चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
अ० ७ ] सूत्रस्थानम् १०१
अ० ७ ] सूत्रस्थानम् १०१
विपरीत-गुणस्तेषां स्वस्थवृत्तेर्विधिर्हितः ।
सम-सर्व-रसं सात्म्यं समधातोः प्रशस्यते ॥ ४१ ॥
कुछ मनुष्य जन्म या गर्भकाल से ही पित्त, वायु, कफ की असमानावस्था
वाले होते हैं और कुछ मनुष्य गर्भाधान काल से ही वात प्रकृति वाले, पित्त
प्रकृति वाले और कफ प्रकृति वाले होते हैं। इन में पित्त वायु और कफ की
साम्यावस्था वाले मनुष्य प्रायः नीरोग रहते हैं, और वात प्रकृति या पित्त प्रकृति
अथवा कफ प्रकृति के मनुष्य सदा रोगी रहते हैं। इन में वातादि दोषों का
सात्म्य अर्थात् अनुकूल हो जाना ही शरीरकी 'प्रकृति' कही जाती है । अर्थात्
वात प्रकृति वाले मनुष्य में वात दोष उस के शरीर के अनुकूल हो जाता
है। इसलिये वही उसकी प्रकृति है, प्रकृति होने से वात उस में दोष नहीं,
परन्तु जब स्वास्थ्यावस्था में वात बढ़ेगा तभी दोष होगा। जिस प्रकार कि
विषकीट अपने विष से नहीं मरता, उसी प्रकार प्रकृतिस्थ वात से भी वात
प्रकृति का मनुष्य पीड़ित नहीं होता। इन वात आदि की अधिकता में वात
आदि के विपरीत विरुद्ध गुणों का इनके कारणों के विपरीत गुण भी सेवन करना
स्वास्थ्य के लिये कल्याणकारी उपाय है। और पित्त, वायु और कफ की
समानता वाली प्रकृति के मनुष्यों के लिये सब (मधुर अम्ल, लवण, तिक्त,
कटु और कषाय ) रसों का समानावस्था में अभ्यास करना उत्तम है। समान
धातुओं वाला आदमी प्रशस्त है ॥ ३६-४१ ॥
द्वे अधः सप्त शिरसि खानि स्वेद्मुखानि च ।
मलायनानि बाध्यन्ते दुष्टैर्मात्राधिकैर्मलैः ॥ ४२ ॥
मलवृद्धिं गुरुत्वेन लाघवान्मलसंक्षयम् ।
मलायनानां बुद्ध्येत सङ्गोत्सर्गादतीव च ॥ ४३ ॥
तान्दोषलिङ्गैरादिश्य व्याधीन् साध्यानुपाचरेत् ।
व्याधि-हेतु-प्रतिद्वन्द्वैर्मात्रा-कालो विचारयन् ॥ ४४ ॥
विषम-स्वस्थ-वृत्तानामेते रोगास्तथाऽपरे ।
जायन्तेऽनातुरस्तस्मात्स्वस्थ-वृत्त-परो भवेत् ॥ ४५ ॥
जब मल परिमाण से अधिक हो जाते हैं, तब वे विकृत होकर मल के
स्थानों को पीड़ित करते हैं, मल के स्थान नीचे के दो-गुदा और उपस्थ (स्त्रियों
में योनि भी); शिर में सात-दो नाक, दो कान, दो आंखें और एक मुख,
पसीना निकलने के सब छिद्र ये मल के स्थान हैं, मल इनको पीड़ित करते हैं।
भारीपन होने से मल की वृद्धि समझनी चाहिये और शरीर में हलकापन
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होने से मल का क्षय समझना चाहिये। मल के स्थानों से मल के न निकलने से
मल का क्षय, मल स्थानों से मल का बार-बार अधिक बाहर निकलना वृद्धि को
बताता है । मलों की वृद्धि और क्षय दूसरों के कारण हुए हैं, यह समझकर
उनके चिन्हों से पहिचानकर उन से उत्पन्न साध्य रोगों को रोग और व्याधि के
हेतु इन दोनों के विपरीत गुण, वीर्य, विपाक और प्रभाव से विरुद्ध औषध,
आहार और विहार द्वारा चिकित्सा करनी चाहिये । चिकित्सा करते समय वैद्य
मात्रा औषध, आहार और विहार का परिमाण काल, दोष, व्याधि के प्रकोप,
