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चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

अ० ८ ] निदानस्थानम् ४७७

अ० ८ ] निदानस्थानम् ४७७
कश्चिद्धि रोगो रोगस्य हेतुर्भूत्वा प्रशाम्यति ।
न प्रशाम्यति चाप्यन्यो हेतुर्थं कुरुतेऽपि च ॥ २३ ॥
ये रोग प्रथम स्वयं रोग रूप होते हैं, परन्तु पीछे से दूसरे रोगों के कारण
बन जाते हैं। परन्तु कई रोग दोनों कार्य करते हैं अर्थात् अपने आप रोग रूप
से रहते हुए भी कारण रूप बनकर दूसरे रोगों को उत्पन्न करते हैं। कोई रोग
दूसरे रोग को उत्पन्न करके स्वयं शान्त हो जाता है। परन्तु कई रोग स्वयं शान्त
न होकर दूसरे रोगों के कारण बनते हैं ॥ २२-२३ ॥
प्रयोगः शमयेद्व्याधिं योऽन्यमन्यमुदीरयेत् ।
नासौ विशुद्धः, शुद्धस्तु शमयेद्यो न कोपयेत् ॥ २४ ॥
एवं कृच्छ्रतमा नॄणां दृश्यन्ते व्याधिसंकराः ।
प्रयोगापरिशुद्धत्वात्तथा चान्योन्यसंभवात् ॥ २५ ॥
शुद्ध प्रयोग का लक्षण—इस प्रकार से मनुष्यों में होने वाले अनेक प्रकार
के कष्टसाध्य रोग दिखाई पड़ते हैं। एक औषध का प्रयोग अविशुद्ध होने से
तथा एक से दूसरा रोग उत्पन्न होने से व्याधियों का संकर अर्थात् मिश्रण
दिखाई देता है १। जो प्रयोग एक रोग को शान्त करे परन्तु साथ में दूसरे रोग
को उत्पन्न कर दे वह प्रयोग विशुद्ध नहीं। शुद्ध प्रयोग तो वही है जो उपस्थित
रोग को शान्त करदे तथा नया रोग उत्पन्न न करे ॥२४-२५॥
एको हेतुरनेकस्य तथैकस्यैक एव हि ॥ २४-२५ ॥
व्याधेरेकस्य चानेको बहूनां बहवोऽपि च ॥ २६ ॥
ज्वरभ्रमप्रलापाद्या दृश्यन्ते रूक्षहेतुजाः ।
रूक्षेणैकेन चाप्येको ज्वर एवापजायते ॥ २७ ॥
हेतुभिर्बहुभिश्चैको ज्वरो रूक्षादिभिर्भवेत् ।
रूक्षादिभिर्ज्वराद्याश्च व्याधयः संभवन्ति हि ॥ २८ ॥
कारण भेद—अनेक रोगों का एक कारण, एक रोग का एक ही कारण,
एक रोग के अनेक कारण, बहुत से रोगों के बहुत से कारण भी होते हैं। जैसे—
एक रूक्ष कारण से ज्वर, भ्रम, प्रलाप आदि बहुत रोग होते हैं। एक रूक्ष
कारण से ज्वर रूप एक ही रोग उत्पन्न होता है। रूक्ष आदि बहुत से कारणों
जिस प्रकार अतिसार रोग में अफीम आदि देकर स्तम्भन करने से
कुक्ष का शूल हो जाता है। एक समान रूप होने से प्रतिश्याय से कास
जाता है।

४७८ चरकसंहिता [ अ० ८

को लेकर ज्वर एक ही रोग उत्पन्न होता है और रूक्ष आदि बहुत से कारणों
से ज्वर आदि अनेक रोग भी उत्पन्न होते हैं ॥ २६-२८ ॥
लिङ्गं चैकमनेकस्य तथैवैकस्य लक्ष्यते ।
बहून्येकस्य च व्याधेर्बहूनां स्युर्बहूनि च ॥ २९ ॥
विषमारम्भमूलानां लिङ्गमेकं ज्वरो मतः ।
ज्वरस्यैकस्य चाप्येकः संतापो लिङ्गमुच्यते ॥ ३० ॥
विषमारम्भमूलैश्च ज्वर एको निरुच्यते ।
लिङ्गैरैतैर्ज्वरश्वासहिक्काद्याः सन्ति चाऽऽमयाः ॥ ३१ ॥
लक्षण भेद—अनेक रोगों का एक लक्षण, एक रोग का एक ही लक्षण, एक
रोग के बहुत से लक्षण और अनेक रोगों के बहुत से लक्षण होते हैं । जैसे—उष्मा
की विषमता से उत्पन्न होने वाले रोगों का ज्वर रूप एक लक्षण होता है । ज्वर
रोग का एक ही लक्षण सन्ताप है । विषमारम्भ मूलक अनेक लक्षणों से युक्त
अकेला ज्वर होता है । इसी प्रकार विषमारम्भ मूलक लक्षणों से ज्वर, श्वास,
हिचकी आदि अनेक रोग होते हैं ॥ २६-३१ ॥
एका शान्तिरनेकस्य तथैवैकस्य लक्ष्यते ।
व्याधेरेकस्य चानेका बहूनां बह्व्य एव च ॥ ३२ ॥
शान्तिरामाशयोत्थानां व्याधीनां लङ्घनक्रिया ।
ज्वरस्यैकस्य चाप्येका शान्तिर्लङ्घनमुच्यते ॥ ३३ ॥
तथा लघ्वशनाद्याश्च ज्वरस्यैकस्य शान्तयः ।
एताश्चैव ज्वरश्वासहिक्कादीनां प्रशान्तयः ॥ ३४ ॥
चिकित्सा विधान—अनेक रोग एक ही चिकित्सा से शान्त होजाते हैं,
एक रोग की शान्ति एक ही प्रकार से, एक रोग की शान्ति अनेक प्रकार से
और अनेक रोगों की शान्ति अनेक प्रकार से भी होती है । जैसे आमाशय से
उत्पन्न होने वाले अनेक रोगों की शान्ति उपवास क्रिया से, ज्वर अकेले की
शान्ति उपवास से हो जाती है । इसी प्रकार अकेले ज्वर को शान्त करने के
लिये लघु भोजन आदि अनेक उपाय हैं । लघु भोजन आदि अनेक उपाय ज्वर,
श्वास, हिचकी आदि अनेक रोगों को शान्त करते हैं ॥ ३२-३४ ॥
सुखसाध्यः सुखोपायः कालेनाल्पेन साध्यते ।
साध्यते कृच्छ्रसाध्यस्तु यत्नेन महता चिरात् ॥ ३५ ॥
सुखसाध्य और कृच्छ्रसाध्य—सुखसाध्य रोग, सुखपूर्वक चिकित्सा
पर थोड़े समय में अच्छा हो जाता है । कष्टसाध्य रोग बहुत प्रयत्न
देर में अच्छा होता है ॥ ३५ ॥