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चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)

Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation

महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा

स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished639 पृष्ठ

अ० २५ ] सूत्रस्थानम् २८७

अ० २५ ] सूत्रस्थानम् २८७
प्रकृति के अनुसार आहार विहार करना; आरोग्यकारक वस्तुओं में, समय पर
भोजन करना; अनारोग्योत्पादक वस्तुओं में, वेगों का रोकना; मन की प्रसन्नता
करने वालों में मद्य; बुद्धि, धैर्य और स्मृतिनाशक वस्तुओं में, मद्य का अधिक
उपयोग; पचने में कठिन वस्तुओं में, गुरु, गरिष्ठ भोजन; सुगमता से पचाने
वाली वस्तुओं में, एक समय भोजन करना; शोष और क्षय करने वाली वस्तुओं
में, स्त्री संग की अधिकता; नपुंसक करनेवाले कारणोंमें शुक्र के उपस्थित वेग का
रोकना; अन्न में अश्रद्धा पैदा करने वालों में वध्यस्थान; आयु का ह्रास करने
वाले कारणों में न खाना; क्षीण, निर्बल करने वालों में थोड़ा खाना; ग्रहणी
रोग को करने वाले कारणों में अजीर्णावस्था में अध्यशन अर्थात् खाने के ऊपर
खाना; अग्नि को विषम करने वाले कारणों में विषम (ठीक समय पर न खाना)
खाना; कुष्ठ आदि निन्दित रोगों को पैदा करने में विरुद्ध वीर्य (जैसे दूध और
मछली आदि) वस्तुओं का खाना; सब पथ्यों में शान्ति; सब अपथ्यों में परिश्रम
थकान (शक्ति से बाहर परिश्रम करना); व्याधियों में मुख्य वमन, विरेचन,
आहार-विहार का मिथ्यायोग; दारिद्र या अमंगलता के कारणों में रजस्वला
स्त्री के साथ सम्भोग; आयुवर्धक वस्तुओं में ब्रह्मचर्य; वृष्य-वस्तुओं में संकल्प;
अवृष्य वस्तुओं में मन की अप्रसन्नता; प्राणहारक वस्तुओं में बल से बाहर काम
करना; रोग के बढ़ाने में शोक; श्रमनाशक वस्तुओं में स्नान; प्रीणन, पुष्टिकारक
वस्तुओं में प्रसन्नता; सुखाने वाली वस्तुओं में शोक; पुष्ट करने वाली वस्तुओं में
बेफ़िकरी (सन्तोष); नींद लाने वाली वस्तुओं में पुष्टि; आलस्य करने वाली
वस्तुओं में नींद; बलकारक वस्तुओं में सब रसों का अभ्यास, निर्बल करने वालों
में एक ही रस का निरन्तर सेवन; अनाहार्य अर्थात् खींच कर निकालने में
अयोग्य वस्तुओं में गर्भ रूपी शल्य; बाहर निकालने वाली वस्तुओं में अजीर्ण,
कोमल औषधियों के उपचार में बालक; याप्य रोगों में वृद्ध; तीक्ष्ण वेग की औषध
और व्यायाम त्याग करनेवालों में गर्भिणी; गर्भ स्थिर कराने वालों में मन की
प्रसन्नता; दुश्चिकित्स्य रोगों में सन्निपात जन्य रोग; विषम चिकित्सा (कठिन)
व ले रोगों में आमजन्य रोग; सब रोगों में ज्वर; दीर्घ रोगों में कुष्ठ; रोग समूहों
में राजयक्ष्मा; आनुषङ्गिक रोगों में प्रमेह; अनुशस्त्रों में, जोंक, तंत्रों में बस्ति;
औषध-भूमियों में हिमालय, आरोग्य देशों में मरुभूमि; अहितकारी देशों में जल-
प्राय प्रदेश (जैसे बंगाल), रोगी के चारों गुणों में वैद्य के आदेशानुसार काम
करना; चिकित्सा के चारों अंगों में वैद्य; त्याज्य वस्तुओं में नास्तिक; दुःखदायक
कारणों में लोभ; अरिष्ट अर्थात् मृत्यु-कारणों में कहे के अनुसार न चलना; रोग

