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चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

अ० १३ ] सूत्रस्थानम् १६७

अ० १३ ] सूत्रस्थानम् १६७
जिसको ग्रहणी (अग्नि का अधिष्ठान-भूमि) प्रबल पित्तवाली हो (कफ
और वायु से युक्त न हो), और जिसका अग्निबल बढ़ा होता है, उस पुरुष
का पिया हुआ स्नेह अग्नि के तेज से शीघ्र भस्म हो जाता है। यह महा-
बलवान् जाठराग्नि पीये हुए स्नेह को जीर्ण करके फिर बलवान् बनकर ओज
को घटाती हुई, उपद्रवों से युक्त प्रबल प्यास को पैदा कर देती है। ऐसी
अवस्था में स्नेह के कारण बहुत बढ़ी हुई जाठराग्नि को शान्त करने के लिये
गुरु भोजन भी समर्थ नहीं होता। इसलिये स्नेहपान से प्रबल अग्नि वाले पुरुष
को यदि शीतल जल पीने के लिये नहीं दिया जाय तो वह इसी अग्नि से जलने
लगता है। जिस प्रकार कि घास फूस या कांटों के बीच में फंसा हुआ सांप
अपनी अग्नि रूपी अपने विष से स्वयं जलने लगता है और दुगुने क्रोध से
फुंकारें मारता है ॥ ७०-७२ ॥
व्यापत्तियों के उपाय कहते हैं—
अजीर्णे यदि तु स्नेहे तृष्णा स्याच्छर्दयेद्भिषक् ॥ ७३ ॥
शीतोदकं पुनः पीत्वा भुक्त्वा रूक्षान्नमुल्लिखेत् ।
न सर्पिः केवलं पित्तं पेयं सामे विशेषतः ॥ ७४ ॥
सर्वं ह्यनुरजेद्देहं हत्वा संज्ञां च मारयेत् ।
यदि स्नेह के पान में अजीर्णावस्था अर्थात् स्नेह के जीर्ण न हुए बिना
ही प्यास लगने लगे तब वैद्य स्नेह को वमन से बाहर करा देवे। इसके पीछे
शीतल जल और रूक्ष भोजन कराके फिर वमन करा देवे। इसलिये केवल
पित्त की प्रधानता में, विशेष कर आम सहित पित्त विकार में घी नहीं पीना
चाहिये। क्योंकि पित्त के तीक्ष्ण गुणवाला होने से सम्पूर्ण देह में व्याप्त होने
वाला घी रूप स्नेह सारे शरीर में फैल जायगा। शरीर में फैलकर उसको पीला
कर देता और चेतना नाश करके प्राण नाश कर देता है ॥ ७३-७४ ॥
तन्द्रा सोत्क्लेश आनाहो ज्वरः स्तम्भो विसंज्ञता ॥ ७५ ॥
कुष्ठानि कण्डूः पाण्डुत्वं शोफाशांस्यरुचिस्तृषा ।
जठरं ग्रहणीदोषः स्तेमित्यं वाक्संनिग्रहः ॥ ७६ ॥
शूलमामप्रदोषाश्च जायन्ते स्नेहविभ्रमात् ।
तत्राप्युल्लेखनं शस्तं स्वेदः कालप्रतीक्षणम् ॥ ७७ ॥
प्रति प्रांते व्याधिबलं बुद्ध्वा संस्रसनमेव च ।
तक्रारिष्टप्रयोगश्च रूक्ष-पानान्न-सेवनम् ॥ ७८ ॥
मूत्राणां त्रिफलायाश्च स्नेह-व्यापत्ति-भेषजम् ।

१६८ चरकसंहिता [ अ० १३
तन्द्रा (आलस्य), उत्क्लेश (वमन की इच्छा), आनाह (अफरा)
ज्वर, स्तम्भ (शरीर की जड़ता), संज्ञानाश, कुष्ठ, खाज, पाण्डुता, शोथ,
अर्श, अरुचि, प्यास, मरोड़ा, ग्रहणी रोग, स्तैमित्य (अंगों का गीले कपड़े में
लिपटने का सा भान होना, वा ऐंठन), वाणी का बन्द हो जाना, उदरशूल,
आमदोष, स्नेह के मिथ्यायोग के ये लक्षण हैं। इन लक्षणों के होने पर भी वमन
कराना चाहिये, स्वेद देना चाहिये, समय की प्रतीक्षा करनी (स्नेह दोष के
क्षय होने तक भोजन नहीं करना) चाहिये, प्रत्येक व्याधि का बल विचार
करके जो व्याधि संशमन योग्य हो उसका संशमन करना चाहिये। इसी प्रकार
'तक्रारिष्ट' का प्रयोग, रूक्ष (सूखा) खान-पान देना आठों प्रकार के मूत्रों
और त्रिफला का सेवन करना स्नेह जन्य रोगों की चिकित्सा है ॥ ७५-७८ ॥
रोग होने के कारण—
अकाले चाहितश्चैव मात्रया न च योजितः ॥ ७९ ॥
स्नेहो मिथ्योपचाराच्च व्यापद्येतातिसेवितः ।
स्नेह लेने के ठीक समय पर स्नेह न लेने से, जो स्नेह जिस पुरुष के
लिये हितकारी नहीं है उसके सेवन से, उचित मात्रा में न लेने से, स्नेह के
मिथ्या, अनुचित उपयोग से, और स्नेह के अति सेवन से स्नेह जन्य विकार
उत्पन्न होते हैं ॥ ७९ ॥
स्नेहात्प्रस्कन्दनं जन्तुस्त्रिरात्रोपरतः पिबेत् ॥ ८० ॥
स्नेहवद् द्रवमुष्णं च त्र्यहं भुक्त्वा रसौदनम् ।
एकाहोपरतस्तद्वद्भुक्त्वा प्रच्छर्दनं पिबेत् ॥ ८१ ॥
स्नेह पान के पीछे पुरुष तीन रात तक ठहरे। इन तीन दिनों में स्नेह
मिश्रित द्रव, उष्ण मांस रस युक्त भात खाकर विरेचन लेवे। एक दिन जिसने
आराम किया ऐसा पुरुष पहिले की भांति भोजन करके वमन (कारक द्रव्य)
पीये ॥ ८०-८१ ॥
स्याच्चसंशोधनार्थायै वृत्तिः स्नेहे विरिक्तवत् ।
संशमन के उद्देश्य से स्नेहपान करने में विरेचन लिये हुए के समान
व्यवहार करना चाहिये ।
विचारणा का प्रयोग—
स्नेहद्विषः स्नेहनित्या मृदुकोष्ठाश्च ये नराः ॥ ८२ ॥
कृशासहा मद्यनित्यास्तेषामिष्टा विचारणा ।
लाव-तित्तिर-मायूर-हांस-वाराह-कौक्कुटाः ॥ ८३ ॥