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चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

अ० ८] निदानस्थानम् ४७६

अ० ८] निदानस्थानम् ४७६
याति नाशेषतां व्याधिरसाध्यो याप्यसंज्ञितः ।
परोऽसाध्यः क्रियाः सर्वाः प्रत्याख्येयोऽतिवर्तते ॥ ३६ ॥
नासाध्यः साध्यतां याति, साध्यो याति त्वसाध्यताम् ।
पादापचाराद्दैवाद्व। यान्ति भावान्तरं गदाः ॥ ३७ ॥
वृद्धिस्यानक्षयावस्थां रोगाणामुपलक्षयेत् ।
सुसूक्ष्ममपि च प्राज्ञो देहाग्निबलचेतसाम् ॥ ३८ ॥
व्याध्यवस्थाविशेषान् हि ज्ञात्वा ज्ञात्वा विचक्षणः ।
तस्यां तस्यामवस्थायां तत्तच्छ्रेयः प्रपद्यते ॥ ३६ ॥
याप्य और असाध्य—याप्य-संज्ञक असाध्य रोग कभी भी जड़-मूल से नष्ट
नहीं होते ( वे पथ्य और औषध द्वारा कुछ काल तक दबे रहते हैं ) और
असाध्य रोग सब प्रकार की चिकित्सा करने पर भी शान्त नहीं होते। असाध्य
रोग साध्य नहीं हो सकते, परन्तु साध्य रोग असाध्य बन जाते हैं। सब रोगों
की चिकित्सा के जो चार पाद हैं, इन के अपचार से अथवा दैवबल के कारण
रोग दूसरी स्थिति ( असाध्य अवस्था ) में पहुंच जाते हैं। बुद्धिमान् वैद्य को
उचित है कि दोष की वृद्धि, स्थान और क्षय की परीक्षा भली प्रकार करे ।
रोगी के शरीर, जाठराग्नि, बल और चित्तवृत्ति का सूक्ष्मता से ज्ञान प्राप्त करे ।
रोग की विशेष अवस्थाओं को भली प्रकार पूर्ण रूप से समझ कर उस प्रकार
से शान्तिकारक चिकित्सा करने पर सुख ( धर्म, अर्थ, काम और मोक्षरूपी
चारों पुरुषार्थ ) प्राप्त होते हैं ॥ ३६-३९ ॥
प्रायस्तिर्यग्गता दोषाः क्लेशयन्त्यातुराँश्चिरम् ।
तेषु न त्वरया कुर्याद्देहाग्नि-बल-विक्रियाम् ॥ ४० ॥
प्रयोगैः क्षपयेद्वा तान् सुखं वा कोष्ठमानयेत् ।
ज्ञात्वा कोष्ठप्रपन्नांस्तान् यथास्वं तं हरेद् बुधः ॥ ४१ ॥
ज्ञानार्थं यानि चोक्तानि व्याधिलिङ्गानि संग्रहे ।
व्याधयस्ते तदात्वे तु लिङ्गानीष्टानि नाऽऽमयाः ॥ ४२ ॥
प्रायः वात आदि दोष कुमार्ग में जाकर रोगियों को बहुत समय तक पीड़ित
करते हैं। ऐसे स्थानो में शीघ्रता से काम नहीं लेना चाहिये । अपितु रोगी के
शरीर और अग्नि-बल को जानकर औषध-प्रयोग द्वारा दोषों को धीरे धीरे कम
करना चाहिये। अथवा दोषों को कोष्ठ-स्थान में लाना चाहिये । और जब दोष
जाय तब योग्य रीति से बाहर निकाल देने चाहिये । रोगो के
। के लिये जो लक्षण संक्षेप में कहे हैं, उन को एक स्वतन्त्र रोग

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समझना चाहिये । परन्तु जिस स्थान पर दूसरे रोगों का ज्ञान कराया गया है
वहां पर इन लक्षणों को लक्षण ही समझना चाहिये ॥ ४०-४२ ॥
विकाराः प्रकृतिश्चैव द्वयं सर्वं समासतः ।
तद्धेतुवशगं हेतोरभावान्न प्रवर्तते ॥ ४३ ॥
विकार और प्रकृति इन दो अवस्थाओं का जो वर्णन किया है ये दोनों ही
कारण के अधीन है । कारण के अभाव से इन दोनों में से एक भी नहीं
रह सकता ॥ ४३ ॥
तत्र श्लोकाः—हेतवः पूर्वरूपाणि रूपाण्युपशयस्तथा ।
संप्राप्तिः पूर्वमुत्पत्तिः सूत्रमात्रं चिकित्सितम् ॥ ४४ ॥
ज्वरादीनां विकाराणामष्टानां साध्यता न च ।
पृथगेकैकशश्चोक्ता हेतुलिङ्गोपशान्तयः ॥ ४५ ॥
हेतुपर्यायनामानि व्याधीनां लक्षणस्य च ।
निदानस्थानमेतावत्संग्रहेणोपदिश्यते ॥ ४६ ॥ इति ।
इस निदान स्थान में ज्वर आदि आठ रोगों के हेतु, पूर्वरूप, रूप, उपशय,
सम्प्राप्ति, पूर्वोत्पत्ति, चिकित्सा सूत्र, साध्यता और असाध्यता, इन का वर्णन
किया है । हेतु, लिंग, उपशय, व्याधि, लक्षण और हेतु के पर्य्यायवाची शब्द ये
सब विषय संक्षेप में कह दिये हैं ॥ ४४-४६ ॥
इत्यग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते निदानस्थानेऽ-
पस्मारनिदानं नामाष्टमोऽध्यायः ।
इति निदानस्थानं संपूर्णम् ।
۞निदानस्थान में प्रधानभूत ज्वर आदि का ज्ञान कराने के लिये अवि-
पाक, अरुचि आदि जो रोग कहे गये हैं, उनको स्वतंत्र अवस्था में उत्पन्न होने
पर रोग ही जानने चाहिये और जब ज्वरादि के कारण ये उत्पन्न होते हैं तब
लक्षण ही हैं । क्योंकि आयुर्वेद में स्वतन्त्र अपनी चिकित्सा से शान्त
ही रोग कहा जाता है ।