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चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

अ० ८ ] विमानस्थानम् ५५७

अ० ८ ] विमानस्थानम् ५५७
रहित क्लेश सहन करने वाला, शिष्य से प्रेम-भाव रखने वाला, शास्त्र के तत्त्व
को बतलाने में समर्थ आचार्य होना चाहिये । जिस प्रकार ठीक ऋतु अनुसार
बरसा हुआ मेघ उत्तम क्षेत्र को धान्यों से सम्पन्न कर देता है उसी प्रकार उक्त
गुणों वाला आचार्य शिष्य को निर्मल ज्ञान आदि वैद्य के गुणों से शीघ्र सम्पन्न
कर देता है ॥ ४ ॥
तमुपसृत्यारिराधयिषुरुपचरेदग्निवच्च देववच्च राजवच्च पितृवच्च
भर्तृवच्चाप्रमत्तः । ततस्तत्प्रसादात्कृत्स्नं शास्त्रमधिगम्य, शास्त्रस्य दृढ-
तायामभिधानसौष्ठवेऽर्थस्य विज्ञाने वचनशक्तौ च भूयो भूयः प्रयतेत
सम्यक् ॥ ५ ॥
उपरोक्त गुणों वाले आचार्य के पास जाकर सेवा करने की इच्छा से शिष्य
अग्नि, देव, राजा, माता, पिता और स्वामी के समान प्रमादरहित होकर उस
की सेवा करे । तब उस की प्रसन्नता से सम्पूर्ण शास्त्र को जान कर शास्त्र
को दृढ़ करने में, शास्त्र को उत्तम रीति से प्रवचन करने में, शास्त्र के अर्थ
जानने में और वाक्-चातुर्य ( बोलने की पटुता प्राप्त करने ) में लगातार
भली प्रकार से प्रयत्न करे ॥ ५ ॥
तत्रोपाया व्याख्यास्यन्ते—अध्ययनमध्यापनं तद्विद्यसंभाषा
चेत्युपायाः ॥ ६ ॥
शास्त्र को दृढ़ करने आदि के उपायों का वर्णन करते हैं । वे उपाय ये
हैं—( १ ) अध्ययन ( पढ़ना ), ( २ ) अध्यापन ( पढ़ाना ) और ( ३ )
उस विद्या के विद्वानों से वार्तालाप करना ॥ ६ ॥
तत्रायमध्ययनविधिः—कल्यः कृतक्षणः प्रातरुत्थायोपव्यूषं वा कृत्वाऽऽ-
वश्यकमपस्पृश्योदकं देव-गो-ब्राह्मण-गुरु-वृद्ध-सिद्धाचार्येभ्यो नम-
स्कृत्य समे शुचौ देशे सुखोपविष्टो मनःपुरःसरीभिर्वाग्भिः सूत्रमनुपरि-
क्रामन्पुनःपुनरावर्तयेद् बुद्ध्या सम्यगनुप्रविश्यार्थतत्त्वं स्वदोषपरिहार-
परदोषप्रमाणार्थम् । एवं मध्यन्दिनेऽपराह्ने रात्रौ च शश्वदपरिहापयन्न-
ध्ययनमभ्यस्येदित्यध्ययनविधिः ॥ ७ ॥
इस शास्त्र की अध्ययन विधि यह है—नीरोग, समय में, नियम-पूर्वक
प्रातःकाल उषःकाल में उठ कर शौचादि आवश्यक कर्मों को करके, पानी का
आचमन स्नान आदि जलकार्य करे, पीछे देव, परमेश्वर ऋषि, गौ, ब्राह्मण,
गुरु, वृद्ध, सिद्ध एवं आचार्य इनको नमस्कार करके समान ( न ऊंचे और न
नीचे ) एवं पवित्र स्थान पर सुखपूर्वक बैठकर मनोयोग पूर्वक वाणी से बार-
बार सूत्रों का उच्चारण करता हुआ खूब समझ कर, अर्थ-तत्त्व में बुद्धि द्वारा