२८८ चरकसंहिता [ अ० २५
के लक्षणों में मन की दुश्चिन्ता; शोक, सन्देह मिटानेवालों में वैद्यों का समूह
अर्थात् बहुत वैद्यों का होना; वैद्य के गुणों में देश काल के अनुसार चिकित्सा
करना; ओषधियों में यथार्थ ज्ञान; ज्ञानसाधनों में शास्त्र सहित तर्क; काल ज्ञान
समयानुसार काम करना; व्यवसाय न करना-समय के नाश करने वाले कारणों
में, कर्म का देखना सन्देह को मिटाने वाली वस्तुओं में; भय करनेवाले कार्योंमें
असामर्थ्य; बुद्धि बढ़ाने वाले कारणों में उस विद्या को जानने बालों से बात-
चीत; शास्त्र के तत्त्व को जानने के लिये आचार्य; अमृर्तों में आयुर्वेद, कर्त्तव्य
कार्यों में उत्तम सत्य बचन, सब अहितकारी वस्तुओं में 'असत्य' का सेवन;
सब प्रकार के सुखों में; संन्यास ( सर्वस्व त्याग ) श्रेष्ठ अर्थात् श्रेयस्कर है ॥
भवन्ति चात्र—अग्र्याणां शतमुद्दिष्टं यद् द्विपञ्चाशदुत्तरम् ।
अलमेतद्विकाराणां विघातायोपदिश्यते ॥ ३९ ॥
इस प्रकार से १५२ ( एक सौ बावन ) श्रेष्ठ पदार्थ कहे हैं, ये विकार
अर्थात् रोगों के नाश करने के लिये पर्याप्त हैं ॥ ३६ ॥
समानकारिणो येऽर्थास्तेषां श्रेष्ठस्य लक्षणम् ।
ज्यायस्त्वं कार्यकारित्वेऽवरत्वं चाप्युदाहृतम् ॥ ४० ॥
वातपित्तकफेभ्यश्च यद्यत्प्रशमने हितम् ।
प्राधान्यतश्च निर्दिष्टं यद् व्याधिहरमुत्तमम् ॥ ४१ ॥
एतन्निशाम्य निपुणं चिकित्सां संप्रयोजयेत् ।
एवं कुर्वन् सदा वैद्यो धर्मकामौ समश्नुते ॥ ४२ ॥
पथ्यं पथोऽनपेतं यद्यच्चोक्तं मनसः प्रियम् ।
यच्चाप्रियमपथ्यं च नियतं तन्न लक्षयेत् ॥ ४३ ॥
मात्रा-काल-क्रिया-भूमि-देह-दोष-गुणान्तरम् ।
प्राप्य तत्तद्धि दृश्यन्ते ते ते भावास्तथा तथा ॥ ४४ ॥
तस्मात्स्वभावो निर्दिष्टस्तथा मात्रादिराश्रयः ।
तदपेक्ष्योभयं कर्म प्रयोज्यं सिद्धिमिच्छता ॥ ४५ ॥
जो पदार्थ शरीर के दोषों को समान करते हैं, या समान अवस्था में रहने
देते हैं वे श्रेष्ठ का लक्षण है । इन के कार्य करने की शक्ति से ही श्रेष्ठ और
हीन भेद किये हैं । ( यथा—लोहितशालयः शूकधान्यानां श्रेष्ठतमाः, उदकमा-
श्वासकराणां श्रेष्ठम् ) । इसी प्रकार वात, पित्त, कफ के नाश के लिये जो वस्तु
मुख्य रूप में श्रेष्ठ है और जो रोग को नष्ट करने के लिये उत्तम है, इन को
जानकर चिकित्सा का आरम्भ करना चाहिये । इस प्रकार करने से वैद्य को