ऋतु, रात, दिन आदि समयों का विचार कर ले। ये विषम धातु वाले रोगी
और नीरोगी इन दोनों के लिये हितकारी हैं, धातु की विषमता से उत्पन्न होने
वाले रोग और मानस या आगन्तुज रोग नहीं उत्पन्न होते । इसलिये मनुष्य
रोगी नहीं होता, रोगी न हो अतः रोगी होने से पूर्व ही स्वस्थवृत्त का सेवन
करना चाहिये ॥ ४२-४५ ॥
कारण से उत्पन्न होने वाले रोगों से बचने के उपाय—
माधव-प्रथमे मासि नभस्य-प्रथमे पुनः ।
सहस्य-प्रथमे चैव हारयेद्दोषसंचयम् ॥ ४६ ॥
स्निग्ध-स्विन्न-शरीराणामूर्ध्वं चाधश्च बुद्धिमान् ।
बस्तिकर्म ततः कुर्यान्नस्तः कर्म च बुद्धिमान् ॥ ४७ ॥
यथाक्रमं यथायोगमत ऊर्ध्वं प्रयोजयेत् ।
रसायनानि सिद्धानि वृष्ययोगांश्च कालवित् ॥ ४८ ॥
रोगास्तथा न जायन्ते प्रकृतिस्थेषु धातुषु ।
धातवश्चाभिवर्धन्ते जरा-मान्द्यमुपैति च ॥ ४९ ॥
विधिरेश विकाराणामनुत्पत्तौ निदर्शितः ।
निजानामितरेषां तु पृथगेवोपदिष्यते ॥ ५० ॥
वैशाख और इस से पूर्व के मास अर्थात् चैत्र में, और भाद्रपद,
इससे पूर्वके मास अर्थात् श्रावण में तथा पौष इससे मास पूर्व के मार्गशीर्ष
में एकत्रित दोषों को वमन विरेचन आदि से निकाल देना चाहिये ।
हेमन्त ऋतु में संचित कफ को चैत्र मास में ग्रीष्म में संचित वायुको
श्रावण मास में, वर्षा में संचित पित्त को मार्गशीर्ष में निकाल देना
चाहिये । इन मासों में दोषों के प्रकोप होने का भय रहता है, इसलिये प्रको[प]
होने से पूर्व ही दोषों को निकाल देना चाहिये । पहिले शरीर को स्नि[ग्ध] [घृत] और
आदि से चिकना करके पसीना देना चाहिये जिससे कि शरीर के म्ने[द] [स्वेद]
जायें । स्नेहन और स्वेदन के पीछे वमन कार्य और विरेचन कराना चाहिये ।
इन के पीछे बस्ति कर्म और अन्त में नस्य कर्म अर्थात् शिरोविरेचन देना
चाहिये । स्निग्ध और स्विन्न शरीर वाले पुरुषों के लिये वमन कफ नाशक होने
से चैत्र में, अनुवासन, बस्तिकर्म वात हर होने से श्रावण मास में एवं पित्त-
नाशक होने से विरेचन मार्गशीर्ष मास में लेना चाहिये । अथवा चैत्र मास में
वमन के पीछे विरेचन, मार्गशीर्ष में विरेचन से पूर्व वमन और फिर चैत्र और
मार्गशीर्ष दोनों में बस्तिकर्म एवं नस्य कर्म करना चाहिये । चैत्र में यदि वम-
नादि कार्य कर लिए हों तो श्रावण मास में अनुवासन और आस्थापन करना
चाहिये । और यदि चैत्र में वमनादि न किये हों तो वमन विरेचन करके फिर
बस्तिकर्म और नस्य कर्म करना चाहिये । स्नेह के पीछे स्वेद, स्वेद के पीछे
वमन, वमन के पीछे विरेचन, विरेचन के पीछे बस्तिकर्म और बस्तिकर्म के
पीछे नस्य देना चाहिये । प्रथम स्वेदन, वमन, विरेचन, बस्ति और नस्य कर्म
ये क्रमशः तथा जिस पुरुष के लिये जो २ कर्म योग्य हों उन्हें करने के पीछे
जरा और रोग को दूर करने वाली औषध का उपयोग करना चाहिये । रसायन
सेवन के पीछे सिद्ध एवं वृष्य पौष्टिक प्रयोगों का सेवन समय को जानने वाला
वैद्य करावे । रस रक्तादि धातुओं के प्रकृतिस्थ होने से शरीर में दोषजन्य रोग
