चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
अ० १८ ] १५ सूत्रस्थानम् २३५
अ० १८ ] १५ सूत्रस्थानम् २३५
सूजन होने पर जिसका शरीर सोया हुआ, (चेतना, स्पर्श ज्ञान का अभाव)
सा प्रतीत हो, पीड़ा होती हो, दबाने पर फिर जल्दी से ऊपर उठ जाता हो,
उसे वातजन्य शोथ समझना चाहिये और जिस शोथ का रंग लाल, काला हो,
जो सूजन रात्रि में नष्ट हो जाती है, एवं स्वेदन, उष्ण क्रिया अथवा मर्दन से
हां जाता है, वह वातजन्य शोथ है। जिस शोथ में रोगी को प्यास बहुत लगे,
ज्वर की पीड़ा हो, जलन हो, पकता हो, पसीना आता हो, नरम पड़ता हो, गन्ध
आती हो, वह पित्तजन्य शोथ है। जिस में कि त्वचा, नेत्र, मूत्र पीले हो जाते
हों, और जो कि प्रथम बीच में से सूजता हो, त्वचा जिसमें पतली हो और रोगी
को अतिसार हो तो उसे पित्तजन्य शोथ समझना चाहिये। जो सूजन ठण्डी,
पसीना न हो, जो हिले जुले नहीं, जिसमें खाज उठती हो, जिसका रंग धूसर
हो, दबाने से फिर ऊपर उठ जाये, वह सूजन कफजन्य है। जिस में कि शस्त्र
या कुशा से काटने पर रक्त नहीं बहता, अथवा कठिनाई से थोड़ा थोड़ा चिकना
स्राव बहता है, वह सूजन भी कफजन्य है। दो दोषों के कारणों से दो दोषों
के लक्षणों वाला संसर्गजन्य (द्विदोषज) शोथ होता है। सब दोषों के मिलने
से सब लक्षणों वाला सन्निपातजन्य शोथ होता है ॥ ११-१७ ॥
यस्तु पादाभिनिर्वृत्तः शोथः सर्वाङ्गगो भवेत् ।
जन्तोः स च सुकष्टः स्यात्प्रसूतः स्त्रीमुखाच्च यः ॥ १८ ॥
यश्चापि गुह्यप्रभवः स्त्रियो वा पुरुषस्य वा ।
स च कष्टतमो ज्ञेयो यस्य च स्युरुपद्रवाः ॥ १६ ॥
जो सूजन पुरुषों के पांव से आरम्भ करके और स्त्रियों के मुख से प्रारम्भ
होकर सम्पूर्ण शरीर में फैल जाता है वह कष्टसाध्य होता है और जो शोथ स्त्री
या पुरुष के गुह्य भाग से प्रारम्भ होकर सारे शरीर में फैलता है, अथवा जिस
शोथ में उपद्रव हो, वह शोथ तो अति अधिक कष्टसाध्य है ॥ १८-१६ ॥
छर्दिः श्वासोऽरुचिस्तृष्णा ज्वरोऽतीसार एव च ।
सप्तकोऽयं सदौर्बल्यः शोथोपद्रवसंग्रहः ॥ २० ॥
उपद्रव—वमन, श्वास, अरुचि, प्यास, ज्वर, अतीसार और निर्बलता
संक्षेप में ये सात शोथ के उपद्रव हैं ॥ २० ॥
यस्य श्लेष्मा प्रकुपितो जिह्वामूलेऽवतिष्ठते ।
आशु संजनयेच्छोथं जायतेऽस्योपजिह्विका ॥ २१ ॥
यस्य श्लेष्मा प्रकुपितः काकले व्यवतिष्ठते ।
आशु संजनयेच्छोफं करोति गलशुण्डिकाम् ॥ २२ ॥
२२६ चरकसंहिता [ अ० १८
यस्य श्लेष्मा प्रकुपितो गलबाह्येऽवतिष्ठते ।
शनैः संजनयेच्छोथं गलगण्डोऽस्य जायते ॥ २३ ॥
यस्य श्लेष्मा प्रकुपितस्तिष्ठत्यन्तर्गले स्थितः ।
आशु संजनयेच्छोथं जायतेऽस्य गलग्रहः ॥ २४ ॥
उपजिह्विका रोग— जब कफ कुपित होकर जिह्वा की जड़ में एकत्र होकर
शोथ उत्पन्न करता है, उसे ‘उपजिह्विका’ कहते हैं। गलशुण्डिका—जब कफ
कुपित होकर काकल गलग्रन्थि का आश्रय लेकर शोथ उत्पन्न करता है, तब
इस रोग को 'गलशुण्डिका' कहते हैं। जब कफ कुपित होकर गले के बाहर
आकर शोथ उत्पन्न करता है, तब इसे 'गलगण्ड' कहते हैं। यह सूजन बहुत
धीरे धीरे होता है। जब कफ कुपित होकर गले के अन्दर रहकर शीघ्र ही सूजन
उत्पन्न करता है, उसे 'गलग्रह' ( गले का रुक जाना, स्वर का बंट
जाना ) कहते हैं ॥२१-२४॥
यस्य पित्तं प्रकुपितं सरक्तं त्वचि सर्पति ।
शोथं सरागं जनयेद्विसर्पस्तस्य जायते ॥ २५ ॥
यस्य पित्तं प्रकुपितं त्वचि रक्तेऽवतिष्ठते ।
शोथं सरागं जनयेत् पिडका तस्य जायते ॥ २६ ॥
यस्य पित्तं प्रकुपितं शोणितं प्राप्य शुष्यति ।
तिलका विप्लवो व्यङ्गो नीलिका चास्य जायते ॥ २७ ॥
यस्य पित्तं प्रकुपितं शङ्खयोरवतिष्ठते ।
श्वयथुः शङ्खको नाम दारुणस्तस्य जायते ॥ २८ ॥
यस्य पित्तं प्रकुपितं कर्णमूलेऽवतिष्ठते ।
ज्वरान्ते दुर्जयोऽन्ताय शोथस्तस्योपजायते ॥ २९ ॥
जब पित्त कुपित होकर रक्त के साथ मिलकर त्वचा में फैलता है, तब
लाल रंग की सूजन उत्पन्न होती है, इस को 'विसर्प' कहते हैं। जब पित्त
कुपित होकर रक्त के साथ त्वचा में स्थिर हो जाता है, तब लाल रंग के
उत्पन्न शोथ को 'पिडका' (फुन्सी) कहते हैं। जब कुपित पित्त रक्त में पहुंच-
कर शुष्क हो जाता है तब नीलिका, तिल, व्यंग, चर्मकील, लसन, झांई आदि
रोग होते हैं। जब कुपित पित्त शंखप्रदेश ( कनपटी ) में आकर रुक जाता
है, तब 'शंखक' नाम का भयानक शोथ उत्पन्न होता है। जब कुपित पित्त
कान की जड़ में आकर रुक जाता है, तब ज्वर के अन्त में भयंकर सूजन
उत्पन्न होती है, यह सूजन मारक होती है ॥२५-२९॥