चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
अ० २७ ] सूत्रस्थानम् ३५७
अ० २७ ] सूत्रस्थानम् ३५७
नातः कष्टतमं किञ्चिन्मध्वामाशाद्धि मानवम् ।
उपक्रमविरोधित्वात्सद्यो हन्याद्यथा विषम् ॥ २४६ ॥
आमे सोष्णा क्रिया कार्या सा मध्वामे विरुध्यते ।
मध्वामं दारुणं यस्मात्सद्यो हन्याद्यथा विषम् ॥ २४७ ॥
नानाद्रव्यात्मकत्वाच्च योगवाहि परं मधु ।
इतीक्षुविकृतिप्रायो वर्गोऽयं दशमो मतः ॥ २४८ ॥ •
इक्षुविकारवर्ग—गन्ने का दांतों से चूसकर खाया हुआ रस वीर्य-वर्द्धक,
शीतल, रेचक, स्निग्ध, पौष्टिक, मधुर एवं कफकारक होता है । यान्त्रिक (कोल्हू)
में पेल कर निकाला हुआ रस विदाहयुक्त हो जाता है । छिलके और गांठ के
योग से उसमें विदाह उत्पन्न होता है और बाहर धूप में वायु के योग से भी
विदाह उत्पन्न होता है । पौंण्डा (नरम छिलके का) गन्ना अधिक शीतल,
अधिक निर्मल (प्रसन्नता देने वाला) और अधिक मीठा होता है, बांस गन्ना
इससे उतर कर होता है ।
गुड़—अतिशय कृमि, मज्जा, रक्त, मेद, और मांस को बढ़ाता है । क्षुद्र
गुड़ ( काले रंग का गुड़ ), चार भाग तीन भाग और आधा भाग बचा-
कर गन्ने के रस से बनाये गुड़ की अपेक्षा पूर्वापर क्रम से गुरु हैं। अर्थात्
क्षुद्र गुड़ चार भाग से बने गुड़ से और चार भाग का गुड़ तीन भाग के
गुड़ से अधिक गुरु हैं। साफ़ करके बनाया हुआ अर्थात् थोड़े मल वाला गुड़
कम नुकसान करता । इसके पीछे मत्स्यण्डिका (राब) खांड, शक्कर, उत्तरो-
त्तर निर्मल-स्वच्छ होते जाते हैं और जिस प्रकार इनमें स्वच्छता बढ़ती है
उसी प्रकार शीतलता भी बढ़ती जाती है । अर्थात् राब से खाण्ड और खाण्ड
से शक्कर शीतल है ।
गुड़ से बनी शक्कर वीर्यवर्धक, क्षीण, उरःक्षत के रोगी के लिये हितकारी
स्नेहयुक्त होती है । धमासे के क्वाथ से बनाई शर्करा कषाय, मधुर रस, शीतल
और कुछ तिक्त होती है । मधु की शर्करा, रूक्ष, वमन, अतिसार नाशक,
छेदक (कफ आदि को तोड़ने वाली) होती है । तृष्णा रक्तपित्त और दाह रोग
में सब शर्करायें प्रशस्त हैं ।
मधु के गुण—मधु की चार जातियां हैं । यथा १. माक्षिक (बड़ी मक्खियों
या पिंगल रंग की मक्खियों से बना), २. भ्रामर (भ्रमरोंद्वारा बनाया) ३. क्षौद्र
(छोटी मक्खियों द्वारा बना) ४. पौत्तिक (पीली मक्खियों से बना श्वेत रंग का)।
इन चारों प्रकार के शहद में 'माक्षिक' शहद श्रेष्ठ है । भ्रमरों से बनाया मधु
विशेषतः गुरु होता है । माक्षिक शहद का रंग तेल के समान (पीला) और
३५८ चरकसंहिता [ अ० २७
पौत्तिक शहद का रंग घी के समान ( सफेद ) पीला होता है । क्षौद्र शहद
श्वेत होता है' ।
मधु—वायुकारक, गुरु, शीतल, रक्त-पित्त, कफना शक, व्रणों को जोड़ने
वाला, कफ मेद आदि को उखाड़ने वाला, रूक्ष, कषाय और मधुर होता है ।
मधु नाना प्रकार के फूलों से विषैली मक्खियों द्वारा उत्पन्न किया जाता है,
इसलिये इसे गरम करके देने से अथवा गरम अवस्था में मनुष्य को देने से
मारक होता है ।* मधु गुरु, रूक्ष और कषाय रस, तथा शीतल होने से थोड़ा
सेवन करना उत्तम है । मधु के अधिक खाने से उत्पन्न आम रोग जैसा
कष्टसाध्य दूसरा रोग नहीं है । क्योंकि इसकी चिकित्सा में विरोध है । इसलिये
विष की भांति मनुष्य को शीघ्र मार देता है । क्योंकि आम-विकार में उष्ण
क्रिया करनी चाहिये, वह मधु में विरुद्ध है; और मधु के हितकारी जो शीतल
क्रिया है, वह आमरोग के विरुद्ध है । इसलिये मधुजन्य आमरोग दारुण
रोग है, इसलिये वह विष की भाँति मनुष्य को शीघ्र मार देता है । नाना
प्रकार की रस-वीर्य वाली ओषधियों के पुष्पों से उत्पन्न होने के कारण मधु में
नाना प्रकार की शक्तियां छिपी रहती हैं । इसलिये तथा प्रभाव के कारण मधु
योगवाही अर्थात् वमनकारक, आस्थापन या वृष्य कर्म करने वाले जिस
द्रव्य के साथ दिया जाता है वैसा ही कार्य करता है । इस प्रकार से यह
दसवां इक्षुविकार-वर्ग समाप्त हुआ ॥ २३६-२४८ ॥
इतीक्षुवर्गः ।
अथ कृतान्नवर्गः ।
क्षुत्तृष्णा-ग्लानि-दौर्बल्य-कुक्षिरोग-विनाशिनी २ ।
स्वेदाग्निजननी पेया वातवर्चोऽनुलोमनी ॥ २४९ ॥
तर्पणी ग्राहिणी लघ्वी हृद्या चापि विलेपिका ।
१. सुश्रुत में आठ भेद किये हैं—
'पौत्तिकं भ्रामरं क्षौद्रं माक्षिकं छात्रमेव च ।
आर्घ्यमौद्दालिकं दात्रमित्यष्टौ मधुजातयः ॥'
- शिलाजतु, तैल आदि भी योगवाही हैं। योगवाही होने पर भी स्नेहन
कार्य में शहद प्रयुक्त नहीं होता । वायु में रूक्षादि गुण हैं । मधु में रूक्ष,
कषाय गुण विशेषतः स्पष्ट हैं ।
२. रोगज्वरापहा इति पाठः ।