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चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

इस महाचतुष्पाद नामक अध्याय में औषध, चतुष्पाद, गुण, भेषज के

१३० चरकसंहिता [ अ० ११
इसमें दो श्लोक हैं—
इस महाचतुष्पाद नामक अध्याय में औषध, चतुष्पाद, गुण, भेषज के
आश्रित प्रभाव, आत्रेय एवं मैत्रेय की दो प्रकार की बुद्धि, चार प्रकार के भेद
से रोग एवं उनके लक्षण कह दिये हैं, और उन कारणों का भी वर्णन कर दिया
है जिनसे वैद्य यशस्वी होता है ॥२३-२४॥
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते सूत्रस्थाने निर्देशचतुष्के
महाचतुष्पादो नाम दशमोऽध्यायः ॥ १० ॥
एकादशोऽध्यायः ।
—०*०—
अथातस्तिस्रैषणीयमध्यायं व्याख्यास्यामः ॥ १ ॥
इति ह स्माऽऽह भगवानात्रेयः ॥ २ ॥
अब 'तिस्रैषणीय' नामक अध्याय का व्याख्यान करेंगे, जैसा भगवान्
आत्रेय ने कहा था ॥२॥
इह खलु पुरुषेणानुपहत-सत्त्व-बुद्धि-पौरुष-पराक्रमेण हितमिह चामु-
ष्मिंश्च लोके समनुपश्यता तिस्र एषणाः पर्येष्टव्या भवन्ति, तद्यथा प्राणै-
षणा, धनैषणा, परलोकैषणेति ॥ ३ ॥
इस जगत् में जिस पुरुष का मन, ज्ञान, पौरुष, और पराक्रम मानसिक
बल नष्ट नहीं हुआ, जो इह लोक में और परलोक में हित चाहता है उस को
तीन एषणायें ( इच्छायें ) रखनी चाहियें, ( १ ) प्राणैषणा ( प्राण या जीवन
की इच्छा ), ( २ ) धनैषणा ( धन की इच्छा ), (३) परलोकैषणा ॥३॥
आसां तु खल्वेषणानां प्राणैषणां तावत्पूर्वतरमापद्येत । कस्मात् ?
प्राणपरित्यागे हि सर्वत्यागः । तस्यानुपालनं-स्वस्थस्य स्वस्थवृत्तित्रातु-
रस्य विकारप्रशमनेऽप्रमादः, तदुभयमेतदुक्तं वक्ष्यते च; तद्यथोक्तमनु-
वर्त्तमानः प्राणानुपालनाद्दीर्घमायुरवाप्नोतीति प्रथमैषणा व्याख्याता
भवति ॥४॥
इन तीनों एष्णाओं में से 'प्राणैषणा' को सब से प्रथम करे, क्योंकि प्राणों
के छूट जाने पर सब कुछ छूट जाता है। प्राणैषणा के लिये स्वस्थ ण ...
चाहिये कि स्वस्थवृत्त का पालन करे, जिससे कि वह रोगी न हो औ...
शान्त करने में प्रमादी न हो । स्वस्थवृत्त और रोगशान्ति के ...