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चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

भेषज चतुष्क कहने के अनन्तर 'मात्राशितीय' अध्याय की व्याख्या

भेषज चतुष्क कहने के अनन्तर 'मात्राशितीय' अध्याय की व्याख्या
करेंगे । इस प्रकार भगवानात्रेय ने कहा है ॥१-२॥
मात्राशी स्यात् । आहारमात्रा पुनरग्निबलापेक्षिणी । यावद्ध्यस्या-
शनमशितमनुपहत्य प्रकृतिं यथाकालं जरां गच्छति तावदस्य मात्रा-
प्रमाणं वेदितव्यं भवति ॥ ३ ॥
मात्रा में आहार करने वाला होना चाहिये । आहार¹ की मात्रा जाठर
अग्नि के बल की अपेक्षा करती है । जितना खाया हुआ भोजन मनुष्य की
प्रकृति, स्वास्थ्य को नुक्सान न पहुंचा कर ठीक समय में जीर्ण हो जाता है
भोजन की उतनी मात्रा जाननी चाहिये² ॥ ३ ॥
तत्र शालि-षष्टिक-मुद्ग-लावक-कपिञ्जल-शश-शरभ-शम्बरादीन्या-
हार-द्रव्याणि प्रकृतिलघून्यपि मात्रापेक्षाणि भवन्ति, तथा पिष्टेक्षु-क्षीर-
विकृति-तिल-माषानूपौदक पिशितादीन्याहारद्रव्याणि प्रकृतिगुरूण्यपि
मात्रामेवापेक्षन्ते ॥ ४ ॥
क्योंकि (शालि), हैमन्तिक धान्य, (षष्टिक) साठी चावल. (मुद्ग), मूंग,
(लाव) बटेर, (कपिञ्जल) तीतर, (एण) काला मृग, (शश) खरगोश,
१. आहार चार प्रकार का है । यथा—भक्ष्य, चोष्य, लेह्य और पेय ।
भक्ष्य रोटी आदि, चोष्य चूसने योग्य, लेह्य चाटने योग्य, और पेय पानी आदि द्रव ।
एक ही मनुष्य की शक्ति सदा एक समान नहीं रहती । यौवनावस्था में
जितनी जाठराग्नि समर्थ होती है, उतनी बाल्यावस्था या वृद्धावस्था में नहीं
होती । इसी प्रकार हेमन्त ऋतु में जितनी अग्नि प्रबल रहती है उतनी वर्षा में
नहीं रहती । इस लिये प्रत्येक समय के लिये एक मात्रा एक व्यक्ति के लिये भी
निश्चित करना असम्भव है, फिर सब के लिये सामान्य रूप से मात्रा निश्चित
करना तो और भी असम्भव है । इसलिये 'मात्रा' का निर्णय प्रत्येक व्यक्ति के
ऊपर ही छोड़ दिया है !
२ (क)-'यथाकालं:-प्रातःकाल का भोजन सायंकाल तक और सायंकाल
का भोजन प्रातः कालतक जीर्ण हो जाये । क्योंकि हमारे यहां दो ही समय
भोजन का विधान है । यथा—
"सायं प्रातर्मनुष्याणां भोजनं विधिनिर्मितम् ।
नान्तरे भोजनं कुर्याद् अग्निहोत्रसमो विधिः ॥” सर्वांगसुन्दरी टीका ॥

६४ चरकसंहिता [ अ० ५
( शरभ ) बड़े सींगों वाला पाढ़ा हरिण, ( शम्बर ) हरिण साबर आदि आहार
द्रव्य स्वभाव से लघु होने पर भी मात्रा की अपेक्षा करते हैं १ । इसी
प्रकार ( पिष्ट ) पिष्टी से बनी हुई वस्तुएं; ( इक्षु ) गुड़ खांड़ आदि से बनी;
( क्षीर-विकृति ) दूध, मावे आद से बनी; तिल, ( माष ) उड़द, (आनूपौदक
पिशित) अर्थात् जल प्रदेश में या जल के अन्दर रहने वाले प्राणियों का मांस
आदि आहार द्रव्य स्वभाव से ही भारी हैं । ये सब भी मात्रा २ की ही अपेक्षा
करते हैं ॥ ४ ॥
न चैवमुक्ते द्रव्ये गुरुलाघवमकारणं मन्येत । लघूनि हि द्रव्याणि
वाय्वग्नि-गुण-बहुलानि भवन्ति, पृथिवी-सोम-गुण-बहुलानीतराणि;
तस्मात्स्वगुणादपि लघून्यग्नि-संधुक्षण-स्वभावान्यल्प-दोषाणि चोच्य-
न्तेऽपि सौहित्योपयुक्तानि, गुरूणि पुनर्नाग्नि-संधुक्षण-स्वभावान्यसामा-
न्यात्, अतश्चातिमात्रं दोषवन्ति सौहित्योपयुक्तान्यन्यत्र व्यायामाग्नि-
बलान्; सैषा भवत्यग्निबलापेक्षिणी मात्रा ॥ ५ ॥
शालि, सांठी आदि पदार्थ बिना मात्रा में खाने से अहितकर हैं और पिष्टी
गुड़ आदि से बने पदार्थ मात्रा में खाने से हितकर होते हैं; यदि मात्रा की ही
अपेक्षा से ये हितकर या अहितकर होते हों, तो द्रव्यों का गुरु एवं लघुगुण-
(ख)-मनुष्य की प्रकृति के ऊपर मात्रा का निर्णय रखने से, विषम और
तीक्ष्ण अग्निवाले व्यक्ति भी अपना भोजन की मात्रा स्वयं निश्चय कर सकते
हैं । तीक्ष्ण अग्नि वाले को इतना भोजन करना चाहिए, जो कि ठीक समय में
जीर्ण हो जाये, इसी प्रकार विषम अग्नि वाले भी ठीक समय में जीर्ण हो सके
ऐसा भोजन करें, यही उनकी मात्रा है ।
(ग)-‘प्रकृतिमनुपहत्य’—भोजन से कुक्षि का पीड़न न होना, हृदय का न
रुकना, पार्श्वों का न फूलना, पेट का न तनना या भारी न होना, श्वास में
कठिनाई का न होना, भूख, प्यास की शान्ति, उठने बैठने, चलने फिरने,
लेटने या बात-चीत में हलकापन अथवा सुख की प्रतीति होना ही प्रकृति है ।
देखिये विमानस्थान अध्याय २ ।
१. एक पदार्थ लघु होता हुआ भी अधिक मात्रा में खाने से 'गुरु' हो जाता
है । इसी प्रकार गुरु पदार्थ थोड़ा खाने से 'लघु' हो जाता है ।
२. मात्रा के साथ 'संस्कार' रांधने की विधि से भी लघु पदार्थ गुरु और
गुरु पदार्थ लघु बन जाते हैं ।