नहीं होते । वृष्य आदि क्रिया करने से रस रक्तादि बढ़ते हैं और बुढ़ापे का
अन्त हो जाता है, बुढ़ापा नहीं आता । यह उपरोक्त विधि शरीर-दोषजन्य रोगों
की अनुत्पत्ति के लिये कहा है । आगन्तुक रोगों के लिये भिन्न विधि कहते हैं ।
ये भूत-विष-वाय्वग्नि-संप्रहारादि-संभवाः ।
नृणामागन्तवो रोगाः प्रज्ञा तेष्वपराध्यति ॥ ५१ ॥
ईर्ष्या-शोक-भय-क्रोध-मान-द्वेषादयश्च ये ।
मनो-विकारास्तेऽप्युक्ताः सर्वे प्रज्ञापराधजाः ॥ ५२ ॥
जो कि (भूत) नाना सूक्ष्म प्राणी ग्रह आदि, (विष) स्थावर या जंगम
विष, (वायु) झंझावात, (अग्नि) ज्वालामुखी, दावानल आदि (संप्रहार)
चोट आदि से मनुष्यों के 'आगन्तुज' अर्थात् बाहर से होने वाले रोग होते हैं,
उन में बुद्धि का अपराध मिथ्या या अन्यथा रूप में प्रयोग हुआ होता है ।
(मत्सर), शोक, भय, क्रोध, अभिमान, द्वेष आदि मन के विकार अर्थात्
वात आदि दोषजन्य नहीं प्रत्युत ये सब बुद्धि के दोष से ही उत्पन्न
हैं ॥ ५१-५२ ॥
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आगन्तुज रोगों के प्रतीकार—
त्यागः प्रज्ञापराधानामिन्द्रियोपशमः स्मृतिः ।
देश-कालात्म-विज्ञानं सद्वृत्तस्यानुवर्त्तनम् ॥ ५३ ॥
आगन्तूनामनुत्पत्तावेष मार्गो निदर्शितः ।
प्राज्ञः प्रागेव तत्कुर्याद्धितं विद्याद्यदात्मनः ॥ ५४ ॥
आप्तोपदेश-प्रज्ञानं प्रतिपत्तिश्च कारणम् ।
विकाराणामनुत्पत्तावुपन्नानाञ्च शान्तये ॥ ५५ ॥
आगन्तुज एवं मानसिक रोग बुद्धि के दोष से उत्पन्न होते हैं, इस लिये
इस प्रज्ञापराध को छोड़ना चाहिये । इन्द्रियों को विषयों से रोकना बुद्धि, स्मृति,
भगवान् का स्मरण, देश काल और आत्मा का चिन्तन, (सद्वृत्त) सच्चे,
कल्याणकारी मार्ग का अनुसरण करना, यह विधि आगन्तुज रोगों की उत्पत्ति से
बचने का मार्ग है । इस प्रकार बरतने से आगन्तुज रोग उत्पन्न नहीं होते ।
बुद्धिमान् व्यक्ति को चाहिये कि अपने लिये जो हितकारी काम हो उनको रोगो-
त्पत्ति से पूर्व ही करे ।
(आप्तोपदेश) रजस् और तमस् से मुक्त निर्भ्रान्त विद्वानों के उपदेश
और (प्रज्ञान) बुद्धि से सिद्ध, प्रमाण द्वारा सिद्ध किये, बुद्धि से स्वीकार
किये ये दोनों मानसिक विकारों की अनुत्पत्ति में तथा उत्पन्न विकारों की
शान्ति में कारण है ॥ ५३-५५ ॥
वर्जने योग्य मनुष्य—
पाप-वृत्त-वचःसत्त्वाः सूचकाः कलह-प्रियाः ।
मर्मोपहासिनो लुब्धाः पर-वृद्धि द्विषः शठाः ॥ ५६ ॥
परापवाद-रतयश्चपला रिपु-सेविनः ।
निर्घृणास्त्यक्तधर्माणः परिवर्ज्या नराधमाः ॥ ५७ ॥
जिनकी वाणी और मन पापमय हों, चुगलखोर, झगड़ालू, कमजोरी या
छिद्र को ढूँढ़कर उस पर हंसनेवाले, लालची, जो दूसरी की उन्नति में द्वेष भाव
रखते हैं, दूसरों की निन्दा ही करना जिनका काम है, चंचल प्रकृति, अस्थिर
मन, दुश्मन से मिले हुए, या काम क्रोधादि के वशीभूत, दयारहित, निर्दयी,
धर्म से न डरने वाले, ऐसे नीच पुरुषों को छोड़ देना चाहिये ॥५६-५७॥
सेवन करने योग्य मनुष्य—
बुद्धि-विद्या-वयः-शील-धैर्य-स्मृति-समाधिभिः ।
वृद्धोपसेविनो वृद्धाः स्वभावज्ञा गत-व्यथाः ॥५८॥