चरक संहिता (प्रथम भाग: सूत्र, निदान, विमान, शारीर व इन्द्रिय स्थान)
Charaka Samhita Part 1 with Hindi Translation
महर्षि चरक व अग्निवेश द्वारा
स्रोत: चौखम्बा विद्याभवन · चौखम्बा विद्याभवन (उद्गम)
अ० ८ ] विमानस्थानम् ५८१
अ० ८ ] विमानस्थानम् ५८१
संशय के नाश करने वाले हेतु का स्पष्टीकरण नहीं करता, इसलिये यह अहेतु
है । क्योंकि जो हेतु स्वयं संशय का कारण है, वही संशय के नाश का कारण
नहीं हो सकता ।
वर्ण्यसमो नामाहेतुर्यो वर्ण्यविशिष्टः । यथा परो ब्रूयात्-अस्पर्शत्वाद्
बुद्धिरनित्या शब्दवदिति, अत्र वर्ण्यः शब्दो बुद्धिरपि वर्ण्या, तदुभय-
वर्ण्यविशिष्टत्वाद्वर्ण्यसमोऽप्यहेतुः ॥ ५७ ॥
वर्ण्यसम अहेतु — जो हेतु साध्य के समान असिद्ध होने से साध्य की
भांति साधने योग्य होता है। जैसे किसी ने कहा कि बुद्धि अनित्य है, स्पर्श,
न होने के कारण, शब्द की भांति। इनमें बुद्धि साध्य है, शब्द भी साध्य है ।
इसलिये दोनों के असिद्ध होने से यह वर्ण्यसम अहेतु है ॥ ५७ ॥
अथातीतकालं—अतीतकालं नाम यत्पूर्व वाच्यं तत्पश्चादुच्यते,
तत्कालातीतत्वादग्राह्यं भवतीति । पूर्वं वा निग्रहप्राप्तमनिगृह्य पक्षान्त-
रितं पश्चान्निगृह्णीते तत्तस्यातीतकालत्वान्निग्रहवचनमसमर्थं भवतीति ५८
अतीतकाल — जो बात पहिले कहनी चाहिये, उसको पीछे कहना 'अतीत-
काल' है । समय के व्यतीत होने के कारण वह बात अग्रहणीय होजाती है ।
अथवा दूसरे प्रतिवादी के निग्रह स्थान में आने पर उस समय उसको न पकड़
कर दूसरे पक्ष में पहुंचने पर पीछे से निग्रह करना, यह भी अतीत काल होने
से निग्रह में असमर्थ होता है ॥ ५८ ॥
अथोपालम्भः—उपालम्भो नाम हेतोर्दोषवचनं; यथापूर्वमहेतवो
हेत्वाभासा व्याख्याताः ॥ ५६ ॥
उपालम्भ — हेतु में प्रकरणसम आदि दोष दिखाना 'उपालम्भ' है। जैसे
पहिले कहे अहेतु जो कि हेतु न होने पर भी हेतु की भांति दीखते हैं ॥ ५६ ॥
अथ परिहारः—परिहारो नाम तस्यैव दोषवचनस्य परिहरणम् ।
यथा—नित्यमात्मनि शरीरस्थे जीवलिङ्गान्युलभ्यन्ते, तस्य चापगमा-
न्नोपलभ्यन्ते, तस्मादन्यः शरीरादात्मा नित्यश्चेति ॥ ६० ॥
परिहार—हेतु में कहे दोष का दूर करना 'परिहार' है। जैसे—शरीरस्थ
आत्मा में प्राण अपान आदि जीव के लक्षण नित्य उपलब्ध होते हैं और
आत्मा के शरीर से निकल जाने पर ये लक्षण उपलब्ध नहीं होते, इस लिये
आत्मा शरीर से भिन्न दूसरी वस्तु है और वह नित्य है ॥ ६० ॥
अथ प्रतिज्ञाहानिः — प्रतिज्ञाहानिर्नाम सा पूर्वप्रतिगृहीतां पर्य॑नुयुक्तः
