चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
अ० ३ ] निदानस्थानम् ४२३
अ० ३ ] निदानस्थानम् ४२३
प्लीहा, आटोप ( वायु का आध्मान ), आंतो में गुड़-गुड़ ध्वनि, अमेचन,
उदावर्त्त, अंगों का टूटना, मन्याशूल, शिरःशूल, शंखशूल, नख-रोग आदि
नाना उपद्रव होने लगते हैं। रोगी की त्वचा, नख, मुख, मूत्र और मल का
रंग काला या अरुण हो जाता है, तथा ये कर्कश हो जाते हैं।
निदानोक्तानि चास्य नोपशेरते, विपरीतानि चोपशेरते—इति
वातगुल्मः ॥ ८ ॥
वातगुल्म के कारणानुकूल आहार-विहार करने से रोग शान्त नहीं होता,
परन्तु रोग के कारण के विपरीत गुणवाले आहार-विहार से रोग शान्त हो
जाता है ! वातगुल्म के ये लक्षण हैं ॥८॥
तैरेव तु कर्शनैः कशितस्याम्ल-लवण-कटुक-क्षारोष्ण-तीक्ष्ण-शुक्त-
ऽव्यापन्न-मद्य-हरित-कफलाम्लानां विदाहिनां च शाक-धान्य-मांसादीना-
मुपयोगादजीर्णाध्यशनाद्रौक्ष्यानुगते चाऽऽमाशये वमनविरेचनमतिवेलं
संधारणं वातातपौ चातिसेवमानस्य पित्तं सह मारुतेन प्रकोपमा-
पद्यते ॥ ६ ॥
बात के साथ पित्त प्रकोप के कारण—वातगुल्म में कहे हुए कारणों से
कर्शित हुआ पुरुष जब खट्टे, नमकीन, कड़वे, क्षार, उष्ण, तीक्ष्ण, शुक्त, सड़े,
खराब हुए, मद्य, या हरी सब्जियां और फल खाता या दाहकारक शाक या
मांस का सेवन करता है, अजीर्ण यां अध्यशन ( भोजन के ऊपर फिर भोजन
करने ). से आमाशय में रूक्षता के उत्पन्न होने से वमन, विरेचन के वेगों को
बहुत देर तक रोकने से, वायु या धूप के अतिसेवन करने से वायु के साथ
पित्त भी कुपित होजाता है ॥ ६ ॥
तत्रकुपितं मारुत आमाशयैकदेशे संमूच्छ्र्य तानेव वेदनाप्रका-
रानुपजनयति य उक्ता वातगुल्मे, पित्तं त्वेनं विदहति कुक्षौ हृद्युरसि
कण्ठे च, स विदह्यमानः सधूममिवोद्गारमुद्गिरत्यम्लान्वितं, गुल्मा-
वकाशाश्चास्य दह्यते दूयते धूप्यते उष्मायते स्विद्यति क्लिद्यते शिथिल
इव च स्पर्शासहोऽल्परोमाञ्चो भवति । ज्वर-भ्रम-दवथु पिपासा-गल-
वदन-तालु-शोष-प्रमोह-विड्भेदाश्चैनमुपद्रवन्ति, हरित-हारिद्रत्वङ्-नख-
⌈ भवति । निदानोक्तानि चास्य नोपशेरते, विप-
रीतानि चोपशेरते—इति पित्तगुल्मः ॥ १० ॥
पित्तगुल्म की सम्प्राप्ति—इस प्रकार से कुपित हुआ पित्त और वायु
आमाशय के एक प्रदेश में मिलकर वातगुल्म में कही हुई वेदनाओं को
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उत्पन्न करते हैं। १पित्तगुल्म में विशेषता यह है कि प्रकुपित पित्त कुक्षि, हृदय,
वक्षःस्थल और कण्ठ इन स्थानों में दाह उत्पन्न करता है। इस दाह के
कारण धुंए के समान और खट्टा डकार रोगी को आता है और गुल्म के स्थान
में दाह होता है, धूं आ निकलता है, गरमी रहती है, पसीना आता है, क्लिन्नता
होती है, शरीर ढीला पड़ा प्रतीत होता है, स्पर्श की असह्यता रहती है
और किञ्चित् रोमांच रहता है। ज्वर, भ्रम, दवथु (धक् धक् स्पन्दन),
पिपासा, गले मुख और तालु में शुष्कता, मूर्च्छा, मल का पतला आना, ये
उपद्रव होजाते हैं। त्वचा, नख, आँख, मूत्र और मल इनका रंग हरा या
हल्दी के समान होजाता है। इसके निदान के समान गुण वाली वस्तुओं के
उपयोग से रोग बढ़ता है और विपरीत गुणवाली वस्तुओं से कम होता है।
यह पित्तगुल्म का वर्णन हुआ ॥ १० ॥
तैरेव तु कर्शनैः कर्शितस्यात्यशनादतिस्निग्ध-गुरु-मधुर-शीताशना-
त्पिष्टेक्षु-क्षीर-माष-तिल-गुड-विकृति-सेवनान्मन्दक-मद्यातिपानाद्धरितका-
तिप्रणयनादानूपौदक-ग्राम्य-मांसातिभक्षणात्संधारणादतिसुहित्यस्य चाति-
ऽवगाढमुदपानात्संक्षोभणाद्वा शरीरस्य श्लेष्मा सह मारुतेन प्रकोप
मापद्यते ॥ ११ ॥
वात के साथ कफ-प्रकोप के कारण—वातगुल्म में कहे हुए कारणों से
कृश हुए व्यक्ति के अत्यन्त भोजन करने से, अतिस्निग्ध, गुरु, मधुर, शीत
पदार्थों के खाने से, पीठी (उड़द आदि को पीसकर), ईख, दूध, उड़द,
तिल, गुड़ इनसे बने पदार्थों के अति सेवन से, मन्दक-दही और मद्य के अति-
सेवन से, हरे शाक, आनूप या जलचर प्राणियों के अथवा ग्राम्य मांस के
अति सेवन से, शरीर को बहुत विक्षोभित करने से, वायु कफ के साथ मिलकर
कुपित होजाता है ॥ ११ ॥
तं प्रकुपितं मारुत आमाशयैकदेशे संमूर्च्छद्य तानेव गाढवेद-
नाप्रकारानुपजनयति य उक्ता वातगुल्मे । श्लेष्मा त्वस्य शीतज्वरारो-
चकाविपाकाङ्गमर्द-हर्ष-हृद्रोग-च्छर्दि-निद्रालस्य-स्तैमित्य-गौरव-शिरोभि-
तापानुपजनयति, अपिच गुल्मस्य स्थैर्य-गौरव-काठिन्यावगाढ-सुप्तताः,
१. आमाशय के एकदेश में मूर्च्छित होने से पित्तगुल्म और कफगुल्म
बस्ति में नहीं होते। क्योंकि नाभि और स्तनों के बीच के स्थान को आमा-
शय कहते हैं। वातगुल्म बस्ति में भी होता है। इसलिये वातगुल्म में
'महास्रोतस्' शब्द पड़ा है। महास्रोतस् शब्द से बस्ति का भी ग्रहण होजाता है।