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चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

अ० २६ ] सूत्रस्थानम् ३१६

अ० २६ ] सूत्रस्थानम् ३१६
यच्चापि देश-कालाग्नि-मात्रा'-सात्म्यानिलादिभिः ।
संस्कारतो वीर्यतश्च कोष्ठावस्थाक्रमैरपि ॥ ८४ ॥
परिहारोपचाराभ्यां पाकात्संयोगतोऽपि च ।
विरुद्धं तच्च न हितं हृत्संपद्विधिभिश्च यत् ॥ ८५ ॥
विरुद्धं देशतस्तावद्रूक्षतीक्ष्णादि धन्वनि ।
आनूपे स्निग्धशीतादि भेषजं यन्निषेव्यते ॥ ८६ ॥
कालतोऽपि विरुद्धं यच्छीत-रूक्षादि-सेवनम् ।
शीते काले तथोष्णे च कटूकोष्णादिसेवनम् ॥ ८७ ॥
विरुद्धमनले तद्वन्नानुरूपं चतुर्विधे ।
मधुसर्पिः समधृतं मात्रया तद्विरुध्यते ॥ ८८ ॥
कटूष्णोष्णादिसात्म्यस्य स्वादुशीतादिसेवनम् ।
यत्तत्सात्म्यविरुद्धं तु, विरुद्धं त्वनिलादिभिः ॥ ८६ ॥
या समानगुणाभ्यासविरुद्धात्रौषधक्रिया ।
संस्कारतो विरुद्धं तद्यद्रोज्यं विषवद् भवेत् ॥ ९० ॥
ऐरण्डसीसकासक्तं शिखिमांसं तथैव हि ।
विरुद्धं वीर्यतो ज्ञेयं वीर्यतः शांतलात्मकम् ॥ ९१ ॥
तत्संयोज्योष्णवीर्येण द्रव्येण सह सेव्यते ।
क्रूरकोष्ठस्य चात्यल्पं मन्दवीर्यमभेदनम् ॥ ९२ ॥
मृदुकोष्ठस्य गुरु च भेदनीयं तथा बहु ।
एतत्कोष्ठविरुद्धं तु, विरुद्धं स्यादवस्थया ॥ ९३ ॥
श्रम-व्यवाय-व्यायाम-सक्तस्यानिलकोपनम् ।
निद्रालसस्यालसस्य भोजनं श्लेष्मकोपनम् ॥ ९४ ॥
यच्चानुत्सृज्य विण्मूत्रं भुङ्क्ते यच्चाबुभुक्षितः ।
तच्च क्रमविरुद्धं स्याद्यच्चातिक्षुद्वशानगः ॥ ९५ ॥
परिहारविरुद्धं तु वराहादीन्निषेव्य यत् ।
सेवेतोष्णं, घृतादींश्च पीत्वा शीतं निषेवते ॥ ९६ ।
विरुद्धं पाकतश्चापि दुष्टदुर्दारुसाधितम् ।
अपक्व-तण्डुलात्यर्थ-पक्व-दग्धं च यद्भवेत् ।
संयोगतो विरुद्धं यद्यथाऽम्लं पयसा सह ।
अमनोरुचितं यच्च हृद्विरुद्धं तदुच्यते ॥ ९८ ॥

३२० चरकसंहिता [ अ० २६

संपद्विरुद्धं तद्विद्यादसंजातरसं तु यत् ।
अतिक्रान्तरसं वाऽपि विपन्नरसमेव वा ॥ ९९ ॥
ज्ञेयं विधिविरुद्धं तु भुज्यते निभृतेन यत् ।
तदेवंविधमन्नं स्याद्विरुद्धमुपयोजितम् ॥ १०० ॥
सात्म्यतोऽल्पतया वाऽपि दीप्ताग्नेस्तरुणस्य च ।
स्नेह-व्यायाम-बलिनो विरुद्धं वितथं भवेत् ॥ १०१ ॥
षाण्ढ्यान्ध्य-वीसर्प-दकोदराणां विस्फोटकोन्माद-भगन्दराणाम् ।
मूर्च्छा-मदाध्मान-गलामयानां पाण्ड्वामयस्याऽऽम-विषस्य चैव ॥१०२॥
किलास-कुष्ठ-ग्रहणी-गदानां शोषास्र-पित्त-ज्वर-पीनसानाम् ।
संतानदोषस्य तथैव मृत्योर्विरुद्धमन्नं प्रवदन्ति हेतुम् ॥ १०३ ॥

जो भोजन दोषों को विशेष रूप में कुपित करके शरीर से बाहर नहीं करता,
अर्थात् कुपित अवस्था में शरीर में ही रहने देता है वह सब अन्न अहितकारी
होता है। इसी प्रकार देश, काल, अग्नि, सात्म्य, वायु आदि दोष, संस्कार
वीर्य, कोष्ठ, अवस्था, क्रम, परिहार, उपचार, पाक, संयोग, हृत्-संपत् और विधि
में जो द्रव्य विरोधी हों, वे अहितकारी हैं । मारवाड़ आदि निर्जल देशों में रूक्ष,
तीक्ष्ण पदार्थ; जलबहुल ( बंगाल आदि ) प्रदेश में स्निग्ध और शीत पदार्थों का
सेवन करना देशविरुद्ध है । इसी प्रकार शीत ऋतु में शीत और रूक्ष पदार्थों का
सेवन या उष्णकाल में कटु और उष्ण पदार्थों का सेवन कालविरुद्ध है। अग्नि के
विषम, मन्द या तीक्ष्ण या सम इन चार प्रकार की जाठराग्नि में विरोधी अन्नपान
(यथा-तीक्ष्णाग्नि में मन्द आहार और मन्दाग्नि में गुरु आहार करना) विरोधी है। मधु
और घी एकसमान मात्रामे परस्पर विरोधी हैं। जिस पुरुषको कटु, उष्ण आदि वस्तुओं
का सात्म्य हो, वह यदि मधुर और शीत पदार्थ सेवन करे तो यह सात्म्य-विरोधी
है । समान गुणों के अभ्यास के विरुद्ध जो आहार है वह वायु आदि दोषों का
भी विरोधी है। एरण्ड की कड़छी से पकाया हुआ मोर का मांस विष के समान
होने से संस्कार-विरुद्ध है। जो वस्तु शीतवीर्य हो उस को यदि उष्णवीर्य की
वस्तु के साथ मिलाकर खाया जाये तो यह वीर्य-विरोधी है। क्रूरकोष्ठ वाले
पुरुष को थोड़ा, मृदुवीर्य अथवा अरेचक पदार्थ देना और मृदुकोष्ठ वाले
पुरुष को गुरु, बहुत अथवा रेचक पदार्थ देना, कोष्ठविरोधी है। परिश्रम,
मैथुन, स्त्रीसंग और व्यायाम में लगे हुए पुरुष को वायुकोपक आहार देना
या निद्राशील, आलसी पुरुष को कफकोपक भोजन देना अवस्थाविरुद्ध
जो मल मूत्र का त्याग किये बिना, बिना भूख के खाना, अथवा बहुत की