चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
अ० १७] सूत्रस्थानम् २१५
अ० १७] सूत्रस्थानम् २१५
सर्पपी सर्पपाभाभिः पिडकाभिश्चिता भवेत् ॥ ८६ ॥
दहति त्वचमुत्थाने तृष्णा-मोह-ज्वर-प्रदा ।
विसर्पत्यनिशं दुःखाहत्यग्निरिवाऽलजी ॥ ८७ ॥
अवगाढ-रुजा-क्लेदा पृष्ठे वाऽप्युदरेऽपि वा ।
महती विनता नीला पिडका विनता मता ॥ ८८ ॥
सात पिड़कायें—शराविका, कच्छपिका, जालिनी, सर्पपी, अलजी, विनता
और विद्रधि ये सात प्रकार की पिड़कायें उत्पन्न होती हैं। किनारों से ऊँची
और बीच से दबी, श्याव अर्थात् ऊदे रंग की, स्रावयुक्त और पीड़ायुक्त, यह
पिड़का शराव (परई, सकोरा के ) के आकार की होती है, इसे शराविका कहते
हैं। जो गम्भीर वेदना वाली दर्दयुक्त, महावस्तु का आश्रय करके रहती है
[बहुत अधिक स्थान घेरा हो] ऊपर से चिकनी और कछुवे की पीठ के समान
ऊपर से उठी पिड़का 'कच्छपी' होती है। जड़ (न हिलने वाली), शिराओं
के जालयुक्त, चिकने स्रावयुक्त, बड़े आशय में आश्रित, दर्द और चुभने की
सी वेदनायुक्त तथा छोटे-छोटे छेदों से घिरी पिड़का 'जालिनी' होती है। बहुत
बड़ी नहीं, जल्दी पकने वाली, बहुत वेदना युक्त, सरसों के आकार की छोटी-छोटी
पिड़काओं से घिरी पिड़का 'सर्पपी' है। अलजी पिड़का के उत्पन्न होने पर
त्वचा जलने लगती है, तृष्णा, मूर्च्छा, ज्वर होता है। रात दिन दुःखी करती
है, अग्नि के समान दुःख से रोगी जलता है, इसका नाम 'अलजी' है। जिस
में स्राव बहुत गाढ़ा हो, बहुत सख्त वेदना हो, स्राव हो, पिड़का पीठ या
उदर में हो, बहुत बड़ी, दबी हुई सी, नीले रंग की पिडका को 'विनता'
कहते हैं ॥ ८२-८८ ॥
विद्रधिं द्विविधामाहुर्बाह्यामाभ्यन्तरीं तथा ।
बाह्या त्वक्स्नायु-मांसोत्था कण्डराभा महारुजा ॥ ८९ ॥
शीतकाम्लविदाह्युष्ण-रूक्ष-शुष्कातिभोजनात् ।
विरुद्धाजीर्ण-संक्लिष्ट-विषमासात्म्य-भोजनात् ॥ ९० ॥
व्यापन्न-बहु-मद्यत्वाद्द्वेगसंधारणाच्छ्रमात् ।
जिह्म-व्यायाम-शयनादतिभाराध्वमैथुनात् ॥ ९१ ॥
अन्तःशरीरे मांसासृगाविशन्ति यदा मलाः ।
तदा संजायते ग्रन्थिर्गम्भीरस्थः सुदारुणः ॥ ९२ ॥
हृदये क्लोम्नि यकृति प्लीह्नि कुक्षौ च वृक्कयोः ।
नाभ्यां वङ्क्षणयोर्वापि बस्तौ वा तीव्रवेदनः ॥ ९३ ॥
२१६ चरकसंहिता [ अ० १७
दुष्टरक्तातिमात्रत्वात्स वै शीघ्रं विदह्यते ।
ततः शीघ्रविदाहित्वाद्विद्रधीत्यभिधीयते ॥ ९४ ॥
व्यधच्छेद-भ्रमानाह-शब्द-स्फुरण-सर्पणैः ।
वातिकीं, पैत्तिकीं तृष्णा-दाह-मोह-मद-ज्वरैः ॥ ९५ ॥
जम्भोत्क्लेशारुचि-स्तम्भ-शीतकैः श्लैष्मिकीं विदुः ।
सर्वासु च महच्छूलं विद्रधीषूपजायते ॥ ९६ ॥
तप्तैः शस्त्रैरथा मध्येतोलमुकैरिव दह्यते ।
विद्रधी न्यम्लतां याता वृश्चिकैरिव दश्यते ॥ ९७ ॥
तनुरूक्षारुणं स्रावं फेनिलं वातविद्रधी ।
तिल-माष-कुलत्थोद-संनिभं पित्तविद्रधी ॥ ९८ ॥
श्लैष्मिकी स्रवति श्वेतं बहलं पिच्छिलं बहु ।
लक्षणं सर्वमेवैतद्द्रूजते सान्निपातिकी ॥ ९९ ॥
विद्रधि पिडका दो प्रकार की होती है यथा-बाह्या और आभ्यन्तरी ।
इनमें बाह्या विद्रधि त्वचा, स्नायु और मांस में उत्पन्न होती है, इसका आकार
कण्डरा के समान होता है, इसमें बहुत वेदना होती है । अन्तः विद्रधि का
निदान कहते हैं— ठण्डा भोजन, दाह करने वाला भोजन, उष्ण, रूक्ष, शुष्क
भोजन के खाने से, बहुत खाने से, विरुद्ध भोजन से अजीर्णावस्था
में भोजन करने से, संकीर्ण ( अर्थात् मिश्रण किये खाने से ) विषम
भोजन से, प्रकृति के प्रतिकूल भोजन से, व्यापन्न अर्थात् दूषित भोजन से,
बहुत मद्यपान से, उपस्थित वेगों को रोकने से, परिश्रम से, कुटिल व्यायाम
( अंगों को अनुचित रूप से मोड़ने-तोड़ने ) से, कुटिल शयन ( टेढ़ा-मेढ़ा
होकर सोने ) से, बहुत बोझ उठाने से, बहुत मार्ग चलने से, बहुत मैथुन के
कारण जब मल ( वात, पित्त, कफ ) शरीर के अन्दर मांस और रक्त में घुस
जाते हैं, तब गहरी और कठोर गांठ उत्पन्न हो जाते हैं। गांठ उत्पन्न होने के
स्थान—हृदय, क्लोम ( पित्ताशय या आमाशय ), यकृत्, प्लीहा, कुक्षि (पार्श्वों)
में, वृक्कों ( गुर्दों ) में, नाभि में, वंक्षण ( जांघ की सन्धियों ) में और बस्ति
( मूत्राशय ) में उत्पन्न होती है और यहां तीव्र वेदना होती है। रक्त के बहुत
अधिक दुष्ट होने से विद्रधि शीघ्र विदग्ध होने लगती है, विदग्ध होने से ही
इसको 'विद्रधि' कहते हैं ।
वातजन्य विद्रधि में बींधने के समान, काटने के समान छेदने के समान
पीड़ा होती है, चक्कर आता है, अफरा, शब्द सुनाई देता है, स्फुरण, धड़कन