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प्रवेश करके, ( भली प्रकार समझ कर ) अपने अध्ययन के दोष को त्यागने
और दूसरे के अध्ययन के दोषों के ज्ञान लिये एकान्त में बैठ कर अध्ययन करे।
इस प्रकार से मध्याह्न और रात्रि में निरन्तर अध्ययन ( किसी दिन को भी बिना
त्याग किये, ) प्रतिषिद्ध दिनों को छोड़कर, अभ्यास करे ॥ ७ ॥
अथाध्यापनविधिः—अध्यापने कृतबुद्धिराचार्यः शिष्यमादितः
परीक्षेत । तद्यथा—प्रशान्तमार्यप्रकृतिमक्षुद्रकर्माणमृजुचक्षुर्मुखनासा-
वंशं तनुरक्तविशदजिह्वमविकृतदन्तौष्ठममिन्मिणं धृतिमन्तममहङ्कृतिं
मेधाविनं वितर्कस्मृतिसंपन्नमुदारसत्त्वं तद्विद्यकुलजमथवा तद्विद्यवृत्तं
तत्त्वाभिनिवेशिनमव्यङ्गमव्यापन्नेन्द्रियं निभृतमनुद्धतवेशमन्यसनिनं
शील-शौचाचारानुराग-दाक्ष्य-प्रादक्षिण्योपपन्नमव्यसनाभिकाममर्थवि-
ज्ञाने कर्मदर्शने चानन्यकार्यमलुब्धमनलसं सर्वभूतहितेषिणमाचार्य सर्वा-
नुशिष्टप्रतिकरमनुरक्तमेवंगुणसमुदितमध्याप्यमेवमाहुः ।
अब अध्यापन-विधि कहते हैं—पढ़ाने की इच्छा करने वाले आचार्य को
सबसे प्रथम शिष्य की परीक्षा करनी चाहिये। यथा—शिष्य सौम्य आकृति,
शान्त, नीच स्वभाव से रहित, कमीने स्वभाव का न हो, नीच कर्म न करने
वाला, सरल मुख, आँख और नासिका वाला, पतली लाल वर्ण, स्पष्ट जिह्वा
वाला, दांत और ओष्ठों के विकार से रहित, नाक से अनुनासिक न बोलने वाला,
संतोषी या धैर्यवान्, अहंकार रहित, मेधावी, वितर्क ( ऊहापोह ) स्मृति
(याददास्त) से युक्त, उदारचित्त वाला, वैद्यकुल में या वैद्य वृत्ति करने वाले माता
पिता से उत्पन्न, वैद्य के समान आचार वाला, तत्त्व के ग्रहण में दत्तचित्त,
अविकल अंगो वाला, सम्पूर्ण इन्द्रियों से युक्त, निभृत ( विनीत ), अनुद्धत,
अर्थ-तत्त्व को विचारने वाला, अक्रोधी, व्यसनरहित, शील ( सच्चरित्रता ) शौच
( शुद्धि ) आचार, अनुराग ( पढ़ने से स्नेह ) रखने वाला, दक्षता, प्रादक्षिण्‍य
सर्वत्र अनुकूलता इन गुणों से युक्त, कर्म दर्शन और अर्थ के जानने में अन्य
कर्म रहित, दत्तचित्त लोभरहित, अप्रमादी, सब प्राणियों में मंगल कामना करने
वाला, आचार्य के सब उपदेशों को यथावत् करने वाला और भक्तिमान् हो;
इन गुणों से युक्त शिष्य को पढ़ाना चाहिये । ( इन गुणों से रहित शिष्य को
पढ़ाने में आचार्य को भी यश नहीं मिलता ।)
एवंविधमध्ययनार्थमुपस्थितमारिराधयिषुमाचार्यश्चानुभाषेत—
अथोदगयने शुक्लपक्षे प्रशस्तेऽहनि तिष्य-हस्त-श्रवणाश्वयुजामन्यतमेन
नक्षत्रेण योगमुपगते भगवति शशिनि कल्याणे; कल्याणे च करणे मैत्रे