परित्यजति । यथा-प्राक् प्रतिज्ञां कृत्वा 'नित्यः पुरुष' इति । पर्यनुयुक्त-
स्त्वाह—अनित्य इति ॥ ६१ ॥
५८२ चरकसंहिता [ अ० ८
प्रतिज्ञाहानि—पहिले की हुई प्रतिज्ञा को छोड़ कर दूसरी प्रतिज्ञा को स्वी-
कार करना 'प्रतिज्ञाहानि' है। जैसे—प्रथम प्रतिज्ञा की—पुरुष नित्य है,
अकृतक होने से, आकाशवत्। दूसरे प्रतिपक्षी ने कहा—पुरुष अनित्य है,
इन्द्रिय-ग्राह्य होने से, घड़े के तुल्य। इसमें अपनी प्रतिज्ञा (नित्य पुरुष) को
छोड़ कर दूसरी प्रतिज्ञा (अनित्य पुरुष है) को स्वीकार करना प्रतिज्ञा-
हानि है ॥ ६१ ॥
अथाभ्यनुज्ञा—अभ्यनुज्ञा नाम य इष्टानिष्टाभ्युपगमः ॥ ६२ ॥
अभ्यनुज्ञा—इष्ट (परपक्ष में दोष) और अनिष्ट (स्वपक्ष में दोष) दोनों को
स्वीकार करना 'अभ्यनुज्ञा' है। दूसरे से कहे हुए दोष को अपने पक्ष में मान
लेना और दूसरे के पक्ष में दोष दिखाना 'अभ्यनुज्ञा' वा 'मतानुज्ञा' है ॥६२॥
अथ हेत्वन्तरं—हेत्वन्तरं नाम प्रकृतेर्हेतौ वाच्ये यद्विकृतिकहेतु-
माह ॥ ६३ ॥
हेत्वन्तर—प्रासंगिक हेतु के स्थान पर विकृत हेतु अर्थात् अप्रासंगिक हेतु
कहना 'हेत्वन्तर' है ॥ ६३ ॥
अथार्थान्तरं—अर्थान्तरं नाम एकस्मिन् वक्तव्ये परं यदाह; यथा—
ज्वरलक्षणे वाक्ये प्रमेहलक्षणमाह ॥ ६४ ॥
अर्थान्तर—एक वस्तु के प्रसंग में दूसरी वस्तु का कहना 'अर्थान्तर' है।
यथा—ज्वर के लक्षणों में प्रमेह के लक्षण कहने लगना ॥ ६४ ॥
अथ निग्रहस्थानं—निग्रहस्थानं नाम पराजयप्राप्तिः, तच्च त्रिर-
भिहितस्य वाक्यस्याविज्ञानं परिषदि विज्ञानवत्यां; यद्वा अननुयोज्य-
स्यानुयोगोऽनुयोज्यस्य चाननुयोगः। प्रतिज्ञाहानिरभ्यनुज्ञाकालातीतव-
चनमहेतवो न्यूनमतिरिक्तं व्यर्थमपार्थकं पुनरुक्तं विरुद्धं हेत्वन्तर-
मर्थान्तरं निग्रहस्थानम् ॥ ६५ ॥
निग्रहस्थान का दूसरा नाम पराजय-प्राप्ति है। यह विज्ञानवती परिषद्
में तीन बार कहे हुए वाक्य को न जानना, या अननुयोज्य का अनुयोग, अथवा
अनुयोज्य का अननुयोग है अर्थात् जहां प्रश्न न करना चाहिये वहां प्रश्न
करना और जहाँ करना चाहिये वहाँ न पूछना भी निग्रहस्थान ही है। इसके
अतिरिक्त प्रतिज्ञाहानि, अभ्यनुज्ञा, अतीतकालवचन, अहेतु, न्यून, अतिरिक्त,
व्यर्थ, अनर्थक, पुनरुक्त, विरुद्ध, हेत्वन्तर, अर्थान्तर, ये सब बातें पराजय का
कारण होती हैं ॥ ६५ ॥
इति वादमार्गपदानि यथोद्देशमभिनिर्दिष्टानि भवन्ति ॥ ६६ ॥
इस प्रकार से बाद के मार्गों को पूर्व कथनानुसार कह दिया है ॥ ६६ ॥