चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
अ० ८] विमानस्थानम् ६११
अ० ८] विमानस्थानम् ६११
(सौँफ का भेद), लाल कोकिलाक्ष, श्रावणी (रक्तमुण्डेरी), महाश्रावणी
(श्वेतमुण्डेरी), अलंबुषा, सहदेवी, पीतपुष्पा (बला), विश्वदेवा लालफूल-
वाली, दण्डोत्पला, शुक्ला, निशोथ, बला, अतिबला, विदारी, क्षीरविदारी,
क्षुद्रसहा (ऐन्द्री), लालकुरवक, श्वेत कुरवक, भरासङ्गा, कुजकतरणी, श्वेत
कुरवक, ऋष्यगन्धा, असगन्ध, संहवां (जन्तुकारी), गोलरू, बन्दाक,
शतावरी, सौँफ, महुए का भेद, मुलहठी, मधूलिका, किसमिस, खजूर, फालसा,
कौँच, कमल के बीज, कसेरू, राजकसेरू, पियाल, कतक, गम्भारी, शीतला,
नील झिण्टी, ताल और खजूर, मुस्तका, गभा, ईक्षुबालिका, दर्भ, कुश, काश,
लाल चावल, गुन्द्रा (शरभेद), इत्कट, शरमूल, राज सरसों, (पीली सरसों)
ऋष्यप्रोक्ता वा शतावरी भेद कपिकच्छू (कौंचू), दारदा, (साल) भारद्वाजी
(जंगली कपास), जंगली खीरा, शतावरी भेद, (हंसपादिका) हंस के पांव
के समान आकार की लता, काकनासा, पेटिका, क्षीरलता, छोटी इलायची,
अनन्त मूल, यष्टिमधु का भेद कपोतवल्ली (ब्राह्मी भेद) और सोमलता,
गोपवल्ली और मधुवल्ली।
एषामेवंविधानामन्येषां च मधुरवर्ग-परिसंख्यातानामौषधद्रव्याणां
च्छेद्यानि खण्डशश्छेद्यित्वा भेद्यानि चाणुशो भेदयित्वा प्रक्षाल्य पानी-
येन सुप्राक्षालितायां स्थाल्यां समावाप्य पयसाऽर्धोदकेनाभ्यासिच्य
साधयेद्दर्ध्या सततमुपघट्टयन, तदुपयुक्तभूयिष्ठेऽम्भसि गतरसेष्वौष-
धेषु पयसि चानुपदग्धे स्थालीमपहृत्य सुपरिपूतं पयः सुखोष्णं घृत-तैल-
वसा-मज्ज-लवण-फाणितोपहितं बस्तिं वातविकारिणे विधिज्ञो विधि-
वद्दद्यात्, शीतं तु मधुसर्पिर्भ्यामुपसंसृज्य पित्तविकारिणे विधिवद्द-
द्यादिति मधुरस्कन्धः ॥ १३६ ॥
इन अथवा अन्य इस प्रकार के मधुरवर्ग में पठित औषध द्रव्यों में जो
द्रव्य छेदन के योग्य हों, उनके टुकड़े २ करके और जो फोड़ने के योग्य हों,
उनको फोड़कर छोटे २ टुकड़े बनाकर पानी से भली प्रकार धोकर थाली में
रखना चाहिये। डेग ताम्बा, लोहा या मिट्टी की लेनी चाहिये। डेग को नीचे से
लेप देना चाहिये। इस डेग में दूध में आधा पानी मिलाकर डाल देना
चाहिये। इस डेग को अग्नि पर रख कर कोमल आंच से धीरे धीरे पकाना
चाहिये। पकाते समय कड़छी से निरन्तर चलाते जाना चाहिये। जिस समय
पानी लगभग सूख जाये, औषधियों में से रस निकल आये, दूध का जलना
आरम्भ न हो, तब डेग को उतार कर वस्त्र से छान लेना चाहिये। फिर इस
दूध को कुछ गरम रखकर घी, तेल आदि चर्बी, मज्जा का मेल आदि मिला-कर
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वातरोगी को विधिपूर्वक आस्थापन नामक बस्ति दे। दूध के ठण्डा होने पर घी
या मधु मिला कर पित्त विकार के रोगी को विधिपूर्वक बस्ति दे। यह मधुर-
स्कन्ध हुआ ॥ १३६ ॥
आम्राम्रातक-लकुच-करमर्द-वृक्षाम्लाम्लवेतस-कुवल बदर-दाडिम-
मातुलुङ्ग-गण्डीरामलक-नन्दीतक-शीतक-तिन्तिडीक-दन्तशठैरावतक-
कोषास्र-धन्वनानां फलानि, पत्राणि चाम्रातकाश्मन्तक-चाङ्गेरीणां चतु-
र्विधानां चाम्लिकानां द्वयोः कोल्योश्चाम-शुष्कयोर्द्वयोश्चैव शुष्काम्लिक-
योर्ग्राम्यारण्ययोः, वासव-द्रव्याणि च सुरा-सौवीर-तुषोदक-मैरेय-मेदक-
मदिरा-मधु-सीधु-शुक्त-दधि-दधिमण्डोदश्विद्धान्याम्लादीनि च ।
अम्लद्रव्यस्कन्ध- आम, आमड़ा, बड़हल (डहु), करौंदा, इमली, अम्ल
वेतस, कुवल और बदर (बेर के भेद), अनार, बिजौर, गण्डीर (समष्ठिल,
काकाम्र) आंवला नन्दीतक (तून), जललोटक (कालमेघ), निम्बु, ऐरावतक
(नारंगी), तिन्तिडीक (अमली), कच्चा आम और धन्वन (धामन), दन्तशठ
(कैथ) के फल, आम्रातक, अश्मन्तक (कचनार का भेद) और चांगेरी (शाक)
इनके पत्ते, चारों प्रकार का इमली, शुष्क आम, दोनों प्रकार के बेर, चार प्रकार
की इमली, (ग्राम्य और जंगली शुष्क और आर्द्र भेद से चार प्रकार की) इनके
पत्ते, आसव द्रव्य, सुरा, सौवीरक, तुषोदक, मेदक, मदिरा, मधु, सीधु, शुक्त,
दही, मस्तु, उदश्वित्, धान्याम्ल आदि ।
एषामेवंविधानां चान्येषां चाम्ल-वर्गे-परिसंख्यातानामौषधद्रव्याणां
छेद्यानि खण्डशश्छेदयित्वा भेद्यानि चाणुशो भेदयित्वा द्रवैः स्थिराण्य-
वसिच्य साधयित्वोपसंस्कृत्य यथावत्तैल-वसा-मधु-मज्ज-लवण-फाणि-
तोपहितं सुखोष्णं बस्तिं वात-विकारिणे विधिज्ञो विधिवद्दद्यादित्य-
म्लस्कन्धः ॥ १३७ ॥
अम्लस्कन्ध में गिने इन और इन के समान अन्य औषध द्रव्यों के टुकड़े
करके, छोटा छोटा चूर्ण बना कर सुरा-सौवीर आदि द्रवों से सिंचन करके डेग
में रख कर पूर्व की भांति सिद्ध करना चाहिये । सिद्ध होने पर इसमें तेल, वसा,
मज्जा, नमक, राब मिलाकर थोड़ी गरम अवस्था में वातरोगी को विधिपूर्वक
आस्थापन बस्ति देनी चाहिये । यह अम्लस्कन्ध है ॥१३७॥
सैन्धव-सौवर्चल-कालविङ्ग-पाक्यान्प-कूप्य-बालुकैल-मौलक-सामुद्र-
रोमकौद्भिदौषर-पाटेयक-पांशुजानीत्येवंप्रकाराणि चान्यानि लवण-वर्ग-
परिसंख्यातानि, एतान्यम्लोपहितान्युष्णोदकोपहितानि वा स्नेहवन्ति
सुखोष्णं बस्तिं वात-विकारिणे विधिज्ञो विधिवद्दद्यादिति लवणस्कन्धः ॥