मुहूर्ते मुण्डः स्नातः कृतोपवासः कषायवस्त्रसंवीतः समिधोऽग्निमाज्य-

मुपलेपनमुदकुम्भांश्चगन्धहस्तो माल्य-दाम-प्रदीप-हिरण्य-हेम-रजत-मणि-
मुक्ता-विद्रुम-क्षौम-परिधि-कुश-लाज-सर्षपाक्षतांश्च शुक्लांश्च सुमनसोप्रथि-
ताप्रथितांश्च मेध्यांश्च भक्ष्यान् गन्धांश्च घृष्टानादायोपतिष्ठस्वेति । अथ
सोऽपि तथा कुर्यात् ॥ ८ ॥
इन उपरोक्त गुणों से युक्त अध्ययनार्थ शिष्य के सेवा में उपस्थित होने पर
आचार्य उसे कहे—कि "तू उत्तरायण ( माघ आदिके शुक्ल पक्ष में, प्रशस्त दिव्य
उत्तम तिथि, बार से युक्त दिन में, तिष्य, हस्त, श्रवण, अश्विनी इनमें से किसी
एक नक्षत्र के साथ कल्याणकारी करण और सुखप्रद मुहूर्त्त के अनुकूल होने
पर, मुण्डन करा, उपवास और स्नान करके, कषाय वस्त्र धारण करके, हाथों में
सुगन्ध ( धूप ) , समिधा, अग्नि, घी, उपलेपन ( चन्दन आदि ), जल के घड़े,
माला, हार, स्वर्ण, रजत, मोती, प्रवाल ( मूँगा ), क्षौम ( रेशम ), हवनकुण्ड
के चारों पाश्र्वों में रखने योग्य हस्तप्रमाण के पलाशदि समिधा, कुशा, लाजा,
सरसों, अक्षत, श्वेत, गुंथे और ग्रन्थन रहित ( छुटे, अनबिधे ) पुष्प-माला,
पवित्र खाद्य पदार्थ ( तिल से बने लड्डू आदि ), घिसे हुई चन्दन, आदि
सुगन्धों को लेकर उपस्थित हो।"
वह शिष्य उसी प्रकार से करे ॥ ८ ॥
तमपस्थितमाज्ञाय शुभे शुचौ देशे प्राक्प्रवणे उदक्प्रवणे वा चतु-
ष्किष्कुमात्रं चतुरस्रं स्थण्डिलं गोमयादकेनोपलिप्तं कुशास्तीर्णं सुपरिहितं
परिधिभिश्चतुर्दिशंयथोक्त-चन्दनोदक-कुम्भ-क्षौम-हेम-हिरण्य-रजत-मणि-
मुक्ता-विद्रुमालङ्कृतं मेध्य-भक्ष्य-गन्ध-शुक्ल-पुष्प-लाज-सर्षपाक्षतोपशो-
भितं कृत्वा, तत्र पालाशीभिरैङ्गुदीभीर्माधुकीभिर्वा समिद्भिरग्निमुपसमा-
धाय प्राङ्मुखः शुचिरध्ययनार्थाधमनुविधाय मधुसर्पिर्भ्यां त्रिस्त्रिर्जुहु-
यादग्निमाशीःसंप्रयुक्तैर्मन्त्रैर्ब्रह्माणमग्निं धन्वन्तरिं प्रजापतिमश्विनाव-
न्द्रमृषींश्च सूत्रकारानभिमन्त्रयमाणः पूर्वं स्वाहेति ॥ ९ ॥
दीक्षा—जिस समय अध्ययनार्थी शिष्य समिधा आदि वस्तुओं को लेकर
आचार्य के पास उपस्थित हो उस समय एक समान एवं पवित्र स्थान में
पूर्व या उत्तर दिशा में चार हाथ प्रमाण चौकोर जगह को गोबर और पानी
से लेप कर इस पर कुशा बिछा दे । इसके चारों ओर से भली प्रकार वेष्टित
कर दे । इसके चारों ओर चन्दन, पानी के घड़े, रेशम, स्वर्ण, चांदी, मणि,
मुक्ता, मूँगा आदि पवित्र भक्ष्य, गन्ध, श्वेतपुष्प, लाजा, सरसों, अक्षत आदि
वस्तुएं सजा देवे । इसमें पलाश ( ढाक ), इंगुदी ( हिंगोट ), गूलर,

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महुए आदि किसी एक वृक्ष की समिधाओं से अग्नि प्रज्वलित करके पवित्र
एवं पूर्वमुख बैठ कर अध्ययन विधि ( वेदारम्भ विधि ) के अनुकूल आशीर्वाद
में प्रयुक्त मन्त्रों द्वारा ब्राह्मण, अग्नि, धन्वन्तरि, प्रजापति, दो अश्वी, इन्द्र,
और सूत्रकार ऋषियों ( भरद्वाज आदि ) को पहिले मन्त्रों से आह्वान करके
स्वाहा शब्द के साथ मधु ( शहद ) और घी प्रत्येक से तीन तीन बार
आहुति दे ॥ ६ ॥
शिष्यश्चैनमन्वालभेत, हुत्वा च प्रदक्षिणमग्निमनुपरिक्रामेत् ।
ततोऽनुपरिक्रम्य ब्राह्मणान् स्वस्ति वाचयेत्, भिषजश्चाभिपूजयेत् ॥ १०॥
आचार्य के होम कर चुकने पर पीछे शिष्य भी होम करे । हवन करके
अग्नि की तीन परिक्रमा करे । पीछे ब्राह्मणों की परिक्रमा करके स्वस्तिवाचन
करे और वैद्यों की पूजा करे ॥ १० ॥
अथैनमग्निसकाशे ब्राह्मणसकाशे भिषक्सकाशे चानुशिष्यात्—
ब्रह्मचारिणा श्मश्रुधारिणा सत्यवादिनाऽमांसादेन मेध्यसेविना निर्म-
त्सरेणाशस्त्रधारिणा च भवितव्यं, न च ते मद्वचनात्किंचिदकार्यं
स्यादन्यत्र राजद्विष्टात्प्राणहराद्विपुलादधर्म्यादनर्थसंप्रयुक्ताद्वाऽप्यर्थात्
मदर्पणेन मत्प्रधानेन मदधीनेन मत्प्रियहितानुवर्तिना च शश्वद्
भवितव्यं, पुत्रवद्दासवर्द्धर्थिवच्चोपचरताऽनुवस्तव्योऽहमनुत्सुकेनावहिते-
नानन्यमनसा विनीतेनावेक्ष्यकारिणाऽनसूयकेन, न चानभ्यनुज्ञातेन
प्रविचरितव्यं, अनुज्ञातेन प्रविचरता पूर्वं गुर्वर्थोपान्वाहरणे यथा-
शक्ति प्रयतितव्यं, कर्मसिद्धिमर्थसिद्धिं यशोलाभं प्रेत्य च स्वर्गमि-
च्छता त्वया गोब्राह्मणमादौ कृत्वा सर्वप्राणभृतां शर्म्माऽऽशासितव्यम-
हरहरुत्तिष्ठता चोपविशता च, सर्वात्मना चाऽऽतुराणामारोग्यं प्रयति-
तव्यं, जीवितहेतोरपि चाऽऽतुरेभ्यो नाभिद्रोग्धव्यं, मनसाऽपि च पर-
स्त्रियो नाभिगमनीयास्तथा सर्वमेव परस्वं, निभृतवेशपरिच्छदेन
भवितव्यमशौण्डेनापापेनापापसहायेन च श्लक्ष्ण-शुक्ल-धर्म्य-धन्य-सत्य-
शर्म्म-हित-मित-वचसा देशकालविचारिणा स्मृतिमत्ता ज्ञानोत्थानोपक-
रणसंपत्सु नित्यं यत्नवता, नच कदाचिद्राजद्विष्टानां राजद्वेषिणां वा
महाजनद्विष्टानां महाजनद्वेषिणां वाऽप्यौषधमनुविधातव्यं तथा सर्वे-
षामत्यर्थ-विकृत-दुष्ट-दुःख-शीलाचारोपचाराणामनपवादप्रतीकाराणां
मुमूर्षूणां च तथैवासंन्निहितेश्वराणां स्त्रीणामनध्यक्षाणां वा, नच कदा-
चित्स्त्रीदत्तमामिषमादातव्यमननुज्ञातं भर्त्राऽथवाऽध्यक्षेण, आतुर-
कुलं चानुप्रविशता त्वया विदितेनानुमतप्रवेशिना सार्धं पुरुषेण