चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
अ० १ ] सूत्रस्थानम् ५
अ० १ ] सूत्रस्थानम् ५
भगवान् इन्द्रने महर्षि भरद्वाज को महामति जान कर थोड़े ही शब्दों में
संक्षेप से आयुर्वेद का उपदेश किया ॥ २३ ॥
हेतुलिङ्गौषधज्ञानं स्वस्थातुरपरायणम् ।
त्रिसूत्रं शाश्वतं पुण्यं बुबुधे यं पितामहः ॥ २४ ॥
सोऽनन्तपारं त्रिस्कन्धमायुर्वेदं महामतिः ।
यथावदचिरात् सर्वं बुबुधे तन्मना मुनिः ॥ २५ ॥
तेनाऽऽयुरमितं लेभे भरद्वाजः सुखान्वितम् ।
ऋषिभ्योऽनधिकं तच्च शशंसानवशेषयन् ॥२६॥
ऋषयश्च भरद्वाजाज्जगृहुस्तं प्रजाहितम् ।
दीर्घमायुश्चिकीर्षन्तो वेदं वर्धनमायुषः ॥ २७ ॥
हेतु ( रोगों का कारण ), लिंग ( रोगों के चिन्ह ), औषध, (संशोधन और
संशमन रूप चिकित्सा ), स्वस्थ एवं रोगी दोनों के लिए परम गति और जिस
का पितामह ( ब्रह्मा ) ने प्रथम ज्ञान किया था, उस तीन सूत्र १ वाले पुण्य,
श्रेष्ठ और नित्य, सनातन २ आयुर्वेद का इन्द्र ने उपदेश किया । महामति भर-
द्वाज मुनि ने एकाग्रचित्त होकर इस अनन्त और अपार ३ और तीन स्कन्धों
वाले आयुर्वेद को यथावत् शीघ्र ही सम्पूर्ण जान लिया । भरद्वाज मुनि ने इस
१ त्रिःसूत्र—हेतु, दोष और द्रव्य संग्रह रूप:
हेतुसंग्रह—कालबुद्धीन्द्रियार्थानां योगो मिथ्या न चाति च ।
द्वयाश्रयाणां व्याधीनां त्रिविधो हेतुसंग्रहः ॥
दोषसंग्रह—वातः पित्तं कफश्चोक्तः शारीरो दोषसंग्रहः ।
मानसः पुनरुद्दिष्टो रजश्च तम एव च ॥
द्रव्यसंग्रह—किंचिद्दोषप्रशमनं किंचिद् धातु-प्रदूषणम् ।
स्वस्थवृत्तौ मतं किंचित् त्रिविधं द्रव्यमुच्यते ॥
अथवा 'त्रिसूत्र' शब्द से वात, पित्त और कफ का ग्रहण करना चाहिये ।
क्योंकि सम्पूर्ण आयुर्वेद शास्त्र इन्हीं में ओत-प्रोत है । जैसा कि सुश्रुत में—
“वातपित्तश्लेष्माण एव देहसंभवहेतवः । तैरेवाव्यापन्नैरधो मध्योर्ध्वसंनिविष्टैः
शरीरारमदं धार्यत-आगारमिव स्थूणाभिः । अतः त्रिस्थूणाभिरित्येके ।”
२—सोऽयमायुर्वेदः शाश्वतो निर्दिश्यते, अनादित्वात् । चरक ॥
३- नास्ति आयुर्वेदस्य पारम्, तस्मादप्रमत्तः शश्वदभियोगमस्मिन् गच्छेत् ।
॥ चरक ॥
६ चरकसंहिता [ अ० १
आयुर्वेद के द्वारा ही सुख से युक्त दीर्घ आयु प्राप्त की। और उसने ऋषियों
को न अधिक और न कुछ कम, ज्यों का त्यों ही सम्पूर्ण शास्त्र का उपदेश
किया। दीर्घ आयु करने की इच्छा वाले ऋषियों ने भी लोक की हितकामना
से इस आयुर्वधक आयुर्वेद को भरद्वाज से ग्रहण किया ॥ २४-२७ ॥
महर्षयस्ते ददृशुर्यथावज्ज्ञानचक्षुषा।
सामान्यं च विशेषं च गुणान् द्रव्याणि कर्म च ॥ २८ ॥
समवायं च, तज्ज्ञात्वा तन्त्रोक्तं विधिमास्थिताः।
लेभिरे परमं शर्म जीवितं चाप्यनश्वरम् ॥ २६ ॥
ज्ञान की चक्षु से ऋषियों ने सामान्य, विशेष, गुण, द्रव्य, कर्म, समवाय
का यथावत् पूर्णरूप से दर्शन किया। इन को यथावत् जानकर आयुवद विधि
से हितकारक पदार्थों का सेवन और अहितकारी पदार्थों का त्याग कर परम
सुख, आरोग्य और दीर्घ जीवन प्राप्त किया १ ॥ २८-२६ ॥
अथ मैत्रीपरः पुण्यमायुर्वेदं पुनर्वसुः।
शिष्येभ्यो दत्तवान् षड्भ्यः सर्वभूतानुकम्पया ॥ ३० ॥
अग्निवेशश्च भेडश्च जतूकर्णः पराशरः।
हारीतः क्षारपाणिश्च जगृहुस्तन्मुनेर्वचः ॥ ३१ ॥
तत्पश्चात् सब प्राणियों में मैत्री बुद्धि रखने वाले पुनर्वसु आत्रेय ने सब प्राणियों
पर दया का अनुभव करके इस पवित्र आयुर्वेद का छः शिष्यो को उपदेश किया।
अग्निवेश, भेड, जतूकर्ण, पराशर, हारीत और क्षारपाणि इन छः शिष्यों
ने मुनि के उस उपदेशवचन को ग्रहण किया ॥। ३०-३१ ॥
बुद्धेर्विशेषस्तत्रासीन्नोपदेशान्तरं मुनेः।
तन्त्रस्य कर्ता प्रथममग्निवेशो यतोऽभवत् ॥ ३२ ॥
अथ भेडादयश्चक्रुः स्वं स्वं तन्त्रं कृतानि च।
श्रावयामासुरात्रेयं सर्षिसंघं सुमेधसः ॥ ३३ ॥
श्रुत्वा सूत्रणमर्थानाम्मृषयः पुण्यकर्मणाम्।
यथावत्सूत्रितमिति प्रहृष्टास्तेऽनुमेनिरे ॥ ३४ ॥
सर्व एवास्तुवंस्तांश्च सर्वभूतहितैषिणः।
साधु भूतेष्वनुक्रोश इत्युच्चैरब्रुवन् समम् ॥ ३५ ॥
तं पुण्यं शुश्रुवुः शब्दं दिवि देवर्षयः स्थिताः।
सामराः परमर्षीणां श्रुत्वा मुमुदिरे परम् ॥ ३६ ॥
१—धर्मविशेषप्रसूताद् द्रव्यगुणकर्मसामान्यविशेषसमवायानां पदार्थानां
साधर्म्यवैधर्म्याभ्यां तत्त्वज्ञानान्निःश्रेयसम् । वैशेषिक०