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चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

अ० २७ ] सूत्रस्थानम् ३४६

अ० २७ ] सूत्रस्थानम् ३४६
रोग में हितकारी, वायुनाशक तथा स्तन्य (दूध) और रक्तक्षय में उपकारी
है। मदिरा (सुरामण्ड) हिचकी, श्वास, प्रतिश्याय, कास, मलाबरोध, अरुचि,
वमन, अफारा, विबन्ध में हितकारी एवं वायुनाशक है। जगल (अन्न से बनी
सुरा) शूल, प्रवाहिका, अफारा, कफ-वायु और अर्शरोग में हितकारी संग्राही,
रूक्ष, उष्ण, शोफनाशक और अन्न को पचाने वाली है। अरिष्ट (औषध क्वाथ
से सम्पादित) शोष, अर्श, ग्रहणी, पाण्डु, अरुचि, ज्वर एवं कफजन्य रोगों को
नष्ट करता है, रोचक और अग्निवर्धक है। शर्कर (शर्करा का प्राकृतिक
आसव) खाने में प्रिय, सुखपूर्वक नशा करने वाला, सुगन्धित, बस्तिरोगनाशक
जीर्ण होकर पचने वाला. हृदय को प्रिय, वर्ण, कान्तिकारक है। पक्व रस (गन्ने
के रस को पका कर बनाने पर) रोचक, अग्निदीपक, हृद्य, शोष, शोफ, अर्श
रोग में हितकारी, स्नेह-श्लेष्मा के रोगों का नाशक और कान्तिकारक है। शीत
रस (गन्ने के अपक्व रस से बनाया) लाघवकारक, विबन्धनाशक, स्वर वर्ण
को साफ करने वाला, लेखन, शोफ, उदर, अर्श रोग में हितकारी है। गौड
(गुड़ से बना) मद्य रेचक, वायु का अनुलोमक, तृप्तिकारक और अग्निवर्धक
है। बहेड़े का मद्य पाण्डुरोग, व्रण में हितकारी और दीपक है। सुरासव
(सुरा को ही पानी के स्थान पर जहाँ व्यवहार करें) तीव्र मदकारी, वायु-
नाशक, मुख और शरीर के लिये प्रिय है। महुवे के फूलों से बना आसव छेदक
और तीक्ष्ण है, मैरेय १ मधुर और गुरु है। धाय के फूलों से बना आसव हृद्य,
रूक्ष, रोचक और दीपक है। मृद्वीका रस और गन्ने के रस को मिलाकर तैयार
किया हुआ आसव माध्वीक से बने आसव के समान गरम नहीं, रोचक, दीपक,
हृद्य, बलकर और पित्त के लिये अविरोधी है। मधु प्रधान आसव विबन्धना-
शक, कफनाशक, लघु और थोड़ी वायुकारक है। मण्ड के साथ सुरा (यव-
तण्डुलों से बनी) रूक्ष, उष्ण, वात-पित्तकारक है। मधूलक (गेहूँ से बनी मद्य)
गुरु, पेट में अफारा करके जीर्ण होती है, कफकारक है। धान्य-तुष से बनी
कांजी दीपक, लघु, हृदय पांडु, कृमि, रोगनाशक, ग्रहणी, अर्शरोग में हितकारी
और रेचक है। खट्टी कांजी के पीने से दाह, ज्वर नष्ट होता है, वात-कफ-
नाशक, विबन्धनाशक, अविदांही, दीपक है। नवीन मद्य प्रायः गुरु और दोष
प्रकोपक होता है। पुराना २ मद्य स्रोतों का शोधक, दीपक, लघु, रुचिकर, हर्षों-
१. मैरेय—'आसवस्य सुरायाश्च द्वयोरेकत्र भाजने ।
सन्धानं तद् विजानीयान् मैरेयमुभयाश्रयम् ॥'
२. एक वर्ष के पीछे शराब पुरानी मानी जाती है ।