्रतिपादनेन, देशकालात्मगुणांविपरीतोपसेव-
नेन चेति । तस्मादात्महितं चिकीर्षता सर्वेण सर्वं सर्वदा स्मृतिमास्थाय
सद्वृत्तमनुष्ठेयम् । तद्ध्यनुष्ठितं युगपत्संपादयत्यर्थद्वयमारोग्यमिन्द्रि-
यविजयं चेति ॥ १८ ॥
इसलिये अपनी प्रकृति में स्थित मन सहित इन्द्रियों को स्वस्थ तथा अपने
वश में रखने के लिये, विकृति से बचाने के लिये निम्न कारणों द्वारा प्रयत्न
। उचित अनुकूल रूप से इन्द्रिय और विषय के संयोग न अति,
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न हीन और न मिथ्यासंयोग से, एवं बुद्धि द्वारा भली प्रकार देखकर कर्मों को
उचित रूप में करने से और देश, काल, आत्मा के गुण के अविपरीत,
हितकारी वस्तुओं के सेवन करने से इन्द्रियां उपतप्त न होकर प्रकृति अवस्था
में रहती हैं। इसलिये अपना या अपने शरीर का और आत्मा का कल्याण
चाहने वाले सब पुरुषों को सदा स्मरण रखकर सद्वृत्त का (पांचों इन्द्रियों
को मन के साथ संयुक्त करके) मन, वचन और कर्म से पालन करना चाहिये।
इस सद्वृत्त के पालन करने से आरोग्यता एवं 'इन्द्रियविजय' दोनों कार्य
एक साथ ही सिद्ध हो जाते हैं ॥ १८ ॥
तत्सद्वृत्तमखिलेनोपदेक्ष्यामः । तद्यथा—देव-गो-ब्राह्मण-गुरु-वृद्ध-
सिद्धाचार्यानर्चयेत्, अग्निमुपाचरेत्, ओषधीः प्रशस्ता धारयेत्, द्वौ
कालावुपस्पृशेत्, मलायनेष्वभीक्ष्णं पादयोश्च वैमल्यमादध्यात्, त्रिः
पक्षस्य केश-श्मश्रु-लोम-नखान् संहारयेत्, नित्यमनुपहतवासाः सुमनाः
सुगन्धिः स्यात् ॥ १६ ॥
इस सद्वृत्त को सम्पूर्ण रूप में कहते हैं—देवता, गो, ब्राह्मण, गुरु (माता
पिता अभ्यागत अतिथि) वृद्ध (विद्यावृद्ध, धनवृद्ध, आयुवृद्ध, शौर्यवृद्ध,) सिद्ध
(तापस, भिक्षुक), आचार्य (उपनयन संस्कार करने वाले गुरु), इनकी पूजा सेवा
करनी चाहिये। अग्निहोत्र प्रातःसायं दोनों समय करना चाहिये, अनिन्दित, (दोषों
को नष्ट करने वाली ओषधियां) वनस्पतियां, धारण करनी चाहियें। दोनों समय
प्रातःसायं स्नान करना चाहिये। मल के स्थानों को बार बार एवं पांव को सदा
पवित्र रक्खे। बाल, दाढ़ी, मूंछ नाखून, कक्ष के एवं गुह्य स्थानों के बालों को
पन्द्रह दिन में तीन बार, पांच पांच दिन के पीछे कटवाना चाहिये। नित्य प्रति
शुद्ध वस्त्र धारण करे, प्रसन्न मन रहे, सुगन्ध धारण करे ॥ १६ ॥
साधुवेशः प्रसाधितकेशो मूर्ध-श्रोत्र घ्राण-पाद-तैल-नित्यो धूमपः,
पूर्वाभिभाषी, सुमुखः, दुर्गेष्वभ्युपपत्ता, हंता, यष्टा, दाता, चतुष्प-
थानां नमस्कर्त्ता, बलीनामुपहर्त्ता, अतिथीनां पूजकः, पितृभ्यः पिण्डदः, काले
हित-मित-मधुरार्थवादी, वश्यात्मा, धर्मात्मा, हेतावीर्षुः, फले नेर्षुः, नि-
श्चिन्त:,निर्भीकः, धीमान्, ह्रीमान्, महात्साही, दक्षः, क्षमावान्, धार्मिकः
आस्तिको, विनय-बुद्धि-विद्याऽभिजन-वयोवृद्ध-सिद्धाचार्याणामुपासिता,
छत्री, दण्डी, मौली, सोपानत्कः, युगमात्रदृग्गवचरेत्, मङ्गलाचारशी...
कुचेलास्थि-कण्टकामेध्य-केश-तुषोत्कर-भस्म-कपाल-स्नान-बलि... और
परिहर्त्ता. प्राक श्रमाद व्यायामवर्जो च म्यात. सर्वप्राणिषु मे...