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चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

अ० २६ । सूत्रस्थानम् २८३

अ० २६ । सूत्रस्थानम् २८३
ण्याक्ष कौशिक ने कहा कि—'रस' चार हैं। स्वादु ( प्रिय ) हितकारी, स्वादु
अहित, अस्वादु हित और अस्वादु अहित । कुमारशिरा भरद्वाज ने कहा
कि—रस पांच हैं। भौम ( पृथ्वी का ), उदक (पानी का), आग्नेय (तेज का),
वायवीय ( वायु का ) और आन्तरिक्ष (आकाश का) ये पांच रस हैं। राजर्षि
वार्योविद बोले—'रस' छः हैं। गुरु, लघु, शीत, उष्ण, स्निग्ध और रूक्ष ।
बदेह निमि ने कहा— रस सात हैं। मधुर, अम्ल, लवण, तिक्त, कटु, कषाय
और क्षार । धामार्गव बडिश बोले—रस आठ हैं। यथा—मधुर, अम्ल, लवण,
कटु, तिक्त, कषाय, क्षार और अव्यक्त । बाह्लीकभिषक् कांकायन ने कहा
कि—'गुण ( गुरु लघु आदि ), कर्म ( धातु वर्धन क्षयण आदि ), संस्वाद
( रसों के नाना अवान्तर भेद ) भेदों से रस अगणित बन जाते हैं ॥ ८ ॥
षडेव रसा इत्युवाच भगवानात्रेयः पुनर्वसुर्मधुराम्ल-लवण-कटु-तिक्त-
कषायाः । तेषां षण्णां रसानां योनिरुदकं, छेदनोपशमने द्वे कर्मणी, तयो-
र्मिश्रीभावात्साधारणत्वं, स्वाद्वस्वादुता भक्तिः, हिताहितौ द्वौ प्रभावौ ।
पञ्चमहाभूतविकारास्त्वाश्रयाः प्रकृति-विकृति-विचार-देश-कालवशाः,
तेष्वाश्रयेषु द्रव्यसंज्ञकेषु गुणा गुरु-लघु-शीतोष्ण-स्निग्ध-रूक्षाद्याः ।
क्षरणात्क्षारो नासौ रसः, द्रव्यं तदनेकरससमुत्पन्नमनेकरसं कटुक-ल-
वण-भूयिष्ठमनेकेन्द्रियार्थसमन्वितं करणाभिनिर्वृत्तम् । अव्यक्तीभावस्तु
खलु रसानां प्रकृतौ भवत्यनुरसेऽनुरससमन्विते वा द्रव्ये । अपरिसंख्ये-
यत्वं पुनस्तेषामाश्रयादीनां भावानां विशेषापरिसंख्येयत्वान्न युक्तं,
एकैकोऽपि हि पुनरेषामाश्रयादीनां भावानां विशेषानाश्रयते विशेषाप-
रिसंख्येयत्वात् । न च तस्मादन्यत्वमुपपद्यते । परस्पर-संसृष्ट-भूयिष्ठ-
त्वान्न चैषामभिनिर्वृत्तेर्गुणप्रकृतीनामपरिसंख्येयत्वं भवति, तस्मान्न
संसृष्टानां रसानां कर्मोपदिशन्ति बुद्धिमन्तः । तञ्चैव कारणमपेक्षमाणाः
षण्णां रसानां परस्परेणांसंसृष्टानां लक्षणपृथक्त्वमुपदेक्ष्यामः ॥ ६ ॥
पुनर्वसु भगवान् आत्रेय ने कहा कि—रस छः ही हैं। यथा—मधुर,
अम्ल, लवण, कटु, तिक्त और कषाय । इन छः रसों की उत्पत्ति का स्थान पानी
ही है। छेदन और उपशमन ये दोनों कर्म हैं, इन दोनों कर्मों के मिल जाने से
साधारण हो जाता है । स्वादु और अस्वादु यह रुचि हैं, हित और अहित
प्रभाव हैं । पंच महाभूत विकार हैं । वे रस के आश्रय स्थान हैं, वे रस नहीं
हैं। गुरु, लघु, शीत, उष्ण, स्निग्ध, रूक्ष ये द्रव्यों में आश्रित गुण हैं, जो कि
प्रकृति ( यथा—मूं ग, कषाय और मधुर स्वभाव से ही हैं इसलिये लघु हैं ),

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विकृति (चावलोँ से बने ताज़ा खील लघु और सत्तू बड़े भारी होते हैं), विचार
(द्रव्यान्तर संयोग यथा—मधु और घी का मेल विष बनता है), देश (दो
प्रकार का है यथा—भूमि और रोगी। भूमि जैसे—श्वेतकपोती वल्मीकाधिरूढ़ा
विषहरी होती है, हिमालय की ओषधियां अधिक गुण युक्त होती हैं, शरीर देश
जैसे टांग के मांस से कन्धे आदि का मांस गुरु होता है) और काल इन के
भेद से बनते हैं। क्षार रस नहीं है। क्योंकि क्षरण किया जाने से, अनेक
पदार्थों से उत्पन्न होने के कारण अनेक रस होने से, कटुक, लवण आदि
रसों का अनुभव होने से, क्षार में स्पर्श और गन्ध होने से यह द्रव्य है, रस
नहीं, और हेत्वन्तर अर्थात् अन्य कारण—भस्म स्राव आदि से बनने के कारण,
रस नहीं है। 'अव्यक्त' भी रस नहीं। क्योंकि अव्यक्तता तो कारण में ही है।
(रसों के कारण जल में ही अव्यक्तता है)। इस के अतिरिक्त अनुरस में
अव्यक्तीभाव होता है। रस के पीछे जो रस होता है, वह अनुरस है। यथा—
रूक्षः कषायानुरसो मधुरः कफपिच्छला। यथा—विष के विषय में ('उष्णमनिर्दें-
श्यरसम्')। अथवा अनुरसयुक्त द्रव्य में अव्यक्तता होती है। और जो यह
कहा है कि रसों के आश्रय आदि भावों के असंख्य होने से रस भी असंख्य हैं,
यह ठीक नहीं। क्योंकि एक-एक रस इन आश्रय रूपी भावों में से किसी
एक भाव का आश्रय करके विशेष रूप से रहता है (यथा—चावल,
मूंग, घृत, दूध आदि वस्तुओं में मधुर रस के आश्रय की भिन्नता रहने
पर भी मधुरत्व रस समान है, जिस प्रकार की बगुला, दूध, और कपास
में आश्रय भेद होने पर भी सफेद रंग समान है)। आश्रय आदि असंख्य
हैं। इसलिये छः से भिन्न अन्य रस का होना सम्भव नहीं। और यदि कहो
कि रसों के परस्पर मिलने से रस असंख्य हो जायेंगे ? यह भी ठीक नहीं,
क्योंकि परस्पर मिलने पर भी इनके गुरु, लघु आदि गुण या मधुर
आदि स्वभाव अथवा आयुष्यवर्द्धक आदि असंख्य भेद हो जाते हैं। यहां पर
भी मधुर आदि के प्रत्येक के गुण और प्रकृतियां जो कहीं हैं वे ही परस्पर
मिलती हैं। इसलिये एक रस के दूसरे रस के साथ मिलने से और दोषों के
दूसरे दोषों से मिलने पर भी रस असंख्य, अगणित नहीं होते। इसीलिये
मिले हुए रसों के कर्मों का बुद्धिमान् उपदेश नहीं करते। और इसी कारण से
परस्पर न मिले हुए छः रसों के लक्षणों को पृथक्-पृथक् कहेंगे ॥ ९ ॥

अग्रे तु तावद् द्रव्यभेदमभिप्रेत्य किंचिदभिधास्यामः। सर्वं द्रव्यं
पाञ्चभौतिकमस्मिन्नर्थे। तच्चेतनावदचेतनं च, तस्य गुणाः शब्दादयो