चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
अ० २६ ] सूत्रस्थानम् ३०७
अ० २६ ] सूत्रस्थानम् ३०७
प्रभाव से (कटु रस का कटु विपाक) पुरुषत्व का नाश करता है। रस और
वीर्य के प्रभाव से संज्ञानाश करता है। ग्लानि उत्पन्न करता है, अवसन्न करता
है, कर्षण (निर्बल) करता है, मूर्च्छित करता है, शरीर को झुकाता है,
अन्धकार लाता है, चक्कर लाता है, गले में जलन तथा शरीर में तापज्वर
उत्पन्न करता है। बल को कम करता है, प्यास को पैदा करता है। वायु,
अग्नि गुण की अधिकता होने से चक्कर; मुख ओठ में जलन, कंपकपी, चुभने
की सी दर्द, भेदन जैसी पीड़ा, पांव, हाथ, पार्श्व पसलियों और पीठ में बात
विकार उत्पन्न करता है ॥ (४) ॥
तिक्तो रसः स्वयमरोचिष्णुररोचकघ्नो विषघ्नः कृमिघ्नो मूर्च्छा-
दाह-कण्डू-कुष्ठ-तृष्णा-प्रशमनः त्वङ्मांसयोः स्थिरीकरणो ज्वरघ्नो दीपनः
पाचनः स्तन्यशोधनो लेखनः क्लेद-मेदो-वसा-मज्ज-लसीका-पूय-स्वेद-मूत्र-
पुरीष-पित्त-श्लेष्मोपशोषणो रूक्षः शीतो लघुश्च । स एवंगुणोऽप्येक एवा-
त्यर्थमुपयुज्यमानो रौक्ष्यात् खरविशदस्वभावाच्च रस-रुधिर-मांस-मेदोऽ-
स्थि-मज्ज-शुक्राण्युच्छोषयति, स्रोतसां खरत्वमुपपादयति, बलमादत्ते,
कर्षयति, ग्लपयति, मोहयति, भ्रमयति, वदनमुपशोषयति, अपरांश्च
वातविकारानुपजनयति, ॥ (५) ॥
तिक्त रस अपने आप अरुचिकारक होने पर भी दूसरे भोजनों में रुचि
उत्पन्न करता है, इसलिये अरोचकनाशक है। विषनाशक, कृमिनाशक, मूर्च्छा,
जलन, खाज, फोढ़ और प्यास को शान्त करने वाला, त्वचा मांस को स्थिर
करने वाला, ज्वरनाशक, अग्निदीपक, पाचक, दूध का शोधन करने वाला,
लेखन करने वाला, क्लेद, मेद, वसा, मज्जा, लसीका, पूय, स्वेद, मूत्र पुरीष
(मल) पित्त, कफ को सुखाता है, रूक्ष, शीत और लघु है।
यही रस अधिक मात्रा में सेवन करने से रूक्ष, कर्कश और विशद स्वभाव
होने से रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा और शुक्र का शोषण करता है,
स्रोतों में खरता उत्पन्न करता है, बल लेता है, शरीर की स्थूलता का कर्षण
करता है, हर्ष का क्षय करता है, संज्ञानाश करता है, चक्कर उत्पन्न करता
है, मुख में शुष्कता उत्पन्न करता है और अन्य वात रोगों को भी उत्पन्न
करता है ॥ (५) ॥
कषायो रसः संशमनः १ संग्राही संधारणः पीडनो रोपणः शोषणः
१ इति च पाठः ।
३०८ चरकसंहिता [ अ० २६
स्तम्भनः श्लेष्म-पित्त-रक्त-प्रशमनः शरीरक्लेदस्योपयोक्ता, रूक्षः शीतो
गुरुश्च । स एवंगुणोऽप्येक एवात्यर्थमुपयुज्यमान आस्यं शोषयति,
हृदयं पीडयति, उदरमाध्मापयति, वाचं निगृह्णाति, स्रोतांस्यवबध्नाति,
श्यावत्वमापादयति, पुंस्त्वमुपहन्ति, विष्टभ्य जरां गच्छति, वातमूत्र-
पुरीषाण्यवगृह्णाति, कर्षयति, ग्लापयति, तर्षयति, स्तम्भयति, खर-
विशद-रूक्षत्वात्पक्ष-वध-महापतानकार्दित-प्रभृतींश्च वातविकारानुपन-
नयतीति ॥ ( ६ ) ॥
कषाय रस संशमन करने वाला, संग्राहक, सन्धारक, व्रण का पीड़न करने
वाला, रोपण, व्रण को शुष्क करने वाला, स्तम्भन, कफ, रक्त, पित्तनाशक,
शरीर में क्लेद को चूसने वाला, रूक्ष, शीत और गुरु है। यही रस अधिक
मात्रा में उपयोग करने से मुख को सुखा देता है, हृदय को पीड़ित करता है,
उदर में वायु से फुलाव उत्पन्न करता है, वाणी को जड़ कर देता है, स्रोतों को
बन्द कर देता है, कृष्णता उत्पन्न करता है, पुरुषत्व को नष्ट करता है, अन्न
को अवरोध करके पचन कराता है, वात, मूत्र, मल, रेतस् (शुक्र) को बन्द
कर देता है, रोक देता है, शरीर को कर्षण करता है, म्लान कर (मुरझा)
देता है, प्यास लगाता है, जकड़ देता है। खर, विशद और रूक्ष होने से
पक्षवध, हनुग्रह, मन्याग्रह, पृष्ठग्रह, अपतानक, अर्दित आदि वात रोगों को
उत्पन्न करता है ॥ ( ६ ) ॥
एवमेते षड् रसाः पृथक्त्वेनैकत्वेन वा मात्रशः सम्यगुपयुज्यमाना
उपकारकरा भवन्त्यात्मलोकस्य, अपकारकराः पुनरतोऽन्यथोपयुज्य-
मानाः । तान् विद्वानुपकारार्थमेव मात्रशः सम्यगुपयोजयेदिति ॥ ४१ ॥
इस प्रकार से ये छः रस पृथक् पृथक् या दो या तीन अथवा सब परस्पर,
मिलकर मात्रा में योग्य प्रमाण से सेवन करने से सर्व प्राणिमात्र को आरोग्य
पुष्टि देकर उपकार करते हैं और असम्यक् रूप में उपयोग करने से सब प्राणियों
का अपकार करते हैं। इसलिये बुद्धिमान् मनुष्य को चाहिये कि इन को मात्रा
में सम्यक् प्रकार से बरतें ॥ ४१ ॥
भवन्ति चात्र—शीतं वीर्येण यद् द्रव्यं मधुरं रसपाकयोः ।
तयोरम्लं यदुष्णं च यच्चोष्णं कटुकं तयोः ॥ ४२ ॥
तेषां रसोपदेशेन निर्देश्यो गुणसंग्रहः ।
वीर्यतोऽविपरीतानां पाकस्तश्चोपदेक्ष्यते ॥ ४